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Chhattisgarh: यहां लंकेश्वरी देवी की परिक्रमा के बाद होता है रावण दहन, 16वीं शताब्दी में लाए थे लंका से
Wed, 05 Oct 2022 11:24 AM IST
मोहनीश श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गरियाबंद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गरियाबंद
Published by: मोहनीश श्रीवास्तव
Updated Wed, 05 Oct 2022 11:24 AM IST
सार
लंकेश्वरी देवी का अब तक कोई स्वरूप नही बताया गया है। दुर्गा और काली के रूप में मान्यता कर पूजन किया जाता है। देवभोग में 1914 में लंकेश्वरी देवी का मंदिर बनाया गया, जहां बलि प्रथा की मान्यता थी।
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लंकेश्वरी देवी की परिक्रमा के बाद होता है रावण के पुतले का दहन।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
आज विजयदशमी यानी दशहरा का पर्व है। पूरे देश में रावण दहन की तैयारी चल रही है। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है। खास बात यह है कि यहां गरियाबंद जिले में रावण के पुतले को जलाने से पहले लंकेश्वरी देवी की परिक्रमा और पूजा की जाती है। 16वीं शताब्दी में कलिंग के राजा देवी को लंका से लेकर आए थे और फिर उनकी प्रतिमा स्थापित की। मान्यता है कि लंकेश्वरी युद्ध और विजय की देवी हैं। वे सारे कष्ट हर लेती हैं। स्थानीय लोग इन्हें दुर्गा और काली का स्वरूप मानकर पूजते हैं।
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ईष्ट देव कंचना ध्रुव पताके से मारते हैं रावण को
दरअसल, देवभोग के दशहरा का इतिहास 200 साल से भी ज्यादा पुराना है। इसे शाही दशहरा का दर्जा मिला हुआ है। दशहरे के दिन आसपास के गांव में विराजित ग्राम देवता विग्रह के रूप में अपनी पताका के साथ देवभोग पहुंचते हैं। फिर लंकेश्वरी देवी के नेतृत्व में रावण के पुतले की परिक्रमा की जाती है। इसके बाद जमींदारों के ईष्ट देव रहे कंचना ध्रुव अपनी पताका से पुतले को मारते हैं, तब रावण दहन किया जाता है। यह परंपरा तत्कालीन जमींदार नागेंद्र शाह के पूर्वजों के जमाने से चली आ रही है।
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84 ग्राम देवताओं को भेजा जाता था निमंत्रण
बताया जाता है कि पहले 84 गांव की ग्राम देवताओं को आमंत्रित किया जाता था, लेकिन अब वही आते हैं, जिन्हें जमींदार पूजते थे। करीब 80 साल से शाही दशहरा से लेकर देवी-देवताओं के पूजन की जिम्मेदारी दाऊ परिवार के पास है। सबसे पहले दशरथ दाऊ से इसकी शुरुआत हुई। अब तीसरी पीढ़ी के मुखिया जयशंकर दाऊ दशहरे की रस्म निभाते हैं। देवी सेवा और पूजन के चलते दाऊ परिवार के भरण पोषण के लिए जमीदारो ने 50 एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि उन्हें सौंपी है।
बताया जाता है कि पहले 84 गांव की ग्राम देवताओं को आमंत्रित किया जाता था, लेकिन अब वही आते हैं, जिन्हें जमींदार पूजते थे। करीब 80 साल से शाही दशहरा से लेकर देवी-देवताओं के पूजन की जिम्मेदारी दाऊ परिवार के पास है। सबसे पहले दशरथ दाऊ से इसकी शुरुआत हुई। अब तीसरी पीढ़ी के मुखिया जयशंकर दाऊ दशहरे की रस्म निभाते हैं। देवी सेवा और पूजन के चलते दाऊ परिवार के भरण पोषण के लिए जमीदारो ने 50 एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि उन्हें सौंपी है।
मंदिर में लोगों का प्रवेश है वर्जित
देवभोग से करीब 35 किमी दूर जूनागढ़ में लंकेश्वरी देवी का मंदिर स्थापित है। ओडिशा को पहले कलिंग क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। 18वीं शताब्दी के बाद कलिंग के इस इलाके तक ईस्ट इंडिया कंपनी पहुंच गई। तब शाह परिवार छुरा से लेकर देवभोग तक जमींदारी संभाल रहा था। उन्होंने देवभोग से 12 किमी दूर बरही ग्राम में भी 1914 में लंकेश्वरी देवी मंदिर स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की। मंदिर में आम लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर में प्रवेश के लिए आयताकार विशाल छिद्र बनाया गया है जहां से पुजारी ही आ और जा सकता है।
सपने में देवी आती थीं, तो देवभोग में भी बनाया गया मंदिर
स्थानीय निवासी नारायण अवस्थी ने साल 1955 में जीवन लाल के नाम पर देवभोग के मुख्य चौराहे पर दो एकड़ जमीन खरीदी थी। इस जमीन को लेने के बाद ही परिवार में दिक्कतें शुरू हो गईं। घर की बहू भगवती देवी जब काफी परेशान हो गईं तो परिवार से सपने की चर्चा की। बताया कि खरीदी गई जमीन जमींदारों का खलिहान हुआ करती थी। वहां देवी का मंदिर बनना है। इस पर नींव की खुदाई शुरू हुई तो पहले से ही बना ढांचा दिखाई दिया। उसी पर फिर मंदिर स्थापित किया गया।