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जल-जमीन जंगल को बचाने वाला योद्धा, दामोदर कश्यप

Thu, 04 Jun 2015 05:30 PM IST
Updated Thu, 04 Jun 2015 05:30 PM IST
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damodar kashyap save 600 acres jungle in chhatisgarh

67 साल के दामोदर कश्यप को अगर आप बारेलाकोट के जंगल में तलाशने की कोशिश करेंगे तो शायद आप गुम जाएंगे। आखिर चार सौ एकड़ के घने जंगल में किसी एक आदमी को तलाशना मुश्किल आसान नहीं।

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लेकिन दामोदर कश्यप से आप पूछें तो वह हंसते हुए जवाब देंगे, "मैं तो इस जंगल के सब पेड़ों को जानता हूं।" बस्तर के बकावंड इलाके में ओडीशा की सीमा से लगा हुआ है संध करमरी गांव. 35 साल तक इस गांव के सरपंच रहे दामोदर कश्यप को गांव और उसके आसपास के लोग बाबा के नाम से जानते हैं।
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पूरे गांव की संपत्ति
कोई 30 साल पहले जब गांव के आसपास के जंगल वन विभाग के लोगों ने काट दिए और गांव की निस्तार की ज़मीन भी उजाड़ हो गई तब गांव के लोगों ने वहां अतिक्रमण करके खेती शुरू कर दी।
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दामोदर बताते हैं, "गांव वालों को समझाया बुझाया और फिर वहां गांव के लोगों के साथ मिल कर पौधा लगाना शुरू किया। कुछ ही सालों के भीतर पूरे चार सौ एकड़ ज़मीन पर पौधे लहलहाने लगे।"

छह सौ एकड की खेती में खड़ा कर दिया बड़ा जंगल

damodar kashyap save 600 acres jungle in chhatisgarh

संध करमरी और आस-पड़ोस के गांव के लोगों की नज़र पास के जंगल पर पड़ी तो गांव से लगी हुई सौ एकड़ की ज़मीन पर पंचायत से प्रस्ताव पारित किया और ज़मीन को गांव की कुलदेवी मावली देवी के नाम कर दिया।

भतरा आदिवासी समुदाय के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे दामोदर मुस्कुराते हुये कहते हैं, "देवी के नाम पर उस इलाके को किया तो पूरा जंगल बच गया. फिर उसी जंगल के वनोपज से जो मिला, उससे देवी का मंदिर भी बन गया. देवी के नाम का सौ एकड़ का जंगल अब पूरे गांव की संपत्ति है।" दामोदर कश्यप ने अपनी ज़मीन भी गांव को दान दे दी और उस पर भी पेड़ लगवा दिए।

कुछ देसी-विदेशी संस्थाओं ने दामोदर कश्यप को सम्मानित भी किया है. लेकिन दामोदर कश्यप का कहना है कि वह तो केवल अपने गांव के लिए कुछ करना चाहते हैं बस!

इन सारे जंगलों से गांव के लोग आम, महुआ, चिरौंजी, काजू जैसे वनोपज तो ले सकते हैं लेकिन जंगल की सूखी लकड़ी भी वह पंचायत की अनुमति के बिना नहीं ला सकते। फिर भी गांव के लोगों को इससे कोई शिकायत नहीं है।

जंगल को बचाता है 'टेंगापाली'

damodar kashyap save 600 acres jungle in chhatisgarh

इतने बड़े जंगल की देखरेख के लिए भी दामोदर कश्यप ने तरकीब निकाली, तरक़ीब थी ‘टेंगापाली’। गांव की कुलदेवी के मंदिर में उन्होंने एक टेंगा रखा, टेंगा यानी एक अच्छा-खासा डंडा। फिर उस टेंगा पर देवी के कुछ कपड़े लपेट दिये। गांव के तीन लोगों को ज़िम्मा दिया कि देवी के इस ‘टेंगापाली’ को वे पूरे दिन जंगल घुमाएंगे।

गांव के श्रवण बताते हैं, "हर दिन सुबह टेंगापाली लेकर गांव के तीन लोग जंगल के लिए निकलते हैं और फिर शाम को उसे अपने पड़ोसी के घर छोड़ जाते हैं।"

"पड़ोसी और उसके घर से लगे दो घरों के लोग अगले दिन ‘टेंगापाली’को जंगल ले जाते हैं। अगर कोई टेंगा ले कर नहीं गया तो उसे पांच सौ रुपये का जुर्माना देना पड़ता है।"

गांव वालों का कहना है कि पिछले 6-7 सालों में कभी ऐसा नहीं हुआ कि ‘टेंगापाली’को जंगल नहीं ले जाया गया हो। छत्तीसगढ़ राज्य क्षतिपूर्ति वनीकरण, कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण की सदस्य मीतू गुप्ता कहती हैं, "दामोदर जी का जो पूरा काम है, वह एकबारगी चौंका देता है। मैंने उनके गांव में जा कर उनके पूरे काम को देखा-समझा है।"

"जिस सूझबूझ के साथ उन्होंने गांव वालों के साथ मिल कर लगभग 600 एकड़ के इलाके में जंगल को बनाया और बचाया है, वह हम सब के लिए मिसाल है।"

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