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सीजी: जीआई टैग की दौड़ में पिछड़ा छत्तीसगढ़, बस्तर विश्वविद्यालय ने की नई पहल

Thu, 01 Oct 2026 04:41 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Thu, 01 Oct 2026 04:41 PM IST
सार

जीआई टैग की दौड़ में छत्तीसगढ़ कई राज्यों से पीछे है। बस्तर के इमली, हल्दी, सीताफल, कोदो-कुटकी समेत 14 उत्पाद जीआई टैग  का इंतजार कर रहे हैं। बस्तर विश्वविद्यालय ने पारंपरिक कला को जीआई पहचान और डिजिटल बाजार से जोड़ने की पहल शुरू की है।

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Chhattisgarh lags behind in the race for GI tag, Bastar University takes new initiative
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोककला, जंगलों और पारंपरिक उत्पादों के लिए पहचाना जाता है, लेकिन भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग की राष्ट्रीय होड़ में राज्य अब भी काफी पीछे है। प्रदेश को अब तक केवल आठ उत्पादों के लिए जीआई पहचान मिल सकी है। इनमें से चार उत्पाद बस्तर की पारंपरिक हस्तशिल्प कला से जुड़े हैं। सदियों पुरानी पहचान रखने वाले बस्तर की हल्दी, तिखूर और इमली जैसे कई स्थानीय उत्पाद अब भी जीआई टैग की आधिकारिक प्रक्रिया में अटके हुए हैं। राज्य स्तर पर पर्याप्त वित्तीय सहायता और ठोस प्रयासों की कमी के कारण यह स्थिति बनी हुई है।
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अन्य राज्यों से काफी पीछे
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश भर में उत्तर प्रदेश 76 जीआई टैग के साथ सबसे ऊपर है। इसके बाद तमिलनाडु के पास 69, महाराष्ट्र के पास 52, कर्नाटक के पास 45, असम के पास 40, केरल के पास 37 और पड़ोसी राज्य ओडिशा के पास 26 जीआई टैग मौजूद हैं। इनकी तुलना में छत्तीसगढ़ की झोली में महज सात या आठ जीआई टैग ही आ पाए हैं। पंजीकरण की तारीखों और लोगो के दर्ज होने की वजह से गणना में थोड़ा अंतर दिखता है। छत्तीसगढ़ के पंजीकृत उत्पादों में सुगंधित जीराफूल चावल, नगरी दुबराज चावल, चांपा सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक तथा बस्तर के ढोकरा शिल्प, लौह शिल्प, काष्ठ शिल्प और चित्रकला शामिल हैं।
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ओडिशा ले गया चापड़ा चटनी
बस्तर की पहचान लाल चींटी की प्रसिद्ध चापड़ा चटनी को जीआई टैग दिलाने की दौड़ में ओडिशा बाजी मार चुका है। इससे छत्तीसगढ़ की स्थानीय प्राकृतिक संपदा और पारंपरिक ज्ञान के अन्य राज्यों के नाम दर्ज होने की आशंका बढ़ गई है। फिलहाल राज्य के 14 अन्य महत्वपूर्ण उत्पादों के आवेदन फैसले के इंतजार में लंबित पड़े हैं। इन लंबित आवेदनों में बस्तर इमली, विष्णुभोग चावल, सीताफल, कोदो-कुटकी और पनिका साड़ी जैसे प्रमुख उत्पाद शामिल हैं। स्थानीय विशेषज्ञों के अनुसार इन उत्पादों को पहचान दिलाने के लिए राज्य स्तर पर प्रक्रिया में तेजी लाना बेहद जरूरी है।
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विश्वविद्यालय की नई पहल
पारंपरिक कला को बढ़ावा देने के लिए शमक विश्वविद्यालय  के कुलपति प्रो. मनोज कुमार श्रीवास्तव ने विशेष योजना की जानकारी दी है। विश्वविद्यालय बस्तर की बेलमेटल और बांस कला को सशक्त करने के लिए वृहद परियोजना पर काम कर रहा है। इसके तहत स्थानीय कलाकारों को आधुनिक डिजाइनरों और डिजिटल बाजार से जोड़ा जाएगा। विश्वविद्यालय प्रजीआई टैगिंग के लिए आवश्यक कागजी दस्तावेजीकरण में भी सहयोग प्रदान करेगा। कलाकृतियों की सीधी बिक्री के लिए परिसर में विशेष शॉप खोली जाएगी, जिससे बिक्री से प्राप्त राशि सीधे कलाकारों के बैंक खातों में पहुंचे।
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