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छत्तीसगढ़: मातृत्व अधिकार पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, छुट्टी की कमी बताकर महिला कर्मचारी का लाभ नहीं रोक सकते

Wed, 26 Aug 2026 08:12 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Wed, 26 Aug 2026 08:12 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला कर्मचारियों के मातृत्व अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मिसकैरेज के दौरान लिया गया अवकाश बाद की गर्भावस्था के मातृत्व अवकाश में समायोजित नहीं किया जा सकता।

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The High Court made a significant observation regarding maternity leave for female employees, stating that lea
मातृत्व अवकाश पर hc की अहम टिप्पणी

विस्तार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला कर्मचारियों के मातृत्व अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मिसकैरेज के दौरान लिया गया अवकाश बाद की गर्भावस्था के मातृत्व अवकाश में समायोजित नहीं किया जा सकता। वहीं, केवल कर्मचारी के लीव बैलेंस में कमी का हवाला देकर उसे मातृत्व लाभ से वंचित करना भी उचित नहीं है।
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चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) की अपील खारिज करते हुए सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा। मामले में एफसीआई की रायपुर जिला कार्यालय में असिस्टेंट ग्रेड-2 के पद पर कार्यरत किरण गौतम शर्मा को राहत मिली है।
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दरअसल, वर्ष 2019 में किरण जुड़वा बच्चों की गर्भवती थीं। 25 अप्रैल को मेडिकल जटिलता के कारण एक भ्रूण का मिसकैरेज हो गया, जबकि दूसरे भ्रूण की गर्भावस्था को डॉक्टरों ने हाई रिस्क बताया था। उन्हें लंबे समय तक बेड रेस्ट की सलाह दी गई। बाद में 3 सितंबर 2019 को उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया।
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एफसीआई ने उनके 68 दिनों के अवकाश को एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी लीव मानते हुए उस अवधि का वेतन रोक दिया था। इससे उनके वेतन से 80,254 रुपये की कटौती हुई। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो सिंगल बेंच ने 13 मई 2026 को महिला कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मिसकैरेज और मातृत्व अवकाश के कुल 90 दिनों का लाभ देने तथा वेतन कटौती रद्द करने का निर्देश दिया।

एफसीआई ने इस फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती दी, लेकिन अदालत ने अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व लाभ महिला के स्वास्थ्य, सम्मान और कल्याण से जुड़ा अधिकार है। इसे महज तकनीकी आधार या लीव बैलेंस की कमी के कारण नहीं छीना जा सकता।


हालांकि, निजी अस्पताल के इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति पर कोर्ट ने सीधे भुगतान का आदेश नहीं दिया। संबंधित विभाग को दस्तावेजों की जांच कर नियमानुसार नए सिरे से निर्णय लेने को कहा गया है।

 

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