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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: यौन उत्पीड़न की जांच समिति का गठन दोषपूर्ण, पूरी रिपोर्ट शून्य;नए सिरे से जांच के आदेश
Sun, 13 Sep 2026 01:06 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
Published by: अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 13 Sep 2026 01:06 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने राज्य पाठ्यपुस्तक निगम के तत्कालीन महाप्रबंधक पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच नए सिरे से कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने पुरानी जांच समिति के गठन को कानून के अनुरूप नहीं मानते हुए उसकी रिपोर्ट को शून्य कर दिया।
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यौन उत्पीड़न मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने राज्य पाठ्यपुस्तक निगम के तत्कालीन महाप्रबंधक अरविंद कुमार पांडेय के खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की नए सिरे से जांच कराने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने दिया।
मामले में निगम की स्टेनो टाइपिस्ट ने मार्च 2022 में तत्कालीन महाप्रबंधक के खिलाफ शिकायत की थी। शिकायत के बाद निगम ने पांच सदस्यीय आंतरिक शिकायत समिति का गठन कर जांच कराई थी। हालांकि, पीड़िता ने समिति के गठन और जांच प्रक्रिया पर ही सवाल उठाए थे।
पीड़िता ने समिति की निष्पक्षता पर जताई थी आपत्ति
पीड़िता का आरोप था कि जांच समिति में शामिल सदस्य तत्कालीन महाप्रबंधक से कनिष्ठ अधिकारी थे। ऐसे में उनके रहते समिति से निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना उचित नहीं था। उन्होंने यह भी आपत्ति जताई थी कि समिति में कोई महिला सदस्य शामिल नहीं थी। पीड़िता वर्ष 2008 से निगम में स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने तत्कालीन महाप्रबंधक पर कार्यालय में अनुचित व्यवहार, अशोभनीय इशारे और आपत्तिजनक प्रस्ताव देने के आरोप लगाए थे।
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हाईकोर्ट ने समिति के गठन को ही माना गलत
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि आंतरिक शिकायत समिति के गठन को लेकर कानून में स्पष्ट प्रावधान हैं। कोर्ट ने कहा कि समिति में वरिष्ठ महिला अधिकारी को पीठासीन अधिकारी बनाया जाना जरूरी है और समिति के कम से कम आधे सदस्य महिलाएं होनी चाहिए। निगम की ओर से दलील दी गई कि महिला कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण समिति में महिला सदस्य शामिल नहीं की जा सकीं। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में किसी अन्य कार्यालय या प्रशासनिक इकाई से वरिष्ठ महिला अधिकारी को समिति में शामिल किया जा सकता था।
पुरानी जांच और रिपोर्ट शून्य
हाईकोर्ट ने समिति के मूल गठन को ही दोषपूर्ण मानते हुए उसके आधार पर की गई पूरी जांच और रिपोर्ट को शून्य घोषित कर दिया। साथ ही मामले में कानून के अनुरूप नई समिति गठित कर आरोपों की नए सिरे से जांच करने के आदेश दिए गए हैं। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब शिकायत की जांच नए सिरे से निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत की जाएगी।
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मामले में निगम की स्टेनो टाइपिस्ट ने मार्च 2022 में तत्कालीन महाप्रबंधक के खिलाफ शिकायत की थी। शिकायत के बाद निगम ने पांच सदस्यीय आंतरिक शिकायत समिति का गठन कर जांच कराई थी। हालांकि, पीड़िता ने समिति के गठन और जांच प्रक्रिया पर ही सवाल उठाए थे।
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पीड़िता ने समिति की निष्पक्षता पर जताई थी आपत्ति
पीड़िता का आरोप था कि जांच समिति में शामिल सदस्य तत्कालीन महाप्रबंधक से कनिष्ठ अधिकारी थे। ऐसे में उनके रहते समिति से निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना उचित नहीं था। उन्होंने यह भी आपत्ति जताई थी कि समिति में कोई महिला सदस्य शामिल नहीं थी। पीड़िता वर्ष 2008 से निगम में स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने तत्कालीन महाप्रबंधक पर कार्यालय में अनुचित व्यवहार, अशोभनीय इशारे और आपत्तिजनक प्रस्ताव देने के आरोप लगाए थे।
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हाईकोर्ट ने समिति के गठन को ही माना गलत
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि आंतरिक शिकायत समिति के गठन को लेकर कानून में स्पष्ट प्रावधान हैं। कोर्ट ने कहा कि समिति में वरिष्ठ महिला अधिकारी को पीठासीन अधिकारी बनाया जाना जरूरी है और समिति के कम से कम आधे सदस्य महिलाएं होनी चाहिए। निगम की ओर से दलील दी गई कि महिला कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण समिति में महिला सदस्य शामिल नहीं की जा सकीं। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में किसी अन्य कार्यालय या प्रशासनिक इकाई से वरिष्ठ महिला अधिकारी को समिति में शामिल किया जा सकता था।
पुरानी जांच और रिपोर्ट शून्य
हाईकोर्ट ने समिति के मूल गठन को ही दोषपूर्ण मानते हुए उसके आधार पर की गई पूरी जांच और रिपोर्ट को शून्य घोषित कर दिया। साथ ही मामले में कानून के अनुरूप नई समिति गठित कर आरोपों की नए सिरे से जांच करने के आदेश दिए गए हैं। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब शिकायत की जांच नए सिरे से निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत की जाएगी।