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हाईकोर्ट का फैसला: सिविल जज की परीक्षा में बार काउंसिल में नामांकन या एनरोलमेंट न होने पर भी ले सकते हैं भाग

Thu, 23 Jan 2025 02:13 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: Digvijay Singh Updated Thu, 23 Jan 2025 02:13 PM IST
सार

बिलासपुर हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सिविल जज की परीक्षा में वह उम्मीदवार भी भाग ले सकते हैं जिनका बार काउंसिल में नामांकन या एनरोलमेंट नहीं है।

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High Court's decision One can participate in Civil Judge exam even if one is not enrolled in Bar Council in Bi
बिलासपुर हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिलासपुर हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सिविल जज की परीक्षा में वह उम्मीदवार भी भाग ले सकते हैं जिनका बार काउंसिल में नामांकन या एनरोलमेंट नहीं है। कोर्ट ने साफ शब्दों में आदेशित किया है कि सिविल जज की परीक्षा के लिए किसी भी विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ही अनिवार्य होगी। इसके साथ ही इन सिविल जज की परीक्षाओं में सरकारी नौकरी में रहते हुए भी भाग लिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने इसके साथ ही सीजीपीएससी को सिविल जज की परीक्षा के आवेदन की अंतिम तिथि को 24 जनवरी 2025 से एक महीने तक के लिए आगे बढ़ने का आदेश दिया है।

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बता दें कि जबलपुर निवासी विनीता यादव ने हाईकोर्ट में यह याचिका दायर की है। दायर  याचिका में कहा गया है कि सीजीपीएससी ने 23 दिसंबर 2024 को सिविल जज परीक्षा के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है परीक्षा में आवेदन करने की की अंतिम तिथि 24 जनवरी 2025 रखी गई है। सीजीपीएससी की ओर से इसमें एक शर्त रखी गई है जिसमें कहा गया है कि किसी भी विश्वविद्यालय से ला की डिग्री के साथ ही आवेदन करने वाले उम्मीदवारों का बार काउंसिल में नामांकन जरूरी है और वह वकील के तौर पर प्रैक्टिस भी कर रहे हो। इस शर्त को विनीता यादव ने चुनौती दी थी इसमें कहा गया कि वह सरकारी नौकरी में है। उन्होंने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर से ला की डिग्री ली हुई है। क्योंकि वह सरकारी नौकरी में है इसलिए वकालत के तौर पर उनका नामांकन बार काउंसिल में नहीं हो सका है। बार काउंसिल की अनिवार्य पात्रता होने के कारण वह इस सिविल जज की परीक्षा से वंचित हो रही है।       
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अपनी याचिका में उन्होंने इस शर्त को हटाने और आवेदन किए जाने की छूट की मांग की थी। याचिका में कहा गया कि इस तरह की शर्त किसी भी और दूसरे राज्यों में नहीं है। यहां तक की हरियाणा, राजस्थान,उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात, दिल्ली में भी इस तरह की कोई शर्त नहीं है और वहां सिविल जज की परीक्षा के लिए अनिवार्य पात्रता या अहर्ता सिर्फ किसी भी विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री होना ही है। हालांकि मध्य प्रदेश में इसे आवश्यक नहीं बल्कि ऑप्शनल के तौर पर जरूर रखा गया है। याचिका के बाद हाईकोर्ट ने मामले में सीजीपीएससी, राज्य के विधि विधाई विभाग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। शासन की ओर से इस शर्त को अनिवार्य बताते हुए अपना पक्ष रखा गया।
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दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस रमेश सिंह और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डीबी ने मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है। हाई कोर्ट ने बार काउंसिल में सरकारी नौकरी वालों को नामांकन में छूट प्रदान करने का फैसला दिया है। डीबी ने अपने फैसले में कहा है कि इस तरह की शर्त की कोई जरूरत नहीं है। सिविल जज की परीक्षा में शामिल होने के लिए ला की डिग्री होना ही पर्याप्त है। कोर्ट ने अपने फैसले में याचिका करता विनीता यादव को आवेदन करने की छूट दी है और इस संबंध में सीजीपीएससी को भी आदेशित किया है । हाईकोर्ट ने सीजीपीएससी को कहा है कि इस भर्ती के लिए आवेदन की तिथि को 24 जनवरी 2025 से 1 महीने के लिए आगे बढ़ाया जाए। यह फैसला उन अभ्यर्थियों पर भी लागू होगा जिन्होंने याचिका दायर नहीं की है और जो की सरकारी नौकरी में है।
 





 

ट्रांसमिशन लाइन को लेकर भी हुई सुनवाई  

बिलासपुर जिले के कई गांवों से गुजरने वाली ट्रांसमिशन लाइन के नीचे और आसपास करंट से लोगों के प्रभावित होने की खबर को संज्ञान लेकर चल रही जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा और न्यायाधीश रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से अतिरिक्त अटॉर्नी जनरल रमाकांत मिश्रा ने केंद्र सरकार का पक्ष रखा। वहीं इस पूरे मामले में CEA (सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी) की विस्तृत रिपोर्ट पेश नहीं हो पाई है। जिसके लिए बैंच ने अगली सुनवाई का समय निर्धारित किया है। 

दरअसल, हाइकोर्ट की पूर्व सुनवाई में अधिवक्ता अतनु घोष ने जानकारी दी थी कि विद्युत प्राधिकरण, विद्युत मंत्रालय की एक समिति गठित की गई है, जिसमें कृषि क्षेत्र में अपनी ट्रांसमिशन लाइन स्थापित करने वाली कंपनियों को ट्रांसमिशन लीकेज का समाधान निकालने के लिए बुलाया गया है। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता रमाकांत मिश्रा ने इस मामले में विस्तृत रिपोर्ट पूर्ण होने पर अगली सुनवाई तक पेश करने की जानकारी दी थी। गुरुवार को सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अतनु घोष ने केंद्र सरकार के पूर्व के हलफनामे में जबलपुर ट्रांसमिशन कंपनी को लेकर पेश किए तथ्य को कोर्ट के सामने रखा और समय की मांग की। वहीं अधिवक्ता रमाकांत मिश्रा ने CEA की विस्तृत रिपोर्ट को अगली सुनवाई में पेश करने की जानकारी दी। 

बता दें, कि बिलासपुर के कई गांव में हाईटेंशन विद्युत लाइन की ऊंचाई कम होने से नीचे और आसपास करंट होने के चलते ग्रामीणों की परेशानी को लेकर प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने जनहित याचिका के तौर पर इसकी सुनवाई शुरू की है।  जिसमें प्रकाशित किया की बिलासपुर जिले के रतनपुर क्षेत्र के लगभग आठ गांवों के खेतों में हाईटेंशन तार के नीचे और टॉवरों के आसपास करंट के झटके महसूस किए जा रहे हैं। बचने के लिए लोग रबड़ के बूट, जूते पहन रहे हैं, इसके बावजूद हर रोज ग्रामीणों को करंट लग रहा है। मवेशियों और बच्चों को इससे ज्यादा खतरा है। इस समस्या से कछार, लोफंदी, भरारी, अमतरा, मोहतराई, लछनपुर, नवगंवा, मदनपुर अधिक प्रभावित हैं।  इस पूरे मामले में हाई कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को CEA समिति की विस्तृत रिपोर्ट मांगी पेश करने आदेश दिया। वही अगली सुनवाई 4 मार्च को तय की गई।


 
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