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Mother's Day: नेत्रहीन बच्चों की ज्योति बन, कर रहीं पालन, गीता को मिला जगत मां का दर्जा, खुद के भी हैं 2 बच्चे

Sun, 12 May 2024 01:33 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, मनेन्द्रगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, मनेन्द्रगढ़ Published by: Digvijay Singh Updated Sun, 12 May 2024 01:33 PM IST
सार

नेत्रहीन विद्यालय में अध्ययनरत बच्चे भी गीता को गीता माँ कह कर पुकारते हैं। गीता को भी इन बच्चों की सेवा करना किसी पुण्य कार्य से कम नहीं लगता। गीता कहती भी हैं मैं इनको नेत्रहीन बच्चे समझती ही नहीं हूं।

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Becoming a light for blind children Geeta got the status of mother of the world
नेत्रहीन बच्चों की ज्योति बनी गीता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिला मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ के आमाखेरवा में नेत्रहीन विद्यालय संचलित है। यहां मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के तीन दर्जन से ज्यादा बच्चे पढ़ाई करते हैं। घर से माता पिता से दूर रह कर यहां नेत्रहीन बच्चे पढ़ते है। यहां काम करने वाली गीता इन बच्चों को कभी एहसास नहीं होने देती की वे अपनी माँ से दूर हैं। बीते 15 सालों से नेत्रहीन विद्यालय में काम करने वाली 53 वर्षीय गीता नेत्रहीन विद्यालय के बच्चों की अब जगत माँ का दर्जा प्राप्त कर बच्चों पालन कर रही हैं। 

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नेत्रहीन विद्यालय में अध्ययनरत बच्चे भी गीता को गीता माँ कह कर पुकारते हैं। गीता को भी इन बच्चों की सेवा करना किसी पुण्य कार्य से कम नहीं लगता। गीता कहती भी हैं मैं इनको नेत्रहीन बच्चे समझती ही नहीं हूं। मैं अपने बच्चों जैसा मानकर इन बच्चों की सेवा करती हूं। गीता रजक का कहना है मेरे खुद दो बच्चे हैं एक बेटी और एक बेटा। जैसे मैं अपने बच्चों को पालती हूं वैसे इन बच्चों को पालती हूं। गीता बताती हैं इन बच्चों की देखरेख कर मुझे जो पैसे नेत्रहीन विद्यालय द्वारा दिये जाते है उन पैसे से मैं अपने बच्चों का लालन पालन करती हूं।
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आपको बता दें कि नेत्रहीन विद्यालय के बच्चों की देखभाल करने वाली गीता खुद तो बस 5वीं पास हैं, लेकिन इन नेत्रहीन बच्चों के अध्ययन कार्य में भी गीता सहयोग करती हैं। नेत्रहीन विद्यालय के बच्चे जब स्टडी रूम में पढ़ाई करते हैं तो किताबें निकालने के अलावा स्टडी रूम की साफ- सफाई को लेकर भी संजीदा है। इसके अलावा पढ़ाई के दौरान बच्चों को प्यास लगने पर पानी लाकर देना, चाय बनाना गीता की दिनचर्या में शामिल है।


 

गीता खुद तीन बच्चों की माँ हैं। एक बेटे की मौत बीमारी से हो गई। दो बच्चे हैं एक बेटी और बेटा। 10 साल पहले पति की बीमारी से मौत के बाद गीता हार नहीं मानी और बच्चों को बड़ा कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया। गीता का बेटा धोबी का काम करता है। वहीं बेटी जिसकी शादी गीता ने अपने दम पर की है। गीता के बेटे और बेटी की शादी हो चुकी है। अब ज्यादातर समय गीता रजक नेत्रहीन विद्यालय में ही गुजारती हैं।
 

नेत्रहीन विद्यालय के व्यवस्थापक राकेश गुप्ता ने बताया कि गीता रजक पिछले 15 सालों से आया का दायित्व निभा रही है। राकेश बताते है कि विद्यालय के छोटे बच्चों को नहलाने तक का काम यह करती है। इसके अलावा नेत्रहीन विद्यालय के छात्रों के कपड़े धोना। खाना बनाकर खिलाना। बर्तन धोना छात्रों के बेड लगाने के अलावा कई कार्य करती हैं। विद्यालय में 10 घण्टे काम करने के बाद भी जब कभी गीता की जरूरत होती है उसे बुला लिया जाता है और वह हर कार्य करती है। नेत्रहीन विद्यालय के बच्चों की जब तबीयत खराब होती है तो उन्हें अस्पताल ले जाने तक से दवाई लाने और दवाई समय पर खिलाने का काम भी गीता के जिम्मे है।

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