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बालोद: बैल और गौवंशीय पशुओं की होती है पूजा, पोला त्यौहार की दिखी रौनक

Sat, 23 Aug 2025 02:45 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, बालोद
अमर उजाला नेटवर्क, बालोद Published by: Digvijay Singh Updated Sat, 23 Aug 2025 02:45 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में पोला त्यौहार की एक अनोखी परंपरा है, जो इसे बाकी जगहों से अलग बनाती है। पोला आमतौर पर किसानों द्वारा खेती में मदद करने वाले बैल और गौवंशीय पशुओं की पूजा का त्यौहार है।

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Bulls and bovine animals are worshipped Pola festival was celebrated with fervour in Balod
पोला त्यौहार की दिखी रौनक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में पोला त्यौहार की एक अनोखी परंपरा है, जो इसे बाकी जगहों से अलग बनाती है। पोला आमतौर पर किसानों द्वारा खेती में मदद करने वाले बैल और गौवंशीय पशुओं की पूजा का त्यौहार है, लेकिन बालोद में यह इससे कहीं ज़्यादा है। यहाँ पोला का त्यौहार बच्चों और उनके खिलौना बैलों का होता है, और इसे 'पोरा' कहा जाता है। आज के दिन बालोद जिले में घर घर बैल की पूजा की जा रही है। और बैल सजाओ प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जा रहा है।

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यह परंपरा मुख्य रूप से बालोद, डौंडीलोहारा, गुरुर, और गुण्डरदेही जैसे क्षेत्रों में देखने को मिलती है। इस दिन बच्चे अपने घर के आंगन में मिट्टी और लकड़ी से बने रंग-बिरंगे खिलौना बैल चलाते हैं, जिन्हें 'पोरा-पोरी' कहते हैं।

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त्यौहार के पीछे का इतिहास
इस अनोखी परंपरा के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। किंवदंती के अनुसार, प्राचीन समय में, इस क्षेत्र के राजा ने अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए दूर-दराज के युद्धों में सैनिकों को भेजा। इस दौरान, राज्य में खेती और किसानी का काम ठप्प हो गया, जिससे भुखमरी की स्थिति आ गई। जब सैनिकों को यह खबर मिली, तो वे तुरंत वापस आ गए। वापस आने के बाद, उन्होंने देखा कि बच्चे अपनी गायों और बैलों के साथ खेल रहे थे। यह देखकर, उन्हें खेती का महत्व समझ आया और उन्होंने बच्चों को पोला त्यौहार मनाने के लिए प्रेरित किया। इसी घटना को याद करते हुए, बच्चों ने मिट्टी के खिलौना बैल बनाने शुरू किए और यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही।

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