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हिंदी पत्रकारिता दिवस: उदन्त मार्तण्ड के 200 साल; हिंदी भाषा को जनभाषा और पत्रकारिता की भाषा बनाने की शुरुआत

Fri, 29 May 2026 07:33 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर Published by: अमन कोशले Updated Fri, 29 May 2026 07:33 PM IST
सार

आज से हिंदी पत्रकारिता के 'सूर्य' उदंत मार्तंड के प्रकाशन के  200 साल पूरे हो गए। उदन्त मार्तण्ड हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण समाचार पत्र माना जाता है।

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200 years of Udant Martand: beginning of making Hindi language of people and language of journalism- Dr. Anil
ग्रॉफिक्स: अमर उजाला डिजिटल - फोटो : Amar ujala digital

विस्तार

आज से हिंदी पत्रकारिता के 'सूर्य' उदंत मार्तंड के प्रकाशन के  200 साल पूरे हो गए। उदन्त मार्तण्ड हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण समाचार पत्र माना जाता है। यह केवल एक अखबार नहीं था, बल्कि हिंदी भाषा को जनभाषा और पत्रकारिता की भाषा बनाने की शुरुआत भी था। हिंदी पत्रकारिता दिवस हर वर्ष 30 मई को मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन उदन्त मार्तण्ड का पहला अंक प्रकाशित हुआ था।
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हिंदी भाषा के प्रथम समाचार पत्र उदंत मार्तंड का पहला अंक 30 मई 1826 को कोलकाता से प्रकाशित हुआ। उस समय भारत में अंग्रेजी, फारसी और बंगाली भाषाओं के समाचार पत्र निकलते थे, लेकिन हिंदी में कोई अखबार नहीं था। इसी कमी को देखते हुए पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने हिंदी भाषी लोगों के लिए यह समाचार पत्र शुरू किया। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के कानपुर क्षेत्र के रहने वाले थे और कलकत्ता में वकालत के पेशे से जुड़े थे। अब सवाल यह उठता है कि आखिर 'उदन्त मार्तण्ड' नाम क्यों रखा गया? तो आपको बता दें कि उदन्त का अर्थ होता है समाचार या खबर और मार्तण्ड का अर्थ होता है सूर्य। अर्थात 'समाचारों का सूर्य'। यह नाम इस विचार को दर्शाता था कि यह पत्र हिंदी समाज में ज्ञान और सूचना का प्रकाश फैलाएगा। 
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इस अखबार की विशेषताओं के बारे में यदि बात करें तो यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र था। हर मंगलवार को प्रकाशित होता था। इसकी भाषा सरल हिंदी और ब्रजभाषा मिश्रित शैली में होती थी। इसमें सामाजिक, प्रशासनिक, व्यापारिक और जनहित की खबरें प्रकाशित होती थीं। इसके साथ ही समाचार पत्र में आम जनता की समस्याओं और भारतीय समाज से जुड़े विषयों को काफी स्थान दिया जाता था। अख़बारों के प्रकाशन में उस समय की चुनौतियां भी कम नहीं थीं। उदन्त मार्तण्ड को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस समय हिंदी पढ़ने वाले लोगों की संख्या कम थी। सदस्यता और विज्ञापन नहीं मिलने से आर्थिक परेशानी बढ़ती गई। अंग्रेज सरकार ने इस पत्र को डाक में कोई विशेष रियायत नहीं दी, जबकि अंग्रेजी अखबारों को सुविधा मिलती थी। इससे दूर-दराज तक अखबार पहुंचाना महंगा पड़ता था। हिंदी पत्रकारिता नई थी, इसलिए पाठकों का दायरा छोटा था। जाहिर सी बात है कि इस पत्र का पाठक वर्ग सीमित था। लगातार आर्थिक नुकसान के कारण यह समाचार पत्र लगभग डेढ़ वर्ष बाद 4 दिसंबर 1827 को बंद हो गया। हालांकि इसका जीवन छोटा रहा, लेकिन इसने हिंदी पत्रकारिता की मजबूत नींव रख दी। उदन्त मार्तण्ड का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसने हिंदी को पत्रकारिता की भाषा बनाया। अंग्रेजी शासन में भी हिंदी भाषी समाज को अपनी आवाज मिली। बाद में निकलने वाले हिंदी समाचार पत्रों को प्रेरणा मिली। इसके अलावा भारतीय भाषाई पत्रकारिता के विकास का रास्ता खुला।
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उदंत मार्तण्ड को लेकर कुछ रोचक तथ्य भी हैं । पहले अंक में संपादक ने पाठकों से अपील करते हुए लिखा था कि हिंदी भाषी लोग अपने समाचार पत्र का समर्थन करें, ताकि यह लंबे समय तक चल सके। यह उस दौर में हिंदी पत्रकारिता के संघर्ष को दर्शाता है। उदन्त मार्तण्ड के अंतिम अंक (4 दिसंबर 1827) में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने अत्यंत भावुक पंक्ति लिखी थी- 'आज दिवस लौ उग चुक्यो मार्तण्ड उदन्त। अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त॥


इसका अर्थ है कि 'समाचारों का सूर्य' अब अस्त हो रहा है, यानी आर्थिक कठिनाइयों के कारण अखबार बंद किया जा रहा है। यह पंक्ति हिंदी पत्रकारिता के संघर्ष और उस दौर की कठिन परिस्थितियों का प्रतीक मानी जाती है। आज पत्रकारिता से जुड़ा पूरा वर्ग उदंत मार्तण्ड के दूसरी शताब्दी पूरे होने पर पत्र के योगदान को याद कर रहा है।

लेखक- डॉ. अनिल शुक्ला, सहायक प्राध्यापक (अतिथि), कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 
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