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छत्तीसगढ़: शरिया कोर्ट के आदेश पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं

Tue, 08 Sep 2026 02:07 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: अमन कोशले Updated Tue, 08 Sep 2026 02:07 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई निजी धार्मिक संस्था या स्वयं को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून से स्थापित अदालत का दर्जा नहीं रखता।

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Chhattisgarh High Court issues major verdict on Sharia court order, says it is not legally binding
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई निजी धार्मिक संस्था या स्वयं को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून से स्थापित अदालत का दर्जा नहीं रखता। पीठ के सदस्य जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने रायपुर के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट द्वारा 18 जनवरी, 2022 को जारी आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित कर दिया है। इस आदेश में याचिकाकर्ता महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित किया गया था। अदालत ने साफ किया कि वैधानिक न्यायिक प्रक्रिया के बिना जारी ऐसा कोई भी निर्णय किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति, कानूनी अधिकार या दायित्व में बदलाव नहीं कर सकता।
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मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का संदर्भ दिया। अदालत ने कहा कि फतवा जारी करने वाली संस्थाओं या दारुल कजा जैसे निजी धार्मिक निकायों को राज्य द्वारा स्थापित न्यायालयों के समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। ऐसी संस्थाएं केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर सलाह या राय दे सकती हैं, लेकिन उनकी राय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होती। विवाह समाप्त करने या वैवाहिक अधिकारों को बदलने का अधिकार केवल कानून के तहत गठित सक्षम अदालतों के पास ही है।
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यह मामला रायपुर के टिकरापारा निवासी 3 निरोश अब्बासी (38) से जुड़ा है। वर्ष 2015 में पहले पति के निधन के बाद उन्होंने 18 जुलाई ,2020 को मोहम्मद आबिद खान से विवाह किया था। शादी के बाद नए परिवार में बच्चों के समायोजन को लेकर विवाद पैदा हो गया। पति ने दावा किया था कि उसने 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्तूबर 2021 को तीन चरणों में संचार माध्यमों से तलाक-ए-हसन दिया है। महिला ने उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए वन स्टॉप सखी सेंटर में काउंसिलिंग कराई, लेकिन समाधान न होने पर 7 अक्तूबर, 2021 को पुलिस अधीक्षक के पास शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद 1 नवंबर, 2021 को रायपुर के महिला थाने में पति और अन्य के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए और 34 के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई।
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हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर घोषित किया। अदालत ने इस मामले में तलाक-ए-हसन की सांविधानिक वैधता के सवाल पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि उसके इस आदेश का पीड़ित महिला की ओर से दर्ज कराई गई पुलिस प्राथमिकी या उपलब्ध अन्य कानूनी विकल्पों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। आपराधिक मामलों तथा अन्य वैधानिक अधिकारों का निपटारा संबंधित सक्षम प्राधिकारी कानून के प्रावधानों के अनुसार ही करेंगे। इस निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि कोई भी निजी धार्मिक संगठन किसी नागरिक के कानूनी अधिकारों और वैवाहिक स्थिति में फेरबदल नहीं कर सकता।
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