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टाटा ग्रुप टकराव: बोर्ड के फैसलों पर डारियस खंबाटा ने जताई नाराजगी, जानिए वित्त मंत्री ने क्या कहा है?

Tue, 03 Nov 2026 12:52 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Tue, 03 Nov 2026 12:52 PM IST
सार

  • टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग और एन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स में विवाद गहरा गया है।
  • ट्रस्टी डारियस खंबाटा के गंभीर आरोपों और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की सौहार्दपूर्ण समाधान की अपील पर पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

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Tata Group Rift Escalates: Darius Khambata Criticizes Board Governance, FM Sitharaman Urges this
टाटा विवाद - फोटो : amarujala.com (AI Assisted)

विस्तार

देश के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी घरानों में शामिल टाटा समूह के भीतर होल्डिंग कंपनी टाटा संस और इसके मुख्य शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स के बीच का अंदरूनी मतभेद अब खुलकर सामने आ गया है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी रह चुके खंबाटा ने पुनर्नियुक्ति से इनकार करते हुए 17 सितंबर को हुई टाटा संस बोर्ड की बैठक से जुड़े घटनाक्रमों की तीखी आलोचना की है। 
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टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और सीईओ सिद्धार्थ शर्मा को लिखे पत्र में उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पूर्व टाटा समूह चेयरमैन रतन टाटा जीवित होते, तो क्या बोर्ड इसी तरह कार्रवाई करता? इस विवाद की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी दोनों पक्षों से मामले को सार्वजनिक रूप से तूल देने के बजाय आपस में जल्द और सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने की अपील की है।
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डारियस खंबाटा ने क्या सवाल उठाए हैं?

सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी रहे वरिष्ठ वकील डारियस खंबाटा ने अपना कार्यकाल दोबारा न बढ़ाने का फैसला करते हुए बोर्ड की कार्यप्रणाली की सख्त आलोचना की है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और सीईओ सिद्धार्थ शर्मा को लिखे पत्र में खंबाटा ने सवाल किया कि यदि पूर्व चेयरमैन रतन टाटा जीवित होते, तो क्या टाटा संस का बोर्ड 17 सितंबर को इस तरह का कदम उठाता? रिपोर्टों के अनुसार, खंबाटा ने 17 सितंबर की घटनाओं को 'बदनामी' करार दिया और कहा कि इसने टाटा संस की प्रतिष्ठा और भारतीय कॉर्पोरेट जगत की छवि को नुकसान पहुंचाया है।
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सितंबर 17 की बोर्ड बैठक में ऐसा क्या हुआ था?

17 सितंबर की बैठक में टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को पुनः चेयरमैन नियुक्त करने और कंपनी की शेयर बाजार में लिस्टिंग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का फैसला लिया था। इस बैठक में ट्रस्ट्स के मनोनीत निदेशक नोएल टाटा इन फैसलों के खिलाफ वोट करने वाले इकलौते निदेशक थे, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने बहुमत के साथ मतदान किया। दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी (एनबीएफसी) के रूप में वर्गीकृत करने और अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी खारिज किए जाने के बाद कंपनी के लिए लिस्टिंग अनिवार्य हो गई है। हालांकि, लिस्टिंग और नियंत्रण के इस ढांचे को लेकर टाटा ट्रस्ट्स के एक धड़े में गहरी चिंताएं बनी हुई हैं।

केंद्रीय वित्त मंत्री ने इस विवाद पर क्या प्रतिक्रिया दी?

2 नवंबर को आयोजित एक बिजनेस कार्यक्रम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टाटा समूह के इस आंतरिक विवाद पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि टाटा समूह भारतीय अर्थव्यवस्था का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए दोनों पक्षों को बातचीत के जरिए मामला सुलझाना चाहिए ताकि स्थिति जल्द सामान्य हो सके। सीतारमण ने कहा कि यह विवाद सार्वजनिक मंचों पर लगातार नहीं खींचना चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकार मध्यस्थता करेगी, तो उन्होंने इसे संवेदनशील मुद्दा बताते हुए सीधे हस्तक्षेप पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

टाटा समूह के सामने आगे क्या बड़ी चुनौतियां और रणनीतिक रास्ते हैं?

भारतीय उद्योग जगत के लिए इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि टाटा संस का बोर्ड और उसका सबसे बड़ा शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स आपसी भरोसे को कैसे बहाल करते हैं। शेयर बाजार में लिस्टिंग के कानूनी दायित्वों और ट्रस्ट्स के विजन के बीच संतुलन बनाना समूह के नेतृत्व की असली परीक्षा होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि विवाद लंबा खींचने से समूह की कंपनियों के वैल्यूएशन और निवेशकों के भरोसे पर असर पड़ सकता है, यही वजह है कि बाजार और सरकार दोनों की नजरें टाटा समूह के अगले कदम पर टिकी हैं।
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