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ठंडी पड़ी भारतीय चाय: रूस-युक्रेन युद्ध के चलते निर्यात घटने के आसार, श्रीलंका के हालात का भी फायदा नहीं उठा पा रहा देश

Thu, 26 May 2022 07:26 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Thu, 26 May 2022 07:26 PM IST
सार

श्रीलंका और चीन की आंतरिक परिस्थितियों के कारण इन देशों से होने वाले चाय व्यापार में आठ करोड़ किलोग्राम की कटौती हो सकती है, लेकिन भारत इस स्थिति का लाभ उठा पाने की स्थिति में नहीं है। इसका कारण रूस पर लगने वाले अमेरिकी प्रतिबंधों को माना जा रहा है...

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Indias tea export decraese due to Russia-Ukraine war, decline in tea exports to Russia-East European countries
चाय बागान - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

रूस-यूक्रेन युद्ध की तपिश पूरी दुनिया में महसूस की जा रही है। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ रही है। भारत को युद्ध के कारण एक और मोर्चे पर बड़ा नुकसान हो रहा है। युद्ध के कारण भारत का चाय निर्यात कमजोर पड़ रहा है और रूस-पूर्वी यूरोपीय देशों में होने वाले चाय निर्यात में कमी आई है। इससे चाय उत्पादकों को उत्पादन घटाने को मजबूर होना पड़ सकता है, जिसके कारण चाय श्रमिकों में बेरोजगारी बढ़ सकती है। श्रीलंका और चीन की आंतरिक परिस्थितियों के कारण इन देशों से होने वाले चाय व्यापार में आठ करोड़ किलोग्राम की कटौती हो सकती है, लेकिन भारत इस स्थिति का लाभ उठा पाने की स्थिति में नहीं है। इसका कारण रूस पर लगने वाले अमेरिकी प्रतिबंधों को माना जा रहा है।   

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दरअसल, रूस भारत की चाय के सबसे बड़े आयातकों में शामिल है। वहां भारत की हाथों से तैयार की गई चाय बहुत पसंद की जाती है। इसी प्रकार पूर्वी यूरोप में भी भारत की पारंपरिक चाय खूब पसंद की जाती है। वहीं, वेलनेस कैटेगरी में लोगों की जागरुकता के कारण इस वर्ग की चाय की खपत में भी खूब बढ़ोतरी आई है। लेकिन रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उसको होने वाले चाय निर्यात में कमी आई है तो युद्ध के कारण यूरोपीय देशों में बढ़ी कमरतोड़ महंगाई के कारण वहां होने वाला चाय निर्यात भी कमजोर पड़ा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इसका भारत को नुकसान हो सकता है।

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श्रीलंका-चीन की स्थिति का लाभ नहीं

चाय उत्पादक कंपनी टीकरी इंडिया के सीईओ हैरीकिशन सिंह ने अमर उजाला को बताया कि श्रीलंका की चाय पूरी दुनिया में पसंद की जाती है, लेकिन अपनी आंतरिक परिस्थितियों के कारण इस समय वह चाय निर्यात नहीं कर पा रहा है। इसी तरह चीन भी चाय उत्पादन के मामले में विश्व में बड़ा खिलाड़ी है, लेकिन कोरोना की स्थिति गंभीर होने के कारण उसके चाय निर्यात में भी कमी आई है। अनुमान है कि 2022-23 में श्रीलंका और चीन से होने वाले चाय निर्यात में लगभग आठ करोड़ किलोग्राम की कटौती हो सकती है।

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हैरीकिशन सिंह के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में कोई भी चाय उत्पादक देश इस स्थिति का लाभ उठा सकता है, लेकिन चाय उत्पादन में लगने वाले समय और भारी मानव श्रम के कारण इसका उत्पादन अचानक बढ़ा पाना संभव नहीं होता। लिहाजा इस बदली परिस्थिति का लाभ भी भारत उठाने में सक्षम नहीं है। चाय कंपनियां अचानक निवेश बढ़ाने को भी इच्छुक नहीं होतीं क्योंकि इससे लाभ एक सीमित समय में मिलने की संभावना बनती है, जबकि पड़ोसी देशों में हालात सामान्य होते ही निर्यात सामान्य स्थिति में आने की संभावना ज्यादा होती है। इससे कोई भी कंपनी अल्पकाल के लिए भारी निवेश करने के प्रति इच्छुक नहीं होती। 

निर्यातकों में निराशा क्यों

टी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव प्रबीर कुमार भट्टाचार्जी के अनुसार, पारंपरिक चाय के उत्पादन में भारी निवेश होता है और यह महंगी होती है। जबकि लोकप्रिय चाय मशीनों के माध्यम से बनाई जाती है जो वर्तमान समय में कुल घरेलू उत्पादन का लगभग 83 प्रतिशत है। पारंपरिक चाय के उत्पादन में मशीनों के द्वारा उत्पादन की तुलना में लगभग 20 गुना ज्यादा कीमत आती है। लिहाजा उसकी पसंद विशेष वर्ग के लोगों तक ही सीमित है। इस वर्ग की चाय सबसे ज्यादा विदेश निर्यात की जाती है। लेकिन बाजार में महंगाई के कारण इसकी खपत में कमी आ रही है जिससे चाय उत्पादकों में निराशा का माहौल है।   

भारत की स्थिति

टी बोर्ड ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, देश चाय उत्पादन के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर आता है। पूरी दुनिया में होने वाले कुल चाय व्यापार में देश की हिस्सेदारी लगभग 10 फीसदी है और यह शीर्ष पांच चाय निर्यातक देशों में शामिल है। वातावरणीय कारणों से भारत की चाय दुनिया में सबसे बेहतर गुणवत्ता की समझी जाती है और ऊंची दरों पर बिकती है। भारत चाय के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में भी शामिल है और यह अपनी पैदावार का लगभग 80 फीसदी अपनी जरूरतों को पूरा करने में ही खर्च कर देता है। 2020-21 में देश में 128.3 करोड़ टन चाय का उत्पादन हुआ, जबकि 2019-20 में यह मात्रा 136 करोड़ किलोग्राम तक पहुंच गई थी जो अब तक का एक रिकॉर्ड है।

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