फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Business ›   Business Diary ›   Fulfilling promises of freebies after elections has increased state spending, research claims

Freebies: चुनाव के बाद मुफ्त रेवड़ी वाले वादे पूरा करने से बढ़ा राज्यों का खर्च, रिसर्च में किए गए ये दावे

Mon, 29 Sep 2025 03:43 PM IST
रिया दुबे बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रिया दुबे Updated Mon, 29 Sep 2025 03:43 PM IST
सार

एमके रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 वर्षों में 19 प्रमुख राज्यों की रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चला है कि औसतन, चुनाव के तुरंत बाद वाले वर्ष में मुफ्त रेवड़ी के कारण राज्यों का राजस्व व्यय जीएसडीपी के 0.3 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इन राज्यों में चुनावी वर्ष में वित्तीय घाटा जीडीपी के अनुपात में औसतन 1 प्रतिशत अंक बढ़ गया और उसके अगले वर्ष स्थिर रहा।
 

विज्ञापन
Fulfilling promises of freebies after elections has increased state spending, research claims
भारतीय अर्थव्यवस्था। - फोटो : amarujala

विस्तार

पिछले 20 वर्षों के आंकड़ों से पता चला है कि चुनाव के बाद मुफ्त रेवड़ी के कारण राज्यों का खर्च बढ़ता है। एमके रिसर्च की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ साल राज्य चुनावों से भरे रहे हैं। इस दौरान 10 प्रमुख राज्यों में चुनाव हुए। इनमें से लगभग हर राज्य ने, खासकर महिलाओं के लिए, पार्टी लाइन की परवाह किए बिना, नई मुफ्त योजनाएं शुरू कीं। ऐसी योजनाएं चुनाव जीतने की एक मजबूत रणनीति साबित हुई हैं और सभी राज्यों में एक आम बात बन गई हैं।

विज्ञापन


ये भी पढ़ें: Sahara Group: सहारा समूह की संपत्ति अदाणी प्रॉपर्टीज को बेचने की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई मंजूरी

विज्ञापन

पूंजीगत व्यय जीएसडीपी का 0.2 प्रतिशत तक बढ़ा

पिछले 20 वर्षों में 19 प्रमुख राज्यों की रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चला है कि औसतन, चुनाव के तुरंत बाद वाले वर्ष में किसी राज्य का राजस्व व्यय जीएसडीपी के 0.3 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। राज्यों में पूंजीगत व्यय सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 0.2 प्रतिशत तक बढ़ गया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह अधिकतर कैच-अप की वजह से है, क्योंकि आम तौर पर चुनावों से पहले इसका स्तर गिर जाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन


रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस अवधि में राजकोषीय घाटा में कोई बदलाव नहीं होता। राजस्व व्यय विशेष रूप से मुफ्त रेवड़ी के रूप में खर्च, स्थायी प्रवृत्ति का प्रदर्शन करता है। एक बार कोई कल्याण या मुफ्त योजना शुरू हो जाने के बाद उसे घटाना मुश्किल हो जाता है, जबकि नई सरकारों द्वारा नई योजनाओं के परिचय से खर्च में और इजाफा हो जाता है।

राज्यों का वित्तीय घाटा बढ़ा

हाल की दो साल की चुनावी प्रक्रिया पर नजर डालते हुए एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो वर्षों में 10 प्रमुख राज्यों में चुनाव हुए, जिनमें पांच FY24 और पांच FY25 में शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार, इन राज्यों में चुनावी वर्ष में वित्तीय घाटा जीडीपी के अनुपात में औसतन 1 प्रतिशत अंक बढ़ गया और उसके अगले वर्ष स्थिर रहा।



राजस्व व्यय जीडीपी के अनुपात में चुनावी वर्ष में 0.3 प्रतिशत अंक बढ़ा और चुनाव के अगले वर्ष इसमें और 0.6 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई। इससे मुफ्त और कल्याण योजनाओं के खर्च की स्थायी प्रवृत्ति स्पष्ट होती है।

पूंजीगत व्यय जीडीपी के अनुपात में चुनावी वर्ष में स्थिर रहा, लेकिन अगले वर्ष 0.4 प्रतिशत अंक बढ़ गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्यों ने चुनावी वर्षों में पूंजीगत खर्च को सीमित करके राजस्व व्यय को प्राथमिकता दी, जिसके बाद अगले वर्ष कैच-अप देखा गया।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें कारोबार समाचार और Union Budget से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। कारोबार जगत की अन्य खबरें जैसे पर्सनल फाइनेंस, लाइव प्रॉपर्टी न्यूज़, लेटेस्ट बैंकिंग बीमा इन हिंदी, ऑनलाइन मार्केट न्यूज़, लेटेस्ट कॉरपोरेट समाचार और बाज़ार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed