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5 कारण: बजट 2018 पर क्यों टिकी हैं सबकी निगाहें

Thu, 01 Feb 2018 03:03 PM IST
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 01 Feb 2018 03:03 PM IST
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Budget 2018: Why are everyone looking for budget?
budget 2018

वित्त मंत्री अरुण जेटली संसद में 5वीं बार आम बजट पेश करेंगे। ऐसा दूसरी बार हो रहा है जब बजट 28 फरवरी के बजाय 1 फरवरी को पेश किया जा रहा है। मोदी सरकार के इस बजट पर देश के हर वर्ग की निगाहें टिकी हुई हैं। आखिर क्यों है यह बजट इतना खास, जानिए कारण

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बजट के चुनावी मायने

चुनावी दृष्टि से देखा जाए तो आम बजट 2018 बेहद महत्वपूर्ण नजर आता है। विपक्ष पहले ही इसे चुनावी बजट करार दे चुका है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि इसके राजनीतिक मायने क्या हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह आखिरी आम बजट है, इसके अलावा इसी साल (2018) 8 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, चार राज्यों में चुनाव, साल 2019 में होने हैं।  जाहिर है कि मोदी सरकार इस बजट के जरिए आम मतदाताओं को रिझाने का कोई मौका यूं ही जाया नहीं जाने देगी। 

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इन वर्गों पर रहेंगी निगाहे

राजनीति विश्लेषकों और विपक्ष का कहना है कि सरकार के खिलाफ कुछ वर्गों में खासा रोष है। इस लिहाज से मोदी सरकार कुछ खास वर्गों को ध्यान में रख कर ही पेश करेगी। जिनमें किसान, मध्यम वर्ग, व्यापारी शामिल हैं। नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों के बाद अर्थव्यवस्था में कई बदलाव एकाएक आ गए। ऐसे में सरकार इन वर्गों में अपने डगमगाते हुए विश्वास को स्थिरता देने की कोशिश जरूर करेगी।

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महंगाई को कंट्रोल करने की कवायद

मोदी सरकार ने चुनाव से पहले वादा किया था कि उनकी सरकार महंगाई पर नियंत्रण रखेगी। इस मोर्चे पर मोदी सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जनवरी 2017 से
दिसंबर 2018 के बीच महंगाई दर ने खूब उछल कूद मचाई। इस वक्त के दौरान CPI (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) 3.17 प्रतिशत से लेकर 5.21 प्रतिशत तक रही।  ऐसे में सरकार इस बजट के माध्यम से इस पर नियंत्रण पाने की कोशिश करेगी।   

तेल के दामों ने भी किया परेशान

कच्चे तेल के दामों में गिरावट के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़े। पेट्रोल और डीजल के दाम डेली डायनमिक प्राइसिंग के आधार पर किए जाने के बाद भी ग्राहकों की जेब पर बोझ बढ़ता गया। ऐसे में सरकार की कोशिश रहेगी कि वह इस बजट के बाद तेल के दामों पर लगाम लगाई जा सके। 

राजकोषीय घाटे पर दबाव

कैग के आंकड़ों के मुताबिक टैक्स रेवेन्यू और कुल खर्च के बीच को बताने वाले अंतर यानी की राजकोषीय घाटा सितंबर छमाही तक 4.99 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। सरकार की कोशिश रहेगी कि इस पर भी नियंत्रण किया जाए। 

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