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Business: अश्विनी वैष्णव बोले, मेक इन इंडिया के कारण निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि, पढ़ें व्यापार जगत की खबरें

Fri, 08 Dec 2023 06:21 AM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Fri, 08 Dec 2023 06:21 AM IST
सार

केंद्रीय मंत्री ने कहा, हर साल दो करोड़ नौकरियों का जो लक्ष्य मोदी जी ने रखा था वह जल्द हासिल होने वाला है। इसके पीछे विनिर्माण एक बड़ा कारक है। उन्होंने कहा, भविष्य निधि का डाटा देखें, जो साल में 70 लाख से बढ़कर एक करोड़ अस्सी लाख हो चुका है।

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Ashwini Vaishnaw says significant increase in exports due to Make in India business news in hindi
व्यापार समाचार - फोटो : Social Media

विस्तार

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बृहस्पतिवार को कहा कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम के कारण विनिर्माण-आधारित उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे देश में रोजगार के अवसर भी काफी बढ़े हैं। रेलवे, संचार और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री ने संवाददाताओं से कहा कि 2022-23 के निर्यात आंकड़ों के अनुसार, 762 अरब अमेरिकी डॉलर के कुल निर्यात में से 453 अरब अमेरिकी डॉलर विनिर्मित वस्तुओं से और 309 अरब अमेरिकी डॉलर सेवाओं से आए। उन्होंने कहा कि पहले निर्यात आंकड़ों में सेवा क्षेत्र का दबदबा हुआ करता था, लेकिन अब फार्मास्यूटिकल्स, मोबाइल फोन और माल ने इसकी जगह ले ली है। उन्होंने विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम को दिया। वैष्णव ने कहा, विनिर्माण आधारित निर्यात आम आदमी के जीवन पर असर डालता है। हम जापान और दक्षिण कोरिया की बात करें तो देखेंगे कि उन सभी ने अपनी आर्थिक यात्रा के दौरान विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित किया।
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जल्द पूरा होगा सालाना दो करोड़ नौकरियों का लक्ष्य: केंद्रीय मंत्री ने कहा, हर साल दो करोड़ नौकरियों का जो लक्ष्य मोदी जी ने रखा था वह जल्द हासिल होने वाला है। इसके पीछे विनिर्माण एक बड़ा कारक है। उन्होंने कहा, भविष्य निधि का डाटा देखें, जो साल में 70 लाख से बढ़कर एक करोड़ अस्सी लाख हो चुका है। दो करोड़ सालाना नौकरी का लक्ष्य पूरा होता दिख रहा है। वैष्णव ने कहा, 10 से 15 साल पहले पेट्रोलियम का निर्यात सबसे अधिक होता था और चावल व अन्य उत्पाद निर्यात के लिए शीर्ष उत्पादों की सूची में बाद में आते थे।
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खेतों की सेहत बिगड़ी, हर साल प्रति हेक्टेयर 3,654 रुपये का नुकसान
देश की उपजाऊ भूिम की गुणवत्ता तेजी से घट रही है। इससे खेती-बाड़ी के क्षेत्र में हर वर्ष औसतन 3,654 रुपए प्रति हेक्टेयर का नुकसान हो रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के शोधकर्ताओं ने नुकसान का यह आकलन 2011-12 की कीमतों के आधार पर किया है। शोध अध्ययन के नतीजे जर्नल लैंड डिग्रडेशन एंड डेवलपमेंट में प्रकाशित हुए हैं।
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नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी (एनआरएसए) की माने तो देश में करीब 9.64 करोड़ हेक्टेयर जमीन गुणवत्ता में आ रही गिरावट से जूझ रहा है। जबकि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के मुताबिक इसका दायरा करीब 12 करोड़ हेक्टेयर है। 21वीं सदी में भू-क्षरण बड़ी समस्या बनकर उभरा है। इस दौरान कृषि में आधुनिकरण का समावेश हुआ है और पैदावार बढ़ी, लेिकन इसकी गुणवत्ता में तेजी से िगरावट दर्ज की गई है।

उत्तर प्रदेश में ज्यादा क्षति: शोध से पता चला है कि राज्यों में भू-क्षरण के कारण सालाना होने वाले आर्थिक नुकसान में भारी असमानताएं हैं। एक ओर उत्तरप्रदेश में भूमि की गुणवत्ता में आ रही गिरावट से प्रति हेक्टेयर 15,212 रुपए का नुकसान हो रहा है। वहीं, दूसरी ओर केरल में यह नुकसान 7,489, पश्चिम बंगाल में 5,856, कर्नाटक में 5,843, असम में 5,168, महाराष्ट्र में 4,902, आंध्र प्रदेश में 4,741 और दिल्ली में 3,940 रुपए प्रति हेक्टेयर है। इसके विपरीत जम्मू-कश्मीर के किसानों को 105, मिजोरम में 283, पंजाब में 653 और मेघालय में 901, मणिपुर में 953 और उत्तराखंड में प्रति हेक्टेयर 968 रुपए का नुकसान झेलना पड़ रहा है।

बाढ़, सूखा व मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार: भूमि की गुणवत्ता में कमी आने के कई कारण है। इनमें चरम मौसमी घटनाएं, विनाशकारी बाढ़ और विशेष रूप से सूखा शामिल है। यह मानवीय गतिविधियों के कारण भी होता है, जो मिट्टी की गुणवत्ता और भूमि की उपयोगिता को प्रदूषित करते हैं।

भू-संरक्षण उपाय रोक सकते हैं नुकसान: शोधकर्ताओं ने कहा है कि भू-संरक्षण उपायों से भूमि की गुणवत्ता में आ रही गिरावट और आर्थिक नुकसान को रोका जा सकता है। भूमि संरक्षण प्रयासों के तहत भारत सरकार ने भी 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर जमीन बचाने का लक्ष्य रखा है।


भू-गिरावट वैश्विक चुनौती: भूमि की गुणवत्ता में आ रही गिरावट केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। यूएन कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) के आंकड़े बताते हैं कि 2015 से 42 करोड़ हेक्टयर उपजाऊ जमीन भू-क्षरण की भेंट चढ़ चुकी है। यह भूभाग करीब मध्य एशिया के बराबर है। इसकी वजह से दुनिया भर में खाद्य आपूर्ति की समस्या पैदा हो गई है। nवैश्विक स्तर पर हर साल करीब 10 करोड़ हेक्टेयर स्वस्थ्य जमीन अपनी गुणवत्ता खो रही है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो 2030 तक ययह आंकड़ा 150 करोड़ हेक्टेयर भूमि तक पहुंच जाएगा।
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