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'मैन्युफैक्चरिंग बढ़ानी है तो घटाना होगा एसएलआर': कांत ने बताया- कैसे सस्ता कर्ज-जमीन पैदा करेंगे रोजगार?
Sun, 11 Oct 2026 05:24 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, मुंबई।
पीटीआई, मुंबई।
Published by: राकेश कुमार
Updated Sun, 11 Oct 2026 05:24 PM IST
सार
अमिताभ कांत ने भारत में मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार बढ़ाने के लिए एसएलआर में कटौती कर कर्ज की लागत कम करने की जरूरत बताई है। उन्होंने मौजूदा 18 फीसदी एसएलआर को ज्यादा बताया, लेकिन इसके लिए कोई नया लक्ष्य नहीं दिया। कांत ने जमीन अधिग्रहण, बिजली की लागत और कर्ज की उपलब्धता को भी उद्योगों के विकास के लिए अहम बताया। उन्होंने कहा कि डेटा सेंटर से जुड़े सर्वर, रैक और बिजली के उपकरण जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
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अमिताभ कांत, नीति आयोग के पूर्व सीईओ
- फोटो : ANI
विस्तार
नीति आयोग के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत का कहना है कि भारत को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार बढ़ाने के लिए कारोबार की लागत कम करनी होगी। इसके लिए बैंकों के वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) में कटौती करने, कर्ज सस्ता करने और जमीन की उपलब्धता आसान बनाने जैसे कदम जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) फिलहाल मददगार है, लेकिन लंबे समय तक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने के लिए दूसरे उपायों पर भी ध्यान देना होगा।
एसएलआर क्या है और इसे घटाने की जरूरत क्यों?
एसएलआर वह अनुपात है, जिसके तहत बैंकों को अपनी जमा देनदारियों का एक निश्चित हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में रखना होता है। अमिताभ कांत के मुताबिक, भारत में एसएलआर 18 फीसदी है, जो काफी ज्यादा है। उन्होंने इसे कम करने की वकालत करते हुए कहा कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को लंबे समय तक आगे बढ़ाने के लिए कर्ज की उपलब्धता अहम होगी। एसएलआर में कटौती से बैंकों के पास निजी कंपनियों को कर्ज देने के लिए ज्यादा संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि एसएलआर को घटाकर कितना किया जाना चाहिए।
पीएलआई योजना क्या लंबे समय के लिए पर्याप्त है?
अमिताभ कांत ने कहा कि उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना यानी पीएलआई मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए अल्पकालिक समाधान है। लंबे समय में कारोबार की लागत कम करना जरूरी है। उनके मुताबिक, कर्ज की लागत घटाने और कंपनियों को आसानी से वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने से इस क्षेत्र को मजबूती मिल सकती है। उन्होंने कहा कि भारत के पास मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने का बड़ा अवसर है और दुनिया का देश पर भरोसा भी है। ऐसे में घरेलू स्तर पर मौजूद समस्याओं को दूर करना जरूरी है।
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चीन, वियतनाम और मैक्सिको से भारत क्या सीख सकता है?
अमिताभ ने जमीन की उपलब्धता को मैन्युफैक्चरिंग के लिए अहम बताया। उन्होंने कहा कि भारत को चीन और उसके विकल्प के तौर पर उभर रहे वियतनाम तथा मैक्सिको जैसे देशों में अपनाए जा रहे तरीकों पर गौर करना चाहिए। इन देशों में मैन्युफैक्चरिंग को समर्थन देने के लिए जमीन का अधिग्रहण आसान बनाने या लंबे समय के लिए जमीन पट्टे पर देने जैसे उपाय किए जाते हैं। उन्होंने बिजली की लागत और उपलब्धता पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई। कांत के अनुसार, बिजली राज्यों का विषय है, इसलिए राज्य सरकारों को भी इस दिशा में कदम उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि भारत में उद्योगों को बिजली के लिए घरेलू उपभोक्ताओं से ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। उनके मुताबिक, इससे मैन्युफैक्चरिंग को कम प्राथमिकता मिलने का संकेत जाता है।
स्टार्टअप और डेटा सेंटर से रोजगार कैसे बढ़ेंगे?
अमिताभ कांत ने कहा कि पर्याप्त कर्ज के बिना भू-स्थानिक तकनीक जैसे नए क्षेत्रों में काम करने वाले स्टार्टअप बड़ी कंपनियों के रूप में विकसित नहीं हो पाएंगे। उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग को रोजगार पैदा करने के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया। डेटा सेंटर जैसे नए क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाओं पर उठने वाली चिंताओं के बीच उन्होंने कहा कि इससे जुड़ी गतिविधियों में भी नौकरियां पैदा होंगी। उनके मुताबिक, सर्वर, रैक और बिजली के उपकरण जैसी संबंधित चीजों पर डेटा सेंटर की कुल लागत का 45 फीसदी हिस्सा खर्च होता है। रोजगार के अवसर इन गतिविधियों से भी पैदा होंगे।
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एसएलआर क्या है और इसे घटाने की जरूरत क्यों?
एसएलआर वह अनुपात है, जिसके तहत बैंकों को अपनी जमा देनदारियों का एक निश्चित हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में रखना होता है। अमिताभ कांत के मुताबिक, भारत में एसएलआर 18 फीसदी है, जो काफी ज्यादा है। उन्होंने इसे कम करने की वकालत करते हुए कहा कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को लंबे समय तक आगे बढ़ाने के लिए कर्ज की उपलब्धता अहम होगी। एसएलआर में कटौती से बैंकों के पास निजी कंपनियों को कर्ज देने के लिए ज्यादा संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि एसएलआर को घटाकर कितना किया जाना चाहिए।
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पीएलआई योजना क्या लंबे समय के लिए पर्याप्त है?
अमिताभ कांत ने कहा कि उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना यानी पीएलआई मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए अल्पकालिक समाधान है। लंबे समय में कारोबार की लागत कम करना जरूरी है। उनके मुताबिक, कर्ज की लागत घटाने और कंपनियों को आसानी से वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने से इस क्षेत्र को मजबूती मिल सकती है। उन्होंने कहा कि भारत के पास मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने का बड़ा अवसर है और दुनिया का देश पर भरोसा भी है। ऐसे में घरेलू स्तर पर मौजूद समस्याओं को दूर करना जरूरी है।
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चीन, वियतनाम और मैक्सिको से भारत क्या सीख सकता है?
अमिताभ ने जमीन की उपलब्धता को मैन्युफैक्चरिंग के लिए अहम बताया। उन्होंने कहा कि भारत को चीन और उसके विकल्प के तौर पर उभर रहे वियतनाम तथा मैक्सिको जैसे देशों में अपनाए जा रहे तरीकों पर गौर करना चाहिए। इन देशों में मैन्युफैक्चरिंग को समर्थन देने के लिए जमीन का अधिग्रहण आसान बनाने या लंबे समय के लिए जमीन पट्टे पर देने जैसे उपाय किए जाते हैं। उन्होंने बिजली की लागत और उपलब्धता पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई। कांत के अनुसार, बिजली राज्यों का विषय है, इसलिए राज्य सरकारों को भी इस दिशा में कदम उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि भारत में उद्योगों को बिजली के लिए घरेलू उपभोक्ताओं से ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। उनके मुताबिक, इससे मैन्युफैक्चरिंग को कम प्राथमिकता मिलने का संकेत जाता है।
स्टार्टअप और डेटा सेंटर से रोजगार कैसे बढ़ेंगे?
अमिताभ कांत ने कहा कि पर्याप्त कर्ज के बिना भू-स्थानिक तकनीक जैसे नए क्षेत्रों में काम करने वाले स्टार्टअप बड़ी कंपनियों के रूप में विकसित नहीं हो पाएंगे। उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग को रोजगार पैदा करने के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया। डेटा सेंटर जैसे नए क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाओं पर उठने वाली चिंताओं के बीच उन्होंने कहा कि इससे जुड़ी गतिविधियों में भी नौकरियां पैदा होंगी। उनके मुताबिक, सर्वर, रैक और बिजली के उपकरण जैसी संबंधित चीजों पर डेटा सेंटर की कुल लागत का 45 फीसदी हिस्सा खर्च होता है। रोजगार के अवसर इन गतिविधियों से भी पैदा होंगे।