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दुनिया के अधिकांश देशों के समुद्र तटों के पास तैर रहे कच्चे तेल के टैंकर

Wed, 29 Apr 2020 03:17 PM IST
‌डिंपल अलवधी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ‌डिंपल अलवधी Updated Wed, 29 Apr 2020 03:17 PM IST
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Oil market faces crude oil storage crisis in a world
कच्चा तेल - फोटो : अमर उजाला

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट की वजह कोरोना वायरस महामारी से बनी स्थिति है। चूंकि आर्थिक गतिविधियां बंद हैं इसलिए दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक अमेरिका समेत अन्य देशों के सामने अजीब सी उलझन पैदा हो गई है कि वो उस कच्चे तेल का क्या करें। तेल उत्पादक देशों के पास भंडारण के लिए जगह कम पड़ गई है। 

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कोरोना संकट से आई कच्चे तेल की मांग में कमी
कोरोना वायरस संकट के कारण कच्चे तेल की मांग में कमी आई है और तेल की सभी भंडारण सुविधाएं भी अपनी पूर्ण क्षमता पर पहुंच चुकी हैं। इस संदर्भ में एसएंडपी ग्लोबल प्लैट्स के मुख्य विश्लेषक क्रिस एम ने एक सप्ताह पहले कहा था कि, तीन सप्ताह के भीतर कच्चे तेल के सभी टैंक भर जाएंगे। 
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दक्षिणी कैलिफोर्निया तट में अभी 25 से अधिक तेल टैंकर हैं। वैश्विक क्रूड कीमतों में गिरावट और भंडारण की जगह की कमी के साथ समुद्र में कच्चे तेल को स्टोर करने से कच्चे टैंकरों की मांग बढ़ रही है।

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एतिहासिक दुविधा की घड़ी
अमेरिका के प्रमुख तेल भंडार भरने की कगार पर पहुंच गए हैं। इनमें ओक्लाहोमा का सबसे बड़ा ऑयल स्टोरेज सेंटर भी शामिल है। ये आशंका जताई जा रही है कि कुछ समय के भीतर ही ये तेल भंडार अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच जाएंगे यानी और तेल स्टोरेज की जगह खत्म हो जाएगी। अमेरिका के लिए ये एतिहासिक दुविधा की घड़ी है। ऐसी असमंजस की स्थिति दुनिया में के कुछ दूसरे देशों के सामने भी हैं। इन देशों ने पहले तो बड़े-बड़े तेल भंडार बनाए ताकि अगर किसी वजह से ऑयल सप्लाई बंद होने की सूरत में उनके यहां आपूर्ति प्रभावित न हो।

मालूम हो कि इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने चेतावनी भी दी थी कि, 'बहुत जल्द ही एक समय आएगा जब दुनिया भर में ऑयल स्टोरेज की क्षमता अपने चरम पर पहुंच जाएगी।'

रिसर्च फर्म आईएचएस मार्किट का अनुमान है कि इस साल की पहली तिमाही में तेल की वैश्विक मांग 38 लाख बैरल प्रतिदिन के हिसाब से कम हो गई है। ये वैश्विक आपूर्ति का चार फीसदी हिस्सा है। साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद ये सबसे खराब स्थिति है।

इसलिए आई गिरावट
दरअसल कुछ हफ्ते पहले ही रूस और सऊदी अरब के बीच तेल की कीमतों पर प्राइस वॉर चल रहा था जिसकी वजह से भी तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई थी। ओपेक प्लस देशों के समूह और मेक्सिको के बीच हुए समझौते के बाद ये तय हुआ था कि मई तक तेल के उत्पादन में दस फीसदी की कटौती की जाएगी। तेल उत्पान में कटौती के लिए ये समझौता अपने आप में एतिहासिक था। मार्च के आखिर से कई अमेरीकी कंपनियों ने ये घोषणा की थी कि वे अप्रैल में तेल प्रसंस्करण की मात्रा में कटौती करेंगे। कच्चे तेल के उत्पादन पर इस घोषणा का भी नकारात्मक असर हुआ था।

हाल ही में तेल का वायदा शून्य से भी नीचे पहुंच गया था। मई डिलीवरी के लिए यूएस बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमिडिएट (WTI) की कीमत अप्रैल में पहली बार शून्य से नीचे गिर गई थी क्योंकि कोई व्यापारी कच्चा तेल खरीदकर उसे अपने पास रखने की स्थिति में नहीं था।

टैंकर फार्म में कच्चा तेल
यही कारण ह जिसकी वजह से समंदर में खड़े बड़े-बड़े ऑयल टैंकर भी तैरते हुए स्टोरेज यूनिट्स बन गए हैं। मार्च के महीने से ही कुछ अमेरिकी कंपनियों ने अपने जहाजों को एक जगह पर खड़ा करना शुरू कर दिया था। इसे कुछ लोग 'टैंकर फार्म' भी कह रहे हैं।

कंपनियां किराए पर लेती हैं टैंकर्स 
एर्नी बार्सामियान कहते हैं, 'कई कंपनियां तो ये ऑयल टैंकर्स किराए पर लेती हैं। इन्हें तेल से भर दिया जाता है। समंदर में खड़ा कर दिया जाता है और ये तब तक वैसे ही खड़ी रहती हैं जब तक कि इन्हें कोई ग्राहक नहीं मिल जाता है।'

हालांकि समंदर में तेल रखना, जमीन पर स्टोरज करने की तुलना में तीन गुना ज्यादा महंगा है। इसकी लागत बहुत ज्यादा पड़ती है लेकिन पिछले कुछ हफ्ते में कई कंपनियां ये विकल्प अपना रही हैं क्योंकि अमेरिका में जमीन पर स्टोरेज की कम पड़ गई है।

एनर्जी मार्केट से जुड़ी कंसल्टेंसी फर्म 'केप्लर' सैटेलाइट के जरिए समंदर में खड़े ऑयल टैंकर्स की गतिविधियों पर नजर रखती है। फर्म का कहना है कि मार्च के महीने में समंदर में ऑयल टैंकरों के जरिए तेल भंडारण की मात्रा में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है।
 

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