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डॉलर का भाव चढ़ा तो हिलेगी देश की घरेलू अर्थव्यवस्था

Sat, 27 Feb 2016 01:52 AM IST
Updated Sat, 27 Feb 2016 01:52 AM IST
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impact of dollar price on indian economy

कच्चे तेल के भाव में अंतरराष्ट्रीय गिरावट ने जहां सरकारी राजस्व को मजबूती दी है, वहीं सरकार की निगाह डॉलर के उतार-चढ़ाव पर टिक गई है। देश ताजा आर्थिक सर्वे में अर्थव्यस्था के संकेतक काफी बड़ी चेतावनी दे रहे हैं।

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हालांकि सर्वे में भारतीय आर्थिक ढांचे की बुनियाद मजबूत होने, 315.5 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार का हवाला दिया गया है, लेकिन आने वाले समय में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ने को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं है। सबसे बड़ी चिंता की बात लगातार निर्यात का घटना, सेवा क्षेत्र में भी कोई उछाल न आना है।
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सेवा क्षेत्र में 2010-14 तक भारत ने 8.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। 8.00 प्रतिशत की दर से चीन दूसरे स्थान पर है। इसे रोजगार बढ़ाने का प्रमुख जरिया माना जाता है, लेकिन इस क्षेत्र में चीन से कड़ी टक्कर मिल रही है। वहीं तीन तिमाही में वैश्विक निर्यात 18 प्रतिशत तक नीचे आया है। सर्वे में एनपीए(नॉन परफार्मिंग एसेट) को लेकर चिंता व्यक्त की गई है।
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यह लगातार बढ़ रहा है। इससे सार्व जनिक क्षेत्र के बैंकों की चिंता भी बढ़ रही है और घरेलू ब्याज दरों में राहत के आसार धूमिल हो रहे हैं। जबतक इस पर काबू नहीं पाया जाता तबतक बाजार में पैसे के प्रवाह की संभावना, रोजगार के अवसर, आधारभूत ढांचागत क्षेत्र में तेजी की संभावना कम ही रहेगी।

घरेलू वृद्धि दर को बढ़ाने पर ही निर्भर होना होगा

impact of dollar price on indian economy

सर्वे में संभावना जताई गई है सातवें वेतन आयोग की सिफारिश अमल में आने के बाद मंहगाई पर खास असर नहीं पड़ेगा। इतना ही नहीं कर्मचारियों को पैसा मिलेगा, वह खर्च करेंगे और बाजार में आयेगा। इससे अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।

वैश्विक अर्थ व्यवस्था में स्थायित्व जहां भारतीय अर्थ व्यवस्था के लिए संजीवनी देगा, वहीं कच्चे तेल की कीमत का बढ़ना भी अर्थ व्यस्था को डराती रहेगी। इससे भी ज्यादा डॉलर का भाव अहमियत रखेगा। वैश्विक अर्थ व्यवस्था में थोड़ी सी भी सुस्ती सरकार के लिए बड़े परेशानी का सबब बन सकती है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि डॉलर के भाव सत्तर रूपये प्रति डॉलर से जितना ऊपर जाएंगे, भारत जैसे विकासशील देश के लिए अपने लक्ष्यों को पाना उतना ही मुश्किल हो जाएगा।

हालांकि आर्थिक सर्वे में मंहगाई पर नियंत्रण के मामले स्थायित्व आने का भरोसा जताया गया है, लेकिन इसके पीछे मुख्य आधार वैश्विक अर्थव्यस्था, तेल की कीमतें, तथा खेती खलिहानी है। सरकार खर्च में लगातार कटौती करके भी आर्थिक सेहत सुधारने की राह है।

घरेलू अर्थ व्यवस्था में वृद्धि का मुख्य आधार खेती-खलिहानी है। खेती-खलिहानी देश की एक बड़ी आबादी को न केवल रोजगार देती है बल्कि उसके बेहतर रहने पर मंहगाई काबू में रहती है। उत्पादन क्षेत्र से लेकर हर वर्ग को इसका लाभ मिलता है, लेकिन इसके लिए मुख्य आधार मानसून है, क्योंकि आज भी  देश की 80 फीसदी कृषि मानसून के रुख पर निर्भर रहती है।

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