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डॉलर पर भी कोरोना महामारी की मार, मूल्य में गिरावट बढ़ा रही दुनिया की चिंता
Mon, 01 Feb 2021 04:36 PM IST
योगेश साहू
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, न्यूयॉर्क।
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, न्यूयॉर्क।
Published by: योगेश साहू
Updated Mon, 01 Feb 2021 04:36 PM IST
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डॉलर के घट रहे मूल्य को लेकर फिक्र बढ़ रही है। इसे कोरोना महामारी की मार से पीड़ित वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक और बड़ी चिंता माना जा रहा है। अमेरिकी सरकार पर बढ़ रहे कर्ज के बोझ का दबाव अब डॉलर पर महसूस किया जा रहा है। खरबों डॉलर का कोरोना राहत पैकेज देने के कारण ये बोझ पिछले एक साल में काफी बढ़ गया है। अब अर्थशास्त्रियों का कहना है कि डॉलर की जो कीमत आज है, उसकी सैद्धांतिक कीमत उससे 9 फीसदी नीचे गिर चुकी है।
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अर्थशास्त्रियों का कहना है डॉलर के अवमूल्यन से अमेरिका में मुद्रास्फीति बढ़ने की आशंका है। उस हालत अमेरिकी सेंट्रल बैंक- फेडरल रिजर्व- नोट छापकर मुद्रा सप्लाई बढ़ाने की नीति पर रोक लगा सकता है। इससे अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ेंगी। उसका नतीजा यह हो सकता है कि निवेशक दुनिया भर के शेयर बाजारों से पैसा निकाल कर अमेरिकी शेयरों में लगाना शुरू कर दें। इससे बाकी दुनिया में शेयर के भाव गिरने की स्थिति पैदा होगी।
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अर्थशास्त्रियों के मुताबिक फेडरल रिजर्व ने नीति बदली तो उसका एक और असर उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में महसूस हो सकता है। इन देशों के ऊपर ऐसे कर्ज का बड़ा बोझ है, जो डॉलर मुद्रा में लिया गया है। अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने का मतलब इस बोझ में और बढ़ोतरी होना होगा।
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ताजा विनियम दर सूचकांक के मुताबिक डॉलर का मूल्य इस समय पिछले तीन साल के सबसे निचले स्तर पर है। ये इंडेक्स बैंक फॉर इंटरनेशन सेटलमेंट तैयार करता है। इसे 60 देशों की मुद्राओं के मूल्य की तुलना के आधार पर तैयार किया जाता है। इसके मुताबिक जनवरी में यूरो का मूल्य 33 महीनों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। जापान की मुद्रा आज प्रति डॉलर 104 येन हो गई है, जबकि यह पिछले साल 109 थी। उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों की मुद्राओं की कीमत भी डॉलर के मुकाबले चढ़ी है। चीन की मुद्रा- युवान जनवरी में दो साल से उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। फिलहाल एक डॉलर 6.42 युवान के बराबर हो गया है।
जानकारों के मुताबिक ये ट्रेंड इसलिए दिख रहा है कि अमेरिकी सरकार पर कर्ज की मात्रा में बाकी देशों की तुलना में ज्यादा तेजी से इजाफा हुआ है। अमेरिका में कोरोना महामारी आने के बाद प्रोत्साहन पैकेज का एलान किया गया था। इसके तहत कंपनियों को बेलआउट पैकेज दिए गए, आम घरों को कैश ट्रांसफर किया गया और बेरोजगारी भत्तों में बढ़ोतरी हुई। लेकिन इस पैकेज से असली अर्थव्यवस्था को कोई लाभ नहीं हुआ। कंपनियों ने पैकेज से मिले धन को शेयर मार्केट में लगा दिया। 2020 में अमेरिकी शेयर बाजारों में 3.7 खरब डॉलर की रकम लगी थी, जो एक साल पहले से 25 फीसदी ज्यादा है। जापान और यूरोप में भी शेयर बाजार उछले, लेकिन वहां ये उछाल दस फीसदी से कम रही।
अब जो बाइडन प्रशासन ने 1.9 खरब डॉलर के नए कोरोना पैकेज का एलान कर दिया है। अभी कांग्रेस (संसद) ने इसे मंजूरी नहीं दी है, लेकिन मंजूरी मिलने के बाद अमेरिकी सरकार पर कर्ज और बढ़ेगा। इसीलिए मुद्रास्फीति बढ़ने और ज्यादा नोट छापने की नीति पर रोक के अनुमान अब लगाए जा रहे हैं। द फाइनेंशियल टाइम्स से जुड़ी वेबसाइट निक्कई एशिया की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि डॉलर की कीमत में गिरावट से वैश्विक वित्तीय बाजार में उथल-पुथल मच सकती है। इसका बहुत खराब असर यूरोप और जापानी अर्थव्यवस्था पर भी दिख सकता है। इन सबके असर से बाकी दुनिया भी बची नहीं रह सकेगी।
निक्कई एशिया के मुताबिक 2013 में फेडरल रिजर्व के तत्कालीन चेयरमैन बेन बरनान्के ने नोट छापने की नीति (क्वैंटिटेटिव ईजिंग) खत्म होने करने की चर्चा की थी। उनके एक बयान भर से तब सरकारी बॉन्ड्स के भाव बढ़ गए थे, जबकि शेयर बाजारों में तेज गिरावट आई थी। तब उस घटना को अर्थशास्त्रियों ने ‘टैपर टैंट्रम’ कहा था। अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि अब वास्तव में दुनिया के सामने टैपर टैंट्रम का खतरा है।