1960 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध चरम पर था। अंतरिक्ष में भी एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ लगी हुई थी। अंतरिक्ष की इस रेस में सोवियत संघ, अमेरिका से आगे चल रहा था। उसने अंतरिक्ष में अमेरिका से पहले इंसान भेजने में कामयाबी हासिल की थी। इसलिए, अमेरिकी सरकार भी सोवियत संघ से पहले चांद पर इंसान को भेजना चाहती थी।
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चंद्रमा की सतह
- फोटो : Social media
अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी ने नासा के सामने लक्ष्य रखा था कि वो इंसान को चांद पर सोवियत संघ से पहले भेजने के मिशन को अंजाम दे। लिहाजा नासा ने चांद पर इंसान को तो भेजा ही। साथ ही अमेरिकी स्पेस एजेंसी ने ये भी साबित करने की कोशिश की कि जब उसके अंतरिक्ष यात्री चांद पर गए तो उन्होंने कुछ नायाब काम किया।
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चंद्रमा की सतह
- फोटो : Social media
अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर भेजने से पहले उन्हें भूगर्भ शास्त्र की जानकारी जरूरी थी। इसके लिए उन्हें हवाई द्वीप, मेक्सिको, आइसलैंड और जर्मनी जैसे देशों का दौरा कराया गया। यहां, अंतरिक्ष यात्रियों को चट्टानों, ज्वालामुखी के बनने-बिगड़ने और उल्का पिंडों की वजह से होने वाले गड्ढों के बारे में जानकारी दी गई। अपोलो 15 कमांड मॉड्युल के पायलट अल वर्डेन का कहना है कि इन दौरों से मिली जानकारी उनके लिए काफी महत्वपूर्ण थी।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
चांद पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री अपने साथ हथौड़े, ड्रिल मशीन और कुदाल ले गए गए थे ताकि खुदाई करने की सूरत में उनका इस्तेमाल किया जा सके, लेकिन अल वर्डेन लूनर ऑर्बिट में ज्यादा बड़े पैमाने पर अवलोकन कर रहे थे। वो ऐसी चीजें तलाश करने की कोशिश कर रहे थे, जिससे वो साबित कर सकें कि उन्होंने सबसे अलग काम किया है।
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चांद की सतह
- फोटो : File photo
अपोलो 17 मिशन के तहत चांद पर जाने वाले पहले और इकलौते भूगर्भशास्त्री हैं, हैरिसन श्मिट। चांद पर उन्हें चट्टानों के छोटे-छोटे मोती जैसे टुकड़े मिले जो इस बात के सबूत हैं कि चांद पर भी चट्टानों के बनने और टूटने की प्रक्रिया चलती रहती है। वो 741 टुकड़े नमूने के तौर पर साथ लाए थे, जिनका वजन 111 किलो था। चांद से करीब 2200 चट्टानों और मिट्टी के बहुत से नमूने लाकर अमेरिका के ह्यूस्टन की प्रयोगशाला में रखे गए, जिन पर अब तक रिसर्च हो रही है।