भूमध्य सागर में स्थित देश साइप्रस पिछले करीब 45 साल से दो हिस्सों में बंटा हुआ है। इसकी राजधानी निकोसिया भी तुर्की और ग्रीस के बीच कब्जे की लड़ाई की शिकार है। 1974 में तुर्की की सेना ने साइप्रस पर हमला करके इसके एक हिस्से पर कब्जा कर लिया था। साइप्रस में यूनानियों और तुर्की मूल के लोगों की आबादी कमोबेश बराबर है। 1974 में जंग के बाद तुर्की ने साइप्रस के 40 फीसदी हिस्से पर अपना अधिकार जमा लिया। आखिरकार जब युद्ध विराम हुआ, तो देश दो हिस्सों में बंट गया।
दुनिया का इकलौता ऐसा शहर, जो दो देशों के बीच बंटा हुआ है
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30 साल पहले बर्लिन की दीवार गिरने के बाद निकोसिया ही दुनिया का इकलौता शहर है जो दो देशों के बीच बंटा हुआ है। 1974 में हुए युद्ध विराम के बाद तुर्की और ग्रीस के कब्जे वाले इलाकों के बीच में 180 किलोमीटर लंबा गलियारा संयुक्त राष्ट्र ने बनाया था, जो निकोसिया के बीच से गुजरता है। इसे ग्रीन लाइन कहा जाता है।
बंटवारे की वजह से साइप्रस की 25 फीसदी आबादी बेमुल्क और बेघर हो गई थी। तुर्की के कब्जे वाले इलाके में रहने वाले यूनानी मूल के करीब डेढ़ लाख लोगों को निकाल दिया गया था। इसी तरह यूनान के कब्जे वाले इलाके से तुर्की मूल के 50 हजार लोगों को निकाल दिया गया था। निकोसिया की रहने वाली मारिया बाल्ताजी उन लोगों में से हैं जिनका परिवार इस बंटवारे का शिकार हुआ था। उनके चाचा जॉर्ज डेविड, पेट्रा नाम के गांव में पले-बढ़े थे। जंग के दौरान ये बर्बाद हो गया था। अब ये ग्रीन लाइन में पड़ता है। यहां आबादी अब नहीं बची है। बाल्ताजी के परिवार की 45 हेक्टेयर जमीन इसी इलाके में पड़ती है। इनमें करीब छह हजार जैतून के पेड़ हैं, जिनमें से कुछ तो हजार साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इस इलाके में संयुक्त राष्ट्र की सेनाएं गश्त लगाती रहती हैं।
2003 के बाद से इस इलाके में बिछी बारूदी सुरंगों को हटाने का काम शुरू हुआ था। करीब 27 हजार बारूदी सुरंगें साफ की गईं, जिसके बाद यहां लोगों को खेती करने की इजाजत दे दी गई है। मारिया बाल्ताजी का ख्वाब था कि वो अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करें। छह साल पहले अपने देश लौटने के बाद मारिया ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर खेती के नए तरीकों को अपनाया और अब वो अपने गांव में ऑर्गेनिक फार्म चलाती हैं। उन्होंने ग्रीस की राजधानी एथेंस में अपनी मार्केटिंग की नौकरी छोड़कर ये काम शुरू किया है। उनके दोस्त नेतिएन इस मिशन में साझीदार हैं। बरसों से वीरान पड़ी जमीन पर फसलें लहलहाने लगी हैं।
जब मारिया के दोस्त नेतिएन ने छह साल पहले ये जमीन देखी थी, तो ये इलाका सूखा हुआ था। वजह ये थी कि साइप्रस के लोगों को इस बफर जोन में आने की इजाजत नहीं थी। यहां बारूदी सुरंगें बिछी होने से उनकी जान को खतरा था, लेकिन बारूदी सुरंगें हटाए जाने के बाद यहां खेती शुरू हो चुकी है। नेतिएन कहते हैं कि, 'यहां पर 1974 के बाद से कीटनाशकों का छिड़काव नहीं हुआ था। यानी यहां कीड़े-मकोड़ों की तमाम नस्लें बची हुई थीं। इसका फायदा ये है कि जैतून पर लगने वाले कीड़े, पेड़ पर पहुंचें उससे पहले ही उन्हें शिकारी जीव चट कर जाते हैं।'