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आखिर गलवां घाटी, लद्दाख, डेपसांग और फिंगर एरिया को कितना जानते हैं आप? हैरान कर देगा इतिहास

Sun, 28 Jun 2020 04:40 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Sun, 28 Jun 2020 04:40 PM IST
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India China border dispute Interesting facts about galwan valley Ladakh Depsang and finger area
गलवां घाटी - फोटो : Social media

लद्दाख अपनी खूबसूरती और दुर्गम पहाड़ी इलाके की वजह से मशहूर है। बीते कई सप्ताह से ये इलाका भारत-चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर सुर्खियों में बना हुआ है। हाल में ही केंद्र शासित प्रदेश बने लद्दाख की एक अलग ही भौगोलिक संरचना है। यहां की पहाड़ियां हिमालय पर्वत श्रृंखला का हिस्सा हैं। यहां झीलें हैं, बर्फ से ढंके पहाड़ हैं और संकरे दर्रे हैं। हिमालय के भू-भाग को समझे बिना भारत और चीन के बीच चल रहे मौजूदा विवाद को समझ पाना मुश्किल है। 

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तिब्बत का खूबसूरत नजारा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

कैसे बना तिब्बत और भारतीय भूभाग?

करोड़ों साल पहले नियो टेथिस महासागर की लहरें जिस तट से टकराईं, उसे आज के वक्त में तिब्बत कहा जाता है। उस वक्त, इंडियन प्लेट कहीं मौजूद नहीं थी। देहरादून स्थित सरकारी संस्थान वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (डब्ल्यूआईएचजी) के वैज्ञानिक प्रदीप श्रीवास्तव के मुताबिक, 'चार-पांच करोड़ साल पहले भारतीय प्लेट पैदा हुई और इसकी एशियन प्लेट (मौजूदा तिब्बत) से टक्कर ऐसी ही दूसरी घटनाओं के जैसी थी।' 

धीरे-धीरे भारतीय प्लेट नीचे चली गई और यह पूरा महासागर आसपास बिखर गया। झीलें और नदियां जो कि अब तक मौजूद नहीं थीं, अस्तित्व में आ गईं। साथ ही विशाल पहाड़ों की एक श्रृंखला का भी जन्म हुआ। श्रीवास्तव कहते हैं, 'इस टक्कर ने सब कुछ बदल दिया। हिमालय पर्वत अस्तित्व में आया। मॉनसून की हवाएं इस इलाके में पहुंचकर रुकने लगीं। ऐसे में एक हरा-भरा लद्दाख एक शुष्क और बेहद ठंडे रेगिस्तान में तब्दील हो गया। बारिश अब पहाड़ों में अंदर नहीं पहुंच सकती थी।'

ऐसे में टक्कर या टकराव ही इसकी खासियत है। लद्दाख पहले की तरह अभी भी वही टकराव का इलाका है। यह एक अति-प्राचीन भौगोलिक घटना थी। अब इस इलाके के इतिहास पर नजर डालते हैं। 

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लद्दाख का खूबसूरत नजारा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media

वक्त के साथ बदल गए खिलाड़ी

1834 में डोगरा योद्धा गुलाब सिंह ने लद्दाख पर कब्जा कर लिया था। उन्होंने इसे रणजीत सिंह के अधीन फैल रहे सिख साम्राज्य में शामिल कर दिया था। 'अंडरस्टैंडिंग कश्मीर एंड कश्मीरीज' में क्रिस्टोफर स्नेडेन ने इसे गुलाब सिंह द्वारा हासिल की गई सबसे अहम उपलब्धि बताया है। इसकी वजह यह थी कि लद्दाख पर कब्जे से उन्हें स्थानीय बकरियों से पैदा होने वाली ऊन के कारोबार पर नियंत्रण की ताकत मिल गई थी। 

तिब्बती-चीनी सैनिकों के हाथों इस इलाके को गंवाने के बाद उन्होंने 1842 में इस पर फिर से कब्जा कर लिया। साथ ही 1846 में जम्मू और कश्मीर का महाराजा बनने के वक्त उन्होंने इसे अपने राज्य का अभिन्न हिस्सा बना लिया। 101 साल बाद नए बने भारत और पाकिस्तान ने इसे लेकर जंग छेड़ दी। 1950 से लेकर आज के दिन तक भारतीयों और चीनियों के बीच इस इलाके को लेकर कभी सहमति नहीं बन सकी। 

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पूर्वी लद्दाख का खूबसूरत नजारा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media

आखिर कैसा है लद्दाख?

बीते कई सप्ताह से डेपसांग, दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ), गलवां, पैंगॉन्ग सो, फिंगर एरिया और डेमचोक समेत कई इलाकों का जिक्र मीडिया रिपोर्ट्स में लगातार हो रहा है, लेकिन क्या आपने सोचा है कि लद्दाख वाकई में कैसा दिखता है? इन्हीं इलाकों के लिए बगैर तय की गई चीनी-भारतीय सीमा रेखा या लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी या वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर दोनों देशों के अपने-अपने दावे हैं और इसे लेकर भारत और चीन आमने-सामने आ खड़े हुए हैं। 

2018 में डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी के पद से रिटायर हुए लेफ्टिनेंट जनरल एस. के. पत्याल उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं जिन्हें लद्दाख की गहरी समझ है। पत्याल बताते हैं, 'अगर आप भारतीय सीमा में खड़े हैं और चीन की तरफ देख रहे हैं तो पूर्वी लद्दाख एक कटोरे के जैसा दिखेगा। आपके बायीं तरफ काराकोरम दर्रे की सबसे ऊंची चोटी होगी, जिसके बाद डीबीओ और फिर गलवान इलाका पड़ता है। इसके आगे नीचे की तरफ पैंगॉन्ग लेक है। जैसे-जैसे आप दायीं तरफ बढ़ते जाते हैं ये सब ऊंचाई के लिहाज से कम होते जाते हैं। डेमचोक तक चीजें तकरीबन फ्लैट हैं, लेकिन डेमचोक के बाद ऊंचाई फिर से बढ़ने लगती है। इस तरह से एक कटोरे जैसी शक्ल पैदा होती है।' 

पत्याल लेह स्थित आर्मी की 14वीं कोर की अगुवाई कर चुके हैं। यह भारतीय आर्मी की एक खास फॉर्मेशन है। पाकिस्तान और चीन दोनों से इलाके की सुरक्षा का जिम्मा इसी कोर के हाथ है।  

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डीबीओ के पास का इलाका - फोटो : Social media

लद्दाख की सुरक्षा करने में किस तरह की मुश्किलें आती हैं?

लेफ्टिनेंट जनरल पत्याल कहते हैं, 'पूर्वी लद्दाख में कुछ जगहें सियाचिन ग्लेशियर जितनी मुश्किल भरी हैं। हकीकत में, डीबीओ एक ऐसी जगह है जहां पर चाहे सर्दी हो या गर्मी, आप कुछ मिनट से ज्यादा खुले में खड़े नहीं रह सकते हैं। यहां तेज हवा और ठंड आपको टिकने नहीं देती है।' 

पत्याल बताते हैं, 'घाटियों के इर्द-गिर्द के इलाके कम मुश्किल भरे हैं। खासतौर पर गर्मियों में यहां ज्यादा दिक्कत नहीं होती है। श्योक घाटी इस मुकाबले में ज्यादा मुश्किल वाली जगह है। इतनी ऊंचाई पर इंसानों की सहनशीलता के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है। मिसाल के तौर पर, वजन लेकर चलने की क्षमता कम हो जाती है। चट्टानी इलाका होने से खंदक या बंकर खोदने में ज्यादा वक्त लगता है। किसी दूसरी जगह पर जो काम करने में कुछ घंटे लगते हैं उन्हें यहां करने में 7-8 दिन का वक्त लग जाता है। मशीनरी लाने-ले जाने में भी मुश्किलें आती हैं।'  

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