13 फरवरी 1254 का वो दिन था, जब इराक की राजधानी बगदाद में कत्लेआम मचा था और ये कत्लेआम मचाया था मंगोल शासक चंगेज खान के पोते हलाकू खान ने। इसे इतिहास की सबसे खौफनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। उस समय बगदाद इस्लाम का सबसे शक्तिशाली केंद्र माना जाता था, जिसे मंगोलों ने एक झटके में तबाह कर दिया था।
2 of 7
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Social media
हलाकू खान के कत्लेआम में कितने लोग मारे गए, इसका अंदाजा लगाना तो मुश्किल है, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसमें दो लाख से लेकर 10 लाख लोग बेरहमी से तलवार, तीर या भाले से मार डाले गए थे। इतिहास की कुछ किताबों में लिखा है कि बगदाद की गलियां उस समय लाशों से अटी पड़ी थीं। जब लाशें सड़ने लगीं और उनसे दुर्गंध निकलने लगी तो मजबूरन हलाकू खान को शहर से बाहर तंबू लगाकर रहना पड़ा था।
3 of 7
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Social media
नवंबर 1254 में हलाकू की मंगोल फौज ने बगदाद की ओर कूच किया, जहां से खलीफा अपना इस्लामी राज चलता था। वहां पहुंचकर उसने अपनी सेना को पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बांटा जो शहर से गुजरने वाली दजला नदी (टाइग्रिस नदी) के दोनों किनारों पर आक्रमण कर सकें। उसने खलीफा से पहले आत्म-समर्पण करने को कहा, लेकिन खलीफा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद मंगोलों ने खलीफा की सेना पर हमला बोल दिया। आखिरकार खलीफा को हार का सामना करना पड़ा। कहते हैं कि इसके बाद मंगोलों ने कुछ सैनिकों को नदी में डूबो दिया तो कुछ तो बेरहमी से मार डाला।
4 of 7
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Social media
13 फरवरी 1254 को हलाकू खान अपनी मंगोल सेना के साथ बगदाद शहर में घुस आया और एक हफ्ते तक वहां जमकर कत्लेआम मचाया। इसके अलावा मंगोलों ने वहां मौजूद पुस्तकालयों, महल, मस्जिदों और अन्य इमारतों में भी आग लगा दी। कहते हैं कि किताबों से बहती हुई स्याही से दजला नदी का पानी काला हो गया था।
5 of 7
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Social media
कहते हैं कि बगदाद के खलीफा को तो मंगोलों ने बुरी तरह मौत दी। उसे एक कालीन में लपेट दिया गया और उसके ऊपर से तब तक घोड़े दौड़ाए गए, जब तक उसने दम नहीं तोड़ दिया। वहीं, महान खोजकर्ता मार्को पोलो के मुताबिक, खलीफा को भूखा मारा गया।