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नीतीश कुमार के बिना क्या होगा बिहार में?

Wed, 21 May 2014 07:47 AM IST
उत्तम सेनगुप्ता/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी
उत्तम सेनगुप्ता/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी Updated Wed, 21 May 2014 07:47 AM IST
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a analysis of bbc on nitish kumar and his politics in bihar

नवम्बर 2012 की बात है। नीतीश कुमार पाकिस्तान के दौरे पर थे। उन्होंने प्राचीन बौद्ध शिक्षण केंद्र तक्षशिला के साथ-साथ जूलियान बौद्ध मठ जाने की इच्छा भी जताई थी। जूलियान बौद्ध मठ के बारे में कहा जाता है कि अर्थशास्त्र के लेखक चाणक्य करीब 3000 हज़ार साल पहले यहां पढ़ाया करते थे।

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जूलियान संग्रहालय में बौद्ध की एक प्रतिमा है जिसकी नाभि में छेद बना हुआ है। मान्यता है कि कोई इस छेद पर अंगुली रखकर कुछ प्रार्थना करे, तो वह प्रार्थना पूरी हो जाती है। नीतीश कुमार की जीवनी (द सिंगल मैन, हार्पर कॉलिंस प्रकाशन) के लेखक और पत्रकार संकर्षण ठाकुर उस यात्रा में नीतीश के साथ थे।
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उन्होंने नीतीश की जीवनी में लिखा है कि बौद्ध की प्रतिमा के सामने नीतीश शांति से खड़े हुए और बाक़ी लोगों को बाहर जाने का अनुरोध किया। इसके बाद उन्होंने बौद्ध की प्रतिमा पर बने छेद पर अंगुली रखते हुए प्रार्थना की।
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हो सकता है कि उन्होंने अपने राज्य की ख़ुशहाली की प्रार्थना की हो या फिर उनकी प्रार्थना व्यक्तिगत रही हो। उन्होंने क्या प्रार्थना की, यह सिवाए उनके कोई नहीं जानता।

क्या से क्या हो गया?

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तब नीतीश कुमार का जलवा था। पाकिस्तान में उनका जोरदार स्वागत हुआ था। नरेंद्र मोदी गुजरात तक सिमटे थे। बिहार में जनता दल यूनाइटेड के भारतीय जनता पार्टी से अलग होने में आठ महीने का वक्त था।

यह वह दौर था जब उन्हें राजग गठबंधन में स्वीकार्य प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन उसके बाद हालात बदलते गए। दो साल से भी कम समय में उन्हें चुका हुआ बताया जा रहा है। चुनावी नाकामी के बाद उन्हें राजनीति में मिसफिट माना जा रहा है। यही राजनीति की प्रकृति है।

बावजूद इसके नीतीश राजनीति और इतिहास दोनों के गंभीर छात्र बने हुए हैं। ठीक वैसे ही जैसे जूलियाना संग्रहालय में वो नज़र आए थे। इसलिए नीतीश पूरी तरह से चूक गए हों, कहना जल्दबाज़ी भरा होगा।

आम चुनाव में बेहद औसत प्रदर्शन के साथ दो सीटें जीतने के बाद  मुख्यमंत्री पद से उनका इस्तीफ़ा पहले से तय फ़ैसला था, क्योंकि उनके पास कोई विकल्प ही नहीं था।

पिछले कुछ समय से नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी को जोरदार जीत दिलाकर प्रधानमंत्री बनने जा रहे नरेंद्र मोदी के आपसी संबंध अच्छे नहीं रहे हैं। यह सच किसी से छुपा हुआ नहीं है।

मोदी से नीतीश के मतभेद

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दरअसल दोनों नेता ना एक दूसरे की शख्सियत, ना ही उपलब्धि और ना ही राजनीति के बारे में सोचना चाहते हैं।

नरेंद्र मोदी ने 2011 के अपने बिहार दौरे के दौरान पटना से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में पूरे पन्ने का विज्ञापन दिया था। इस विज्ञापन का भुगतान गुजरात में मौजूद बिहार के दोस्तों के नाम से किया गया था।

इस विज्ञापन में 2009 के आम चुनाव से पहले लुधियाना रैली की वह तस्वीर प्रकाशित हुई थी जिसमें मोदी और नीतीश ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था। इस विज्ञापन को देखकर नीतीश कुमार बुरी तरह भड़के थे और उन्होंने भाजपा नेताओं के सम्मान में प्रस्तावित भोज को रद्द कर सार्वजनिक तौर पर मोदी का अपमान किया था।

इस पृष्ठभूमि के साथ चुनावी हार की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के अलावा नीतीश कुमार के पास वाकई में कोई विकल्प नहीं था। वे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए प्रधानमंत्री मोदी को ब्याज़ के साथ अपमान का बदला लेने का मौका नहीं दे सकते थे।

नीतीश कुमार के लिए बुरा वक्त

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यह वास्तविकता से परे होता है कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आने का इंतज़ार करते या फिर लंबे समय से बिहार को विशिष्ट राज्य का दर्जा दिए जाने या विशेष पैकेज की मांग पर उनके फ़ैसले का इंतज़ार करते।

ये वैसे मुद्दे थे जिसके चलते मोदी नीतीश कुमार को बार-बार उनकी हार की याद दिलाते रहते।

ऐसे में अब महत्वपूर्ण यह है कि क्या केंद्र की भाजपा या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार बिहार के लिए कोई विज़न डॉक्यूमेंट लाती है या नहीं। भले ही देर से ही सही। संक्षेप में कहें तो  नीतीश कुमार के लिए बुरा वक्त चल रहा है और वे इस वक्त कुछ कर भी नहीं सकते।

स्थिरता का है सवाल

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ऐसे में बिहार के लिए क्या बचता है? मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपने विश्वासपात्र को बिठाने के साथ नीतीश कुमार ने यह साफ़ कर दिया है कि राज्य सरकार अगले चुनाव तक चलती रहेगी। (राजद और कांग्रेस के पास भी इस सरकार को समर्थन जारी रखने के सिवाय बेहद सीमित विकल्प हैं।)

अगर कानून व्यवस्था की सूरत भंग नहीं हो या फिर जनता दल यूनाइटेड के विधायकों की संख्या में कमी नहीं हो तो यह सरकार चलेगी।

अपने इस कदम के साथ ही नीतीश कुमार ने उस राज्य की भाजपा को चुप तो करा दिया है जो लोकसभा चुनाव में हार के बाद उनसे इस्तीफ़े की मांग कर रही थी। इसके साथ-साथ उन्होंने पार्टी के अंदर अपने आलोचकों का भी मुंह बंद करा दिया है।

हालांकि केंद्र सरकार में शामिल होने वाले कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री मोदी से बिहार के लिए विशेष पैकेज हासिल करने की कोशिश करेंगे।

लेकिन नीतीश कुमार खुद को शहीद के तौर पर प्रोजेक्ट करने के लिए स्वतंत्र होंगे और संगठन के कामों पर ध्यान भी दे पाएंगे। इस आम चुनाव में उनकी पार्टी को राज्य के अंदर करीब 17 फ़ीसदी मत मिले हैं।

अस्थिरता का गवाह रहा बिहार

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यह स्थिति तब थी, जब मीडिया ने उन्हें खत्म हुआ घोषित कर दिया था और राजद-कांग्रेस गठबंधन के बेहद मज़बूत होकर उभरने की बात कही जा रह थी। इन दोनों समूह को करीब 47 फ़ीसदी मत मिले। भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दल से ज़्यादा।

ऐसे में साफ़ है कि बिहार की राजनीतिक जमीन पर स्थिरता आने में वक्त लगेगा। इस दौरान नीतीश कुमार अपनी सोशल इंजीनियरिंग पर ध्यान दे पाएंगे।

अभी बिहार सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती न केवल क़ायम रहने की बल्कि प्रदर्शन करने की है। अतीत में बिहार कई बार राजनीतिक अस्थिरता का गवाह रहा है। वहां पांच दिन से लेकर 100 दिन से कम समय तक के लिए भी कई मुख्यमंत्री रहे हैं।

नीतीश की चुनौती

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इसलिए जनता दल यूनाइटेड सरकार की स्थिरता बेहद अहम मुद्दा है, लेकिन अगर कानून व्यवस्था में किसी तरह की गड़बड़ी और दंगे की स्थिति होगी तो राजग सरकार राज्य सरकार को बर्खास्त कर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर सकती है।

वहीं, नीतीश कुमार के सामने दीर्घकालीन चुनौती पार्टी को अगले चुनाव के लिए तैयार करना है। भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी नीतीश की तुलना में 2019 के चुनाव के दौरान बेहतर स्थिति में होंगे।

नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी की तरह की प्रतिबद्धता दिखानी होगी, हालांकि उनके पास वैसी वक्तृत्व क्षमता नहीं है और ना ही उतने संसाधन, लेकिन राजनीति में पांच साल का वक्त काफी लंबा होता है और उसमें कुछ भी हो सकता है।

हालांकि राज्य के भाद नेता मौजूदा स्थिति से निराश होंगे। वे राज्य में सरकार नहीं बना पाए। वह तब जब नीतीश के आधे विधायक पाला बदलने का संकेत दे चुके थे। ऐसे में वे नीतीश को ड्रामेबाज कह रहे हैं और उनके इस्तीफ़े को नौटंकी।

लग तो यही रहा है कि देश में सबसे बेहतरीन और खर्चीले चुनावी अभियान को पूरा करने वाली पार्टी के पास विशेषणों की कमी हो गई है। हालांकि उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि पद छोड़ चुके नीतीश कुमार उनके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तुलना में बड़ा कांटा साबित हो सकते हैं।

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