आंकड़ों में बिहार चुनाव, कौन बनाएगा नई सरकार?
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बिहार चुनाव के एग्जिट पोल आ चुके हैं, पर जनादेश किसे मिलेगा अभी यह बात कोई नहीं जानता है। चुनावी राजनीति जब देश की राजधानी से होते हुए राज्यों की राजधानी तक पहुंचती है तो यहां सारे समीकरण और जोड़-तोड़ बदल चुके होते हैं। जो कल तेरा था वो आज मेरा है, वाली तस्वीर नजर आने लगती है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2015 का परिणाम जब आएगा तो पता चलेगा कि किस पार्टी की बयानबाजी मतदाताओं को रिझाने में कामयाब रही। अगर किसी पार्टी को ज्यादा वोट मिल गए तो, इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी सरकार बन रही है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2010 के आंकड़े यही बात बहुत खामोशी के साथ बयां कर रहे हैं। यही बात लोकसभा चुनाव 2014 में साबित हो चुकी है। लोकसभा चुनावों के आंकड़ो की तरफ निगाह डाले तो पता चलता है कि कैसे देश की राष्ट्रीय पार्टी बहुजन समाज पार्टी 1 करोड़ से ज्यादा वोट पाने के बाद भी चुनावों में एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी।
चलेगा नए मतदाताओं का जादू
बिहार विधानसभा चुनाव 2010 में कुल 5,51,20656 मतदाता अपने मतों का प्रयोग कर सकते थे। लेकिन सिर्फ 2,90,34705 मतदाताओं ने अपने वोट का प्रयोग किया और नई सरकार बन गई।
बिहार विधानसभा चुनाव में 2010 में सबसे ज्यादा वोट नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड(जदयू) को मिले थे। कुल 65,61,906 करीब 22.58% वोट पाकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जदयू उभरी। जदयू ने 141 सीटों पर चुनाव लड़ा और 115 सीटें अपने खाते में कर लीं। वहीं लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल(राजद) को 54,75,656 करीब 18.84% वोट मिलने के बावजूद सिर्फ 22 सीटें ही मिल पाईं। लालू की पार्टी की पार्टी ने 168 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
वहीं भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) ने 102 सीटों पर चुनाव लड़ा और 47,90,436 करीब 16.49% मत पाकर कुल 91 सीटें अपने खातें में कर ली थी। अगर तुलना की जाए तो राजद को बीजेपी से कुल 6,85,220 वोट ज्यादा मिले थे। इसके बावजूद राजद, बीजेपी से 69 सीटें कम ही जीत पाया।
बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में कुल वोटों की संख्या 6,68,26658 है जबकि वर्ष 2010 में यह संख्या 5,51,20656 थी। बिहार विधानसभा में इस वर्ष नए वोटरों की कुल संख्या 1,17,06002 है। अगर आंकड़ो पर गौर करें तो पाएंगे कि बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में नए वोटरों की संख्या इतनी ज्यादा है कि विधानसभा चुनाव 2010 में किसी भी एक पार्टी को इतने वोट नहीं मिले थे।
ऐसे में यह वोट बैंक किसके खाते में गया और कौन इसे रिझा पाएगा, यह बात बिहार विधानसभा चुनाव 2015 के चुनाव परिणाम आते ही साफ हो जाएगी।
महिलाओं का साथ किसे मिलेगा?
बिहार विधानसभा 2010 के चुनावों में कुल 35 महिला प्रत्याशी विजयी हुई थीं। इनमें से 22 सीटें जदयू के खाते में और 12 सीटें भाजपा को मिली थी। बाकी की एक सीट अन्य के खाते में गई थी। तब भाजपा और जदयू ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। पर इस बार तस्वीर अलग है और जदयू और राजद मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।
बिहार में पांच चरण में हुए मतदान में महिलाओं ने वोटिंग के मामले में पुरूषों को पीछे छोड़ दिया है। पांचों चरणों में महिलाओं ने क्रमश: 59.50%, 57.50%, 54.00%, 60.40%, 63.60% वोटिंग कर पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने कुल 7.55 फीसदी अधिक वोट किया है। ऐसे में महिलाओं की यह आक्रामक वोटिंग इस बार चुनावी परिणामों को नया मोड़ दे सकती है।
राजनीतिक टीकाकार कह रहे हैं कि नीतीश कुमार के राज में महिलाओं को सुरक्षा अधिक मिली है और लड़कियों को पढ़ने की सुविधा बढ़ी है इसलिए कोई वजह नहीं दिखती कि वे नीतीश के खिलाफ जाएं। लेकिन ऐसा हुआ कि नहीं यह नतीजे ही बताएंगे।
अभी यह बात भी साफ नहीं हो सकी है कि वास्तव में एंटी इनकंबेंसी किसके पक्ष में है और किसके खिलाफ। एंटी इनकंबेंसी फैक्टर सत्ता में रहने वाली पार्टी के खिलाफ जाता है। ऐसे में पिछले 10 वर्षों में जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार रही है। यानी भाजपा भी सत्ता का हिस्सा रही है. भले ही चुनाव में दोनों पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ थीं लेकिन एंटी इनकंबेंसी किसके खिलाफ काम कर रहा है? इसका शिकार कौन होगा, सिर्फ जदयू या फिर भाजपा भी? यह भी 8 नवंबर की शाम तक साफ हो जाएगा।