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रामविलास पासवान का 74 वर्ष की उम्र में निधन, जानें बिहार की राजनीति में क्या था उनका रुतबा

Thu, 08 Oct 2020 10:08 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: देव कश्यप Updated Thu, 08 Oct 2020 10:08 PM IST
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Union Minister and LJP leader Ram Vilas Paswan passes away know his importance in Bihar politics amid Bihar Election 2020
रामविलास पासवान (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान (74) का गुरुवार को अस्पताल में निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। पासवान की हाल ही में हार्ट सर्जरी हुई थी। उनके बेटे चिराग पासवान ने ट्वीट करके पिता के निधन की जानकारी दी। चिराग ने लिखा, 'पापा... अब आप इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मुझे पता है आप जहां भी हैं हमेशा मेरे साथ हैं। Miss you Papa...' आइए आपको बताते हैं रामविलास पासवान की जिंदगी से जुड़ी कुछ अहम बातें और बिहार की राजनीति में क्या था उनका रुतबा।

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पुलिस अधिकारी की नौकरी छोड़ राजनीति में आए
बिहार के खगड़िया जिले में एक अनुसूचित जाति के परिवार में पांच जुलाई 1946 को रामविलास पासवान का जन्म हुआ था। उन्होंने बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी झांसी से एमए और पटना यूनिवर्सिटी से एलएलबी की। एमए और एलएलबी करने के बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयारी शुरू की थी। उन्होंने बिहार की प्रशासनिक सेवा परीक्षा पास की और वे पुलिस उपाधीक्षक यानी डीएसपी के पद के लिए चुने गए। हालांकि किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और वह राजनीति में आ गए।
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पहली बार 1969 में वह अलौली विधानसभा से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और विधानसभा पहुंचे। इसके बाद पासवान ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1977 में छठी लोकसभा में पासवान जनता पार्टी के टिकट पर हाजीपुर से लोकसभा का चुनाव लड़े और सबसे अधिक वोटों के अंतर से जीतने का विश्व रिकॉर्ड बनाया।  उन्होंने हाजीपुर सीट से पहली बार चार लाख से ज्यादा मतों के रिकार्ड अंतर से जीत हासिल की।
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1982 में हुए लोकसभा चुनाव में पासवान दूसरी बार जीते। 1983 में उन्होंने दलित सेना का गठन किया। इसके बाद 1989 में रामविलास ने हाजीपुर लोकसभा सीट से अपना ही रिकॉर्ड तोड़कर नया कीर्तिमान बनाया। बाद में उनका ये रिकॉर्ड नरसिम्हा राव समेत दूसरे नेताओं ने तोड़ा।

रामविलास पासवान ने साल 2000 में जनता दल यूनाइटेड से अलगर होकर लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) का गठन किया। पार्टी में लंबे समय तक वह अध्यक्ष के पद पर रहे। साल 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने पार्टी की कमान अपने बेटे चिराग पासवान को सौंप दी और उन्हें पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

बिहार की राजनीति में एससी जाति का बड़ा चेहरा

रामविलास पासवान पिछले पांच दशक से भी ज्यादा वक्त से राजनीतिक में सक्रिय थे और देश के सबसे बड़े दलित नेताओं में उनकी पहचान होती थी। बिहार की राजनीति में भी रामविलास पासवान अनुसूचित जाति के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर कर सामने आए थे। 

रामविलास पासवान का मुश्किल दौर
2005 से 2009 रामविलास के लिए बिहार की राजनीति के हिसाब से मुश्किल दौर था। ऐसा 1984 में चुनाव हारने पर भी हुआ था, लेकिन तब उनका कद इतना बड़ा नहीं था और 1983 में बनी दलित सेना के सहारे वे उत्तर प्रदेश के कई उप-चुनावों में भी किस्मत आजमाने उतरे थे। हार तो मिली लेकिन दलित राजनीति में बसपा के समानांतर खुद को साबित करने में सफल रहे। फरवरी 2005 के बिहार विधानसभा चुनावों में, पासवान की पार्टी लोजपा ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा।


उस समय पासवान ने कहा था कि लोजपा इस बार बिहार में किंग मेकर की भूमिका निभाएगाी। 2005 में वे बिहार विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने या लालू-नीतीश की लड़ाई के बीच सत्ता की कुंजी लेकर उतरने का दावा करते रहे। एक तो नीतीश कुमार ने उनके 12 विधायक तोड़कर उनको झटका दिया और राज्यपाल बूटा सिंह ने दोबारा चुनाव की स्थिति बनाकर उनकी राजनीति को और बड़ा झटका दिया। नतीजा यह हुआ कि नवंबर 2005 में हुए चुनाव में लालू प्रसाद का 15 साल का राज गया ही, रामविलास की पूरी सियासत बिखर गई। बिहार में सरकार बनाने की चाबी अपने पास होने का उनका दावा धरा रह गया। वे चुपचाप केंद्र की राजनीति में लौट आए। लालू की तरह वे भी केंद्र में मंत्री बने रहे। हालांकि 2009 में वे यूपीए से अलग हुए, लेकिन अपनी सीट भी बचा नहीं पाए.

रामविलास पासवान 'राजनीति का मौसम वैज्ञानिक' थे
राम विलास पासवान चुनावी मिजाज भांपने में माहिर थे। चुनाव होने से पहले उन्हें अंदाजा लग जाता था कि कौन सा गठबंधन उनके लिए उपयुक्त रहेगा। राजनीतिक चालाकियों और जोड़-तोड़, उचित अवसर की पहचान और दोस्त-दुश्मन बदलने की कला में माहिर रामविलास पासवान की शुरुआती ट्रेनिंग समाजवादी आंदोलन में हुई थी।

1989 के बाद से नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की दूसरी यूपीए सरकार को छोड़ वो हर प्रधानमंत्री की सरकार में मंत्री रहे। वो तीसरे मोर्चे की सरकार में भी मंत्री रहे, कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार में भी और भाजपा की अगुआई वाली एनडीए सरकार में भी। वो देश के इकलौते राजनेता रहे, जिन्होंने छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में मंत्रिपद संभाला।

कहा जाता है कि अपने सारे राजनीतिक जीवन में पासवान केवल एक बार हवा का रुख भांपने में चूक गए, जब 2009 में उन्होंने कांग्रेस का हाथ झटक लालू यादव का हाथ थामा और उसके बाद अपनी उसी हाजीपुर की सीट से हार गए जहां से वो रिकॉर्ड मतों से जीतते रहे थे। लेकिन उन्होंने अपनी उस भूल की भी थोड़ी बहुत भरपाई कर अगले ही साल लालू यादव की पार्टी आरजेडी और कांग्रेस की मदद से राज्य सभा में जगह बना ली।


परिवार के बाहर लोजपा का कोई बड़ा नेता नहीं 
रामविलास ने परिवार से बाहर लोजपा का एक भी बड़ा नेता तैयार नहीं किया है। हालांकि इस बीच कितने अपराधियों को सांसद और विधायक बनाया, टिकट दिया, प्रकाश झा से लेकर कितने अराजनीतिक लोगों को चुनाव मैदान में उतारा। 

रामविलास ने बिहार को क्या दिया?
पांच दशकों तक राजनीति में सक्रिय रहने वाले रामविलास ने बिहार में रेल मंत्री रहते हुए अपने संसदीय क्षेत्र हाजीपुर में रेलवे का क्षेत्रीय कार्यालय खुलवाया।

रामविलास पासवान का सपना
रामविलास पासवान ने पिछले साल ही पूरी पार्टी चिराग पासवान के हवाले कर दी थी।और वही रणनीति तय कर रहे हैं।  हाल ही में जब रामविलास पासवान से यह पूछा गया था कि चिराग को आप बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में देखते हैं? तो उनका जबाब था यह तो हर बाप का सपना होना चाहिए। 

 

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