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सूर्योपासना का महापर्व छठ: दंडवत कर घाट तक पहुंचने की आस्था, यहां पूजा में समर्पण और श्रद्धा की अनोखी मिसाल
Mon, 27 Oct 2025 06:54 PM IST
तरुणेंद्र चतुर्वेदी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा
Published by: तरुणेंद्र चतुर्वेदी
Updated Mon, 27 Oct 2025 06:54 PM IST
सार
घाटों पर पहुंचने के बाद श्रद्धालु सूर्यास्त के समय संध्याकालीन अर्घ्य और अगले दिन उषा अर्घ्य देकर सूर्य देव और छठी मईया से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं। आज यह परंपरा केवल मन्नत पूरी होने का प्रतीक नहीं रही
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मन्नत से मोक्ष तक: दंडवत कर घाट पहुंचने की परंपरा बनी आस्था और आत्मबल का प्रतीक
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में हर वर्ष हजारों श्रद्धालु छठ पर्व के दौरान दंडवत करते हुए घाट तक पहुंचने की परंपरा निभाते हैं। छपरा में भी कई जगहों पर यह दूरी दो से पांच किलोमीटर तक होती है। महिलाएं और पुरुष, दोनों ही इस व्रत को समान श्रद्धा और निष्ठा से करते हैं।
घाटों पर पहुंचने के बाद श्रद्धालु सूर्यास्त के समय संध्याकालीन अर्घ्य और अगले दिन उषा अर्घ्य देकर सूर्य देव और छठी मईया से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं। आज यह परंपरा केवल मन्नत पूरी होने का प्रतीक नहीं रही, बल्कि यह आस्था, विश्वास और आत्मबल का जीवंत उदाहरण बन चुकी है। दंडवत करते हुए घाट तक जाना अब छठ पूजा की भक्ति और समर्पण का अद्भुत दृश्य बन गया है, जिसे देखकर हर कोई श्रद्धा से भर उठता है।
तप, संयम और समर्पण का पर्व
सूर्योपासना का यह महापर्व छठ पूजा न केवल आस्था का उत्सव है, बल्कि तप, संयम और समर्पण की मिसाल भी है। चार दिनों तक चलने वाले इस व्रत में श्रद्धालु कठोर नियमों का पालन करते हुए सूर्य देव और छठी मईया की उपासना करते हैं।
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दंडवत की परंपरा का धार्मिक आधार
बनियापुर प्रखंड के बेरुई छठ घाट पर दंडवत करने वाले अजय सिंह ने बताया कि इस प्रक्रिया में शरीर, मन और आत्मा तीनों की शुद्धि होती है। हर कदम पर भूमि को छूकर माथा टेकना इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य अपनी हर सांस के साथ प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहा है। धार्मिक विद्वानों का मानना है कि यह परंपरा वैदिक युग की साष्टांग दंडवत प्रणाम की अवधारणा से प्रेरित है, जो पूर्ण समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है।
ये भी पढ़ें- Chhath Puja : पटना में 500 से अधिक घाटों पर छठ महापर्व, शहर के ट्रैफिक रूट में बदलाव; जानिए कहां-कैसी व्यवस्था
लोक-आस्था की नई परंपरा
दंडवत कर छठ घाट तक जाने की परंपरा सदियों पुरानी नहीं, बल्कि पिछले कुछ दशकों में आस्था के नए रूप के तौर पर उभरी है। कई छठ व्रती बताते हैं कि उन्होंने जीवन के कठिन समय जैसे बीमारी, आर्थिक संकट या पारिवारिक परेशानी में छठी मईया से मन्नत मांगी थी। वे कहते हैं कि अगर हमारी मनोकामना पूरी होगी, तो अगले वर्ष हम दंडवत करते हुए घाट तक जाएंगे। जब उनकी प्रार्थना पूरी होती है, तो वे उस वचन को निभाते हुए दंडवत करते हुए छठ घाट पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। अब यह परंपरा केवल मन्नत पूरी करने का तरीका नहीं रही, बल्कि आभार और समर्पण की गहरी अभिव्यक्ति बन चुकी है, जो हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं को इस दिव्य पर्व से जोड़ती है।
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घाटों पर पहुंचने के बाद श्रद्धालु सूर्यास्त के समय संध्याकालीन अर्घ्य और अगले दिन उषा अर्घ्य देकर सूर्य देव और छठी मईया से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं। आज यह परंपरा केवल मन्नत पूरी होने का प्रतीक नहीं रही, बल्कि यह आस्था, विश्वास और आत्मबल का जीवंत उदाहरण बन चुकी है। दंडवत करते हुए घाट तक जाना अब छठ पूजा की भक्ति और समर्पण का अद्भुत दृश्य बन गया है, जिसे देखकर हर कोई श्रद्धा से भर उठता है।
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तप, संयम और समर्पण का पर्व
सूर्योपासना का यह महापर्व छठ पूजा न केवल आस्था का उत्सव है, बल्कि तप, संयम और समर्पण की मिसाल भी है। चार दिनों तक चलने वाले इस व्रत में श्रद्धालु कठोर नियमों का पालन करते हुए सूर्य देव और छठी मईया की उपासना करते हैं।
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दंडवत की परंपरा का धार्मिक आधार
बनियापुर प्रखंड के बेरुई छठ घाट पर दंडवत करने वाले अजय सिंह ने बताया कि इस प्रक्रिया में शरीर, मन और आत्मा तीनों की शुद्धि होती है। हर कदम पर भूमि को छूकर माथा टेकना इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य अपनी हर सांस के साथ प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहा है। धार्मिक विद्वानों का मानना है कि यह परंपरा वैदिक युग की साष्टांग दंडवत प्रणाम की अवधारणा से प्रेरित है, जो पूर्ण समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है।
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लोक-आस्था की नई परंपरा
दंडवत कर छठ घाट तक जाने की परंपरा सदियों पुरानी नहीं, बल्कि पिछले कुछ दशकों में आस्था के नए रूप के तौर पर उभरी है। कई छठ व्रती बताते हैं कि उन्होंने जीवन के कठिन समय जैसे बीमारी, आर्थिक संकट या पारिवारिक परेशानी में छठी मईया से मन्नत मांगी थी। वे कहते हैं कि अगर हमारी मनोकामना पूरी होगी, तो अगले वर्ष हम दंडवत करते हुए घाट तक जाएंगे। जब उनकी प्रार्थना पूरी होती है, तो वे उस वचन को निभाते हुए दंडवत करते हुए छठ घाट पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। अब यह परंपरा केवल मन्नत पूरी करने का तरीका नहीं रही, बल्कि आभार और समर्पण की गहरी अभिव्यक्ति बन चुकी है, जो हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं को इस दिव्य पर्व से जोड़ती है।