बिहारः कल तक खूब गरजते थे, आज गुमनाम हो गए
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बिहार में चुनाव का आगाज होते ही नेताओं की जुबान पर तल्खी बढ़ गई है तो शब्दों की मर्यादा भी टूटती जा रही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि नेताओं की जुबान पहली बार ही इस तरह बिहार में जहर उगल रही है चुनावों से पहले भी सूबे में खूब बयानवीर हुए हैं।
जिन्होंने जब तब अपने विवादित बयानों से पार्टियों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। खासकर जेडीयू नेता शिवानंद तिवारी तो अपने बेबाक बयानों को लेकर काफी चर्चाओं में रहते थे, तो भाजपा के एक नेता भी अपने बयानों को लेकर काफी चर्चित रहे हैं।
लेकिन इनमें से आज ज्यादातर गुमनामी के अंधेरों में खो चुके हैं। आइए निगाह डालते हैं बिहार की राजनीति के कुछ ऐसे ही चर्चित किरदारों पर जो आज गुमनामी की चादर ओढ़ने को मजबूर हैं।
नहीं दिखाई देते पूर्व जेडीयू नेता शिवानंद तिवारी
कभी जेडीयू में वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी की तूती बोलती थी। अपने बेबाक और बेलोस बयानों को लेकर शिवानंद तिवारी कई बार विपक्षियों के साथ साथ अपनों के निशाने पर भी आ जाते थे। भाजपा को लेकर हमलावर रुख रखने वाले तिवारी के बयानों ने कई बार विपक्षियों में खलबली मच दी थी।
लालू की राजद का साथ छोड़कर जेडीयू में आने वाले शिवानंद को नीतीश ने राज्यसभा सदस्य के अलावा पार्टी का महासचिव भी बनाया था। महान खिलाड़ी सचिन तेंदूल्कर को भारत रत्न देने का विरोध करते हुए शिवानंद ने कहा था कि उनके पास तो पहले से ही काफी पैसा है, ऐसे में उन्हें भारत रत्न देने की क्या जरूरत है।
अक्टूबर 2013 में एक चुनावी सभा में उन्होंने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी। जिस पर काफी हंगामा मचा था। हालांकि उनका ये मुंहफट अंदाज उस समय उनकी गले की फांस बन गया जब उन्होंने दूसरी बार राज्यसभा का टिकट न देने पर नीतीश कुमार पर ही सवाल खड़े कर दिए थे।
उन्होंने नीतीश को तानाशाही तक कह डाला। नतीजतन पार्टी ने उन्हें निकाल बाहर किया। इसके बाद से ही शिवानंद राजनीतिक वनवास झेलने को मजबूर हैं।
साबिर को भी रास नहीं आई भाजपा
पूर्व जेडीयू प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद साबिर अली कभी जेडीयू के अल्पसंख्यक चेहरा हुआ करते थे। भाजपा पर खुलकर साम्प्रदायिकता का आरोप लगाने वाले हर मुद्दे पर जेडीयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बचाव करते दिखते थे।
एक समय साबिर अली की जेडीयू में तूती बोलती थी, यही कारण था कि वह हर मुद्दे पर खुलकर बेलोस बोलते थे। लेकिन उनकी यही बेबाकी उनकी पार्टी को रास नहीं आई और एक बार पीएम पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की तारीफ करने पर उन्हें एक झटके में ही जेडीयू से निकाल बाहर कर दिया गया।
हालांकि जल्द ही वह भाजपा में एंट्री मारने में सफल रहे लेकिन वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी के विरोध के कारण पार्टी ने उनकी सदस्यता रद कर दी। एक बार फिर वह कुछ दिन पहले ही भाजपा में दोबार प्रवेश पाने में सफल रहे। लेकिन राजनीतिक रूप से फिलहाल शिथिल पड़े साबिर अली भी फिलहाल राजनीतिक वनवास पर ही हैं।
प्रवीण अनामुल्ला को रास नहीं आया जेडीयू छोड़कर आप में आना
नीतीश सरकार में मंत्री रही 55 वर्षीय प्रवीण अनामुल्ला लोकसभा चुनावों से पहले जेडीयू छोड़कर भाजपा में शामिल हुई थी। उस समय काफी जोर शोर से उन्होंने आप नेता केजरीवाल की नीतियों की तारीफ करते हुए बिहार में पार्टी के हाथ मजबूत करने की बात कही थी लेकिन कुछ दिन बाद ही यह उत्साह ठंडा पड़ गया।
आज प्रवीण अनामुल्ला का कहीं कोई जिक्र सुनने को नहीं मिलता। राजनीतिक रूप से उनकी शिथिलता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि मौजूदा विधानसभा चुनावों में भी कहीं उनका जिक्र सुनाई नहीं देता। न ही फिलहाल वह किसी सीट से चुनाव लड़ रही हैं।
भाजपा में उपेक्षा का शिकार हुए चन्द्रमोहन राय
पूर्व मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता चन्द्रमोहन राय की गिनती कभी बिहार भाजपा के बड़े नेताओं में होती थी। लेकिन इस विधानसभा चुनावों में बेटे को टिकट न दिए जाने से नाराज चन्द्रमोहन राय ने वरिष्ठ नेताओं पर आरोप लगाते हुए पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था।
बिहार में अगड़ी जाति के भाजपा नेताओं में चन्द्रमोहन राय का खास स्थान था लेकिन अपने बड़बोलेपन के कारण उन्हें भी पार्टी में उपेक्षा का दंश झेलना पड़ा।