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घर में भरे पेट तो क्यों छोड़ें गांव और खेत?

Wed, 07 May 2014 12:15 PM IST
मनीष शांडिल्य/बीबीसी, बिहार
मनीष शांडिल्य/बीबीसी, बिहार Updated Wed, 07 May 2014 12:15 PM IST
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people are migrating due to poverty

पालीगंज क़स्बा बिहार की राजधानी पटना से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर है, जहां 35 साल के शिवनाथ मोची से मेरी मुलाक़ात हुई। छरहरे बदन के शिवनाथ लाल रंग की आधी बाज़ू की कमीज़ और बरमूडा पहने हुए थे।

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गाँव के लिहाज़ से उनका पहनावा थोड़ा आधुनिक था, लेकिन पारंपरिक परिधान की कमी पूरी करने के लिए कंधे पर हरे रंग का एक धारीदार गमछा भी पड़ा था। शिवनाथ दलित समुदाय से आते हैं। बिहार सरकार की पहल के लिहाज़ से कहें तो ‘महादलित’ हैं शिवनाथ।
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पालीगंज के शिवनाथ का ज़िक्र यहां इस वजह से हो रहा है क्योंकि वे उनमें शामिल हैं जिन्होंने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) का सहारा मिलने के बाद काम की तलाश में राज्य से बाहर जाना छोड़ दिया है।
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पांचवीं तक पढ़े शिवनाथ चार बच्चों के पिता हैं। घर में पति-पत्नी दोनों के नाम से जॉब-कार्ड बना है। पिछले आठ सालों से इस परिवार को मनरेगा के तहत काम भी मिल रहा है। शिवनाथ के परिवार को साल में औसतन 50 दिन का काम ही मिल पाता है जबकि इस क़ानून के तहत सौ दिनों का रोज़गार सुनिश्चित करने की बात है।

ऐसे में शिवनाथ का कहना है कि मनरेगा पूरी तरह लागू हो तो उनकी ज़िंदगी और आसान हो पाएगी। साथ ही वे यह भी माँग करते हैं कि सरकार सौ दिन नहीं, पूरे साल भर मज़दूरों के लिए रोज़गार की गारंटी दे।

पूरे साल के लिएरोजगार की जरूरत

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शिवनाथ और दूसरे गांव वालों को ज्यादातर काम सिंचाई के लिए गड्ढे खोदने या खेतों की मेड़ की मरम्मत का मिलता है। देशभर में कई जगह मज़दूर मनरेगा के तहत काम के बाद समय पर भुगतान और पूरी मज़दूरी न मिलने की परेशानी का भी सामना करते हैं, लेकिन शिवनाथ सहित दरियापुर के ग्रामीण इस मामले में ‘खुशकिस्मत’ हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें उनके काम की पूरी मज़दूरी मिल जाती है। हालांकि उन्होंने जोड़ा कि शुरुआती सालों में जब मज़दूरी का नक़द भुगतान होता था, तब उन्हें पैसे जल्दी मिल जाते थे, लेकिन अब डाकघर के ज़रिए भुगतान में लगभग एक महीने का समय लग जाता है।

मनरेगा के अलावा शिवनाथ के परिवार को खेती के मौसम में भी कुछ महीने काम मिल जाता है और जब खेती और मनरेगा से काम नहीं मिलता, तो शिवनाथ पालीगंज से पटना के बीच भवन निर्माण में मज़दूरी करते हैं।

बातचीत में शिवनाथ मानते हैं कि गांव के जो लोग अब भी काम के सिलसिले में बाहर जाते हैं, वे उनकी तुलना में ज़्यादा कमाई करते हैं। ऐसे में क्या उनका मन भी घर से दूर जाकर फिर से मज़दूरी करने का नहीं करता है? इसके जवाब में वे कहते हैं कि घर में रहने की सुख-शांति उन्हें अब कमाई से ज्यादा अच्छी लगती है।

पलायन से जुड़े अनुभव

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बात लगभग सात साल पुरानी है। 2007 में शिवनाथ मोची होली के बाद रोज़गार की तलाश में पालीगंज से गुजरात के वडोदरा शहर पहुंचे थे, तब शिवनाथ ने दूसरी बार काम की तलाश में घर छोड़ा था।

अपने गांव के ही कुछ हमउम्र साथियों की मदद से उन्हें वडोदरा में एक बड़ी लॉन्ड्री में काम भी मिल गया। बकौल शिवनाथ इस लॉन्ड्री में दवा कंपनियों के कामगारों के कपड़े साफ़ किए जाते थे। शिवनाथ को काम तो मिल गया, लेकिन जो पगार मिली, वह उनके लिए चौंकाने वाली थी।

शिवनाथ ने बताया कि लगभग 10 साल पहले 1998 में जब वे पहली बार काम की तलाश में घर से बाहर निकले थे, तो दिल्ली में उन्हें एक कपड़े की दुकान में बतौर सेल्समैन काम करते हुए 25 सौ रुपए मिलते थे।

काम के घंटे बढ़े, लेकिन मजदूरी नहीं

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दस साल बाद वडोदरा में वेतन में सिर्फ़ सौ रुपए की ही बढ़ोतरी हुई थी। इतना ही नहीं, एक तरफ़ पगार में मामूली बढ़ोतरी हुई थी तो दूसरी ओर काम के घंटे बढ़कर आठ से 12 हो गए थे।

सुविधाओं के नाम पर बस एक फ़ायदा दिल्ली के मुक़ाबले यह था कि लॉन्ड्री की ओर से सिर छिपाने के लिए एक कमरा मिला था। शिवनाथ इसमें दूसरे साथी कामगारों के साथ रहते थे।

ऐसी हालत में शिवनाथ तुरंत वडोदरा से वापस लौट जाना चाहते थे, लेकिन पैसों की तंगी के कारण यह संभव नहीं था। अंततः आठ महीने पैसे जमा करने के बाद वे अपने गांव लौट पाए, जहां से अब वे बाहर नहीं जाना चाहते। शिवनाथ घर और घरवालों के साथ ज़िंदगी जीने का मौक़ा मिलने से काफ़ी ख़ुश हैं।

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