फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   Patna News ›   Special Stones for Janki Temple Construction in Sitamarhi Sourced from This Indian Region Know Significance

Bihar News: भारत के इस हिस्से से मंगवाए जा रहे हैं मां जानकी के मंदिर निर्माण के पत्थर, जानिए क्यों है खास?

Thu, 31 Jul 2025 02:44 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: शबाहत हुसैन Updated Thu, 31 Jul 2025 02:44 PM IST
सार

Bihar: इस पत्थर का एक और विशिष्ट गुण है इसका रंग। यह प्राकृतिक रूप से गहरा लाल होता है, जो सूरज की रोशनी में और अधिक चमकदार नजर आता है। यह रंग समय के साथ फीका नहीं पड़ता, बल्कि और निखरता है, जिससे मंदिर या इमारत को एक दिव्य और राजसी आभा प्राप्त होती है।

विज्ञापन
Special Stones for Janki Temple Construction in Sitamarhi Sourced from This Indian Region Know Significance
लाल पत्थर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जब भी देश में किसी भव्य मंदिर या ऐतिहासिक इमारत का निर्माण होता है, तो एक नाम बार-बार सामने आता है राजस्थान का वंशी पहाड़पुर क्षेत्र। यहां से निकाला जाने वाला लाल बलुआ पत्थर न सिर्फ मजबूती और टिकाऊपन के लिए मशहूर है, बल्कि इसकी खूबसूरती और कलात्मकता भी इसे खास बनाती है। अब यही पत्थर बिहार के सीतामढ़ी जिले स्थित पुनौराधाम में बन रहे मां जानकी मंदिर की भव्यता को आकार देगा। मंदिर निर्माण में पूरी तरह इसी पत्थर का उपयोग किया जा रहा है, ताकि उसका सौंदर्य, मजबूती और चमक वर्षों तक बनी रहे।

विज्ञापन

राजस्थान के करौली जिले के वंशी पहाड़पुर क्षेत्र से निकाले जाने वाले इस खास पत्थर को "रेड सैंडस्टोन" यानी लाल बलुआ पत्थर के नाम से जाना जाता है। यह पत्थर ना केवल अपने सुंदर लाल रंग के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसकी संरचना और बनावट ऐसी है कि यह वर्षों तक बिना किसी खास क्षति के टिका रहता है।

विज्ञापन

लंबे समय तक टिकाऊ और मजबूत संरचना
इस पत्थर की सबसे पहली विशेषता इसकी प्राकृतिक मजबूती है। यह लाखों वर्षों में भूगर्भीय प्रक्रियाओं के चलते बना होता है, जिससे इसकी सघनता और टिकाऊपन बढ़ जाती है। यही वजह है कि देशभर में जहां भी लंबे समय तक टिकाऊ और मजबूत संरचना की आवश्यकता होती है, वहां इस पत्थर को प्राथमिकता दी जाती है। यह पत्थर आसानी से टूटता-फटता नहीं है, और मौसम के उतार-चढ़ाव का इस पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता।

विज्ञापन
विज्ञापन

इसके अलावा इस पत्थर की बनावट भी इसे अद्वितीय बनाती है। इसकी सतह बेहद महीन और समरूप होती है, जिस पर नक्काशी और कलात्मक चित्र उकेरना कारीगरों के लिए बेहद आसान होता है। मंदिरों की दीवारों पर जटिल कथाएं, देवी-देवताओं की मूर्तियां और धार्मिक प्रतीक उकेरे जाते हैं, जिनमें अत्यंत बारीकी की आवश्यकता होती है। इस पत्थर की समरूपता और सख्ती यह सुनिश्चित करती है कि उस पर की गई कलाकृति न केवल स्पष्ट रूप से दिखे, बल्कि वह लंबे समय तक वैसी ही बनी रहे।

आसानी से सह लेता है मौसम की मार
इस पत्थर का एक और विशिष्ट गुण है इसका रंग। यह प्राकृतिक रूप से गहरा लाल होता है, जो सूरज की रोशनी में और अधिक चमकदार नजर आता है। यह रंग समय के साथ फीका नहीं पड़ता, बल्कि और निखरता है, जिससे मंदिर या इमारत को एक दिव्य और राजसी आभा प्राप्त होती है।

वंशी पहाड़पुर का यह पत्थर मौसम की मार भी आसानी से सह लेता है। यह न तो गर्मी में सिकुड़ता है और न ही ठंड या बारिश में फैलता है। तापमान में होने वाले उतार-चढ़ाव से इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे यह हर मौसम के लिए उपयुक्त बनता है। यही कारण है कि यह पत्थर समय की रफ्तार को थामने वाला कहा जाता है।

पढ़ें: बेटे के लिए आम तोड़ने पेड़ पर चढ़े पिता की गिरकर मौत, परिजनों में मचा कोहराम

भारतीय स्थापत्य कला की परंपरा में भी इस पत्थर की गहरी पैठ है। देश के कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के निर्माण में इसका प्रयोग किया गया है। दिल्ली का लाल किला, आगरा का किला, अयोध्या में बना श्रीराम मंदिर और बोधगया में बन रहा बुद्ध सम्यक संग्रहालय ये सभी इस लाल बलुआ पत्थर की श्रेष्ठता के उदाहरण हैं। इसकी खासियत यह है कि यह आधुनिक तकनीक और पारंपरिक वास्तुकला दोनों के अनुरूप खुद को ढाल लेता है।


 
सीतामढ़ी में बन रहा मंदिर 
बिहार के सीतामढ़ी जिले में स्थित पुनौराधाम में जो मां जानकी मंदिर बन रहा है, वह 151 फीट ऊंचा होगा और पूरी तरह इसी लाल पत्थर से निर्मित होगा। बिहार सरकार द्वारा बनवाए जा रहे इस मंदिर के निर्माण से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मंदिर की भव्यता, समानता और दीर्घकालिक सुंदरता को ध्यान में रखते हुए वंशी पहाड़पुर के लाल पत्थर का चयन किया गया है। वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि मंदिर की हर दीवार एक समान दिखे, उसकी आभा दूर से ही श्रद्धा का भाव जगाए और सौ साल बाद भी उसकी चमक बरकरार रहे।

दरअसल, यह पत्थर सिर्फ एक निर्माण सामग्री नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और शिल्प परंपरा का प्रतीक बन चुका है। इसके माध्यम से केवल एक भवन नहीं बनता, बल्कि उसमें परंपरा, श्रद्धा और शिल्प की आत्मा समाहित होती है। राजस्थान के इस खास पत्थर के माध्यम से बिहार के धार्मिक पर्यटन को भी एक नई ऊंचाई मिलने जा रही है। मां जानकी मंदिर आने वाले समय में न केवल एक आस्था केंद्र होगा, बल्कि भारतीय स्थापत्य कला की भव्य मिसाल के रूप में भी उभरेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed