पटना हाईकोर्ट का निर्देश: जमानत याचिकाओं पर दो महीने में फैसला जरूरी, सुनवाई टालने के लिए बतानी होगी ठोस वजह
पटना उच्च न्यायालय ने बिहार की अधीनस्थ अदालतों को जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं का दो महीने में निपटारा करने का निर्देश दिया है। देरी पर कारण बताना होगा। पुलिस को पांच दिनों में जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे।
विस्तार
पटना उच्च न्यायालय ने बिहार की सभी अधीनस्थ अदालतों के लिए जमानत और अग्रिम जमानत याचिकाओं के त्वरित निपटारे को लेकर नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। इसके तहत जमानत याचिकाओं का निपटारा दो महीने के भीतर करना अनिवार्य होगा। निर्धारित समयसीमा में याचिका का निपटारा नहीं होने पर संबंधित न्यायाधीश को देरी का स्पष्ट कारण आदेश पत्र में दर्ज करना होगा। इस पहल का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना और जमानत याचिकाओं के निपटारे में होने वाली अनावश्यक देरी को रोकना है। उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुपालन में ये निर्देश जारी किए हैं।
सुनवाई टालने पर कड़े निर्देश
नई एसओपी में जमानत याचिकाओं की सुनवाई बार-बार टालने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं। अब केवल अधिवक्ताओं के अनुरोध पर अदालतें सुनवाई स्थगित नहीं करेंगी। असाधारण परिस्थितियों में ही अगली तारीख दी जा सकेगी। ऐसी स्थिति में पीठासीन अधिकारी को आदेश पत्र में स्थगन का ठोस और स्पष्ट कारण दर्ज करना होगा। यदि कोई जमानत याचिका दो महीने से अधिक समय तक लंबित रहती है, तो संबंधित न्यायाधीश को देरी का कारण भी आदेश पत्र में बताना होगा। इस व्यवस्था से लंबित याचिकाओं की निगरानी मजबूत होगी और उनके समयबद्ध निपटारे में मदद मिलेगी।
पांच दिनों में देने होंगे जरूरी दस्तावेज
जमानत याचिकाओं की सुनवाई में देरी रोकने के लिए पुलिस और अभियोजन से संबंधित दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए हैं। नए नियमों के अनुसार, जमानत याचिका दाखिल करने से पहले उसकी एक प्रति संबंधित लोक अभियोजक या जिला अभियोजन अधिकारी को देनी होगी, ताकि केस डायरी मंगाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा सके।
इसके अलावा जख्म रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) की रिपोर्ट और केस डायरी पांच दिनों के भीतर अदालत को उपलब्ध करानी होगी। कागजी प्रक्रिया में लगने वाला समय बचाने के लिए केस डायरी की स्कैन प्रति व्हाट्सऐप या ईमेल जैसे डिजिटल माध्यमों से भेजने और उसे अदालत में डिजिटल रूप में पेश करने की व्यवस्था भी की गई है।
पढ़ें: पुलिस और अपराधी के बीच मुठभेड़, अंजनी हत्याकांड के मुख्य आरोपी के पैर में मारी गोली
पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही होगी तय
पुलिस और अभियोजन के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने के लिए उप पुलिस अधीक्षक स्तर के नोडल अधिकारी की जवाबदेही तय की गई है। यदि पुलिस अधिकारी निर्धारित समय पर जरूरी रिपोर्ट और दस्तावेज अदालत में उपलब्ध नहीं कराते हैं, तो अदालत उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई कर सकती है।
डैशबोर्ड से होगी लंबित याचिकाओं की निगरानी
जमानत याचिकाओं की नियमित निगरानी के लिए उच्च न्यायालय और जिला स्तर पर समर्पित डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया गया है। इसमें लंबित याचिकाओं को 30 दिन तक, 31 से 60 दिन, 61 से 90 दिन और 90 दिन से अधिक समय से लंबित मामलों की श्रेणियों में बांटा जाएगा।
60 दिन से अधिक पुरानी या दो महीने की समयसीमा के करीब पहुंच चुकी याचिकाओं को प्राथमिकता देने के लिए लाल निशान से चिह्नित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, सभी अधीनस्थ अदालतों को जमानत मामलों का मासिक विवरण संबंधित जिला एवं सत्र न्यायाधीश को भेजना होगा। इससे लंबित मामलों की स्थिति पर नजर रखने और समयसीमा के भीतर उनका निपटारा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।