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Bihar: जिन सामानों से नाले होते थे जाम, उन्हें जुटाकर बना दी सड़क; बिहार में कहां-कैसे बना प्लास्टिक रोड

Sat, 19 Jul 2025 04:06 PM IST
आदित्य आनंद न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खगड़िया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खगड़िया Published by: आदित्य आनंद Updated Sat, 19 Jul 2025 04:06 PM IST
सार

Waste Management : बिहार सरकार पटना में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर बहुत कुछ कर रही है, लेकिन यह बड़ा काम राज्य से छोटे जिलों में शुमार खगड़िया ने किया है। नाला जाम के कारक अपशिष्टों से सड़क बना डाली।

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Bihar News : Recycling of plastic waste management for road construction bihar government
कचरे से बना दी सड़क। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

खगड़िया के बेलदौर प्रखंड के गांवों में कचरे की रिसाइकिलिंग कर सड़कें बनाई जा रही है। इससे न सिर्फ लोगों को गंदगी से छुटकारा मिला, बल्कि लोगों को भी रोजगार मिल रहा है। यहां रोजना एक टन से अधिक कचरा प्रोसेस होता है। जो प्लास्टिक रिसाइकिल नहीं होती, उसे मशीनों को काटा जाता है। फिर से तारकोल के साथ 40:60 के अनुपात में मिलाया जाता है। इस मिश्रण से तैयार होता है एक प्लास्टिक बेस्ड बिटुमिन मिश्रण, जो पारंपरिक सड़कों की तुलना में ज़्यादा लचीलापन, मजबूती और जलरोधकता प्रदान करता है।अब प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के गांवों में सड़कों का निर्माण हो रहा है। यह सड़कें पारंपरिक सड़कों की तुलना में ज्यादा मजबूत और लो मेंटेनेंस वाली हैं। इसके बनने में लागत भी कम ही आती है। इसके जरिए अब तक 18 ग्राम पंचायतें कवर हुए हैं। 400 से अधिक परिवारों में प्लास्टिक सड़क संपर्क हो गया है। पांच टन प्लास्टिक से साढ़े तीन किलो मीटर सड़कों का निर्माण हुआ है। प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट के जरिए लोग काफी कुछ सीख रहे। अब लोग खुद को पर्यावरण रक्षक तक कहने लगे हैं। आइए जानते हैं पूरी कहानी...

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बेलदौर के गांवों की हालत बद से बदतर थी
एक वक्त था जब खगड़िया जिले का बेलदौर प्रखंड कूड़े के ढेर पर सिसक रहा था। प्लास्टिक, रैपर और सड़ा-गला कचरा न सिर्फ गांवों की सूरत बिगाड़ रहा था, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को भी निगल रहा था। हवा में ज़हर घुला था, मिट्टी बंजर हो रही थी और बीमारियां आम थीं। लेकिन, अब यही बेलदौर 'स्वच्छता क्रांति' का पर्याय बन गया है, जहां कचरा सिर्फ कचरा नहीं, बल्कि समृद्धि और सम्मान का स्रोत बन गया है। दरअसल, कुछ साल पहले तक, बेलदौर के गांवों की हालत बद से बदतर थी। घरों से निकलने वाला ठोस और गीला कचरा नालियों में जाम, सड़कों के किनारे जमा और खुले में जलाया जाता था। 
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हर गांव में एक एकीकृत नेटवर्क तैयार किया
जानकारों का कहना है कि प्लास्टिक के कारण बारिश का पानी जमा होता था, जिससे जलभराव और मच्छरों का प्रकोप बढ़ता था। प्लास्टिक की परत मिट्टी की उर्वरता छीन रही थी, खेत बंजर हो रहे थे।वहीं खुले में कचरा जलाने से हवा में जहरीली गैसें घुल रही थीं। बच्चों में सांस की बीमारियां, बुजुर्गों को एलर्जी और जलजनित बीमारियां आम थीं। हर घर, हर व्यक्ति, हर पशु इस प्रदूषण की चपेट में था।गांवों में जीना मुश्किल होता जा रहा था। जिला जल एवं स्वच्छता समिति (DWSC) के अनुसार, ग्रामीण गंदगी से त्रस्त थे। उनका स्वच्छता योजनाओं पर से लोगों का भरोसा उठ रहा था। ऐसे में जिला जल एवं स्वच्छता समिति ने कमान संभाली। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (द्वितीय चरण) को जिला जल एवं स्वच्छता समिति खगड़िया ने केवल 'सरकारी ड्यूटी' नहीं, बल्कि एक मिशन के तौर पर लिया। उन्हें प्रशिक्षित कर स्वायत्त इकाई के रूप में विकसित किया गया। हर गांव में स्वच्छता कर्मी, निगरानी टीम, वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट और प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट का एक एकीकृत नेटवर्क तैयार किया।
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प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट ग्रामीणों की जिंदगी बदल दी
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिला जल एवं स्वच्छता समिति खगड़िया ने केवल ढांचा नहीं खड़ा किया, बल्कि उन लोगों को भी शामिल किया जिन्हें समाज ने हाशिए पर धकेल दिया था। रैगपिकर और कबाड़ी: इन्हें योजना से जोड़ा, प्रशिक्षण दिया और सम्मानजनक रोजगार दिया। महिलाओं की भागीदारी: महिलाओं को प्रबंधन भूमिकाओं में लाकर समानता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया। बेलदौर के एक छोटे से गांव की राजकली देवी, जो कभी कूड़ा बीनने का काम करती थीं, नंगे हाथों से गंदगी में मूल्यवान चीजें ढूंढती थीं। समाज उन्हें 'गंदगी वाली औरत' कहता था। रामसागर, जो पहले ईंट-भट्टों पर मजदूरी करते थे, बाद में कबाड़ी का काम करने लगे, जहां न स्थायित्व था, न सम्मान। लेकिन, बेलदौर में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट की स्थापना ने उनकी जिंदगी बदल दी।


इनकी कहानी बेलदौर के गांवों में एक प्रेरणा बन गई है
एक एनजीओ ने स्थानीय रैगपिकर्स और कबाड़ीवालों को प्रशिक्षण और सम्मानजनक रोजगार देने की घोषणा की। राजकली और रामसागर ने पंजीकरण कराया, ट्रेनिंग ली और पहली बार मशीनों को छुआ। अब वे प्लास्टिक कचरे को प्रोसेस करना, पहचानना और आगे के उपयोग के लिए तैयार करना सीख गए थे। राजकली ने बताया कि पहले लोग मुंह फेर लेते थे, अब सलाम करते हैं। मेरी बेटी मुझे 'ऑफिस जाती मां' कहती है। हमें अब शर्म नहीं, गर्व होता है अपने काम पर। रामसागर ने कहा कि पहले रोज़ सोचते थे कि कल काम मिलेगा या नहीं। अब महीने की सैलरी आती है, बच्चे स्कूल जा रहे हैं। प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट  ने हमें सिर्फ नौकरी नहीं दी, पहचान दी है। आज राजकली डस्टिंग यूनिट में सुपरवाइजर हैं और रामसागर बेलिंग यूनिट में मशीन ऑपरेटर हैं। दोनों के पास बैंक खाता, ईएसआई, पीएफ सुविधा और एक सुरक्षित कार्यस्थल है। उनकी कहानी बेलदौर के गांवों में एक प्रेरणा बन गई है।

अब यह लोग खुद को 'पर्यावरण रक्षक' मानते हैं
वहीं कबाड़ीवाले बबलू यादव कहते हैं कि पहले लोग हमें पूछते भी नहीं थे। अबप्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट  से जुड़कर हम सीधे प्लास्टिक बेचते हैं, फिक्स रेट पर समय पर पेमेंट मिलता है। मैं कह सकता हूं कि मैं कबाड़ी नहीं, एक सप्लायर हूं। प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट  ने उन्हें अलग-अलग प्लास्टिक पहचानने और गुणवत्ता के आधार पर रेट तय करने का प्रशिक्षण भी दिया, जिससे उनकी जानकारी और सौदेबाजी की क्षमता दोनों बढ़ी हैं। अब वे खुद को 'पर्यावरण रक्षक' मानते हैं।

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