बिहार: 350 साल की आस्था, 12 अखंड दीप और मां दुर्गा का दरबार, इस गांव में आज भी बिजली की झालरों से दूर है पूजा
बेगूसराय के भवानंदपुर गांव में करीब 350 साल पुरानी दुर्गा पूजा परंपरा आज भी कायम है। यहां बंगाली रीति-रिवाजों से पूजा होती है और सप्तमी से विसर्जन तक 12 अखंड दीपों से मां दुर्गा का दरबार रोशन रहता है।
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आधुनिकता की चकाचौंध, रंग-बिरंगी बिजली की झालरों और आकर्षक रोशनी के दौर में बिहार के बेगूसराय जिले का एक गांव आज भी सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा को सहेजे हुए है। यहां मां दुर्गा का दरबार आधुनिक लाइटों और बिजली की झालरों से नहीं, बल्कि 12 अखंड दीपों की पवित्र लौ से रोशन होता है। करीब साढ़े तीन सौ साल पुरानी बताई जाने वाली यह परंपरा आज भी श्रद्धा और सादगी के साथ निभाई जा रही है।
यह अनूठी परंपरा बेगूसराय जिले के भवानंदपुर गांव की है। यहां शारदीय दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से सहेजी जा रही सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार होने वाली पूजा और दीपों से प्रकाशित मां का दरबार इस आयोजन को विशिष्ट पहचान देते हैं।
सप्तमी से विसर्जन तक जलते हैं 12 अखंड दीप
आज देशभर में दुर्गा पूजा पंडाल आधुनिक सजावट, आकर्षक विद्युत प्रकाश और भव्य प्रस्तुतियों के लिए पहचाने जाते हैं। वहीं, भवानंदपुर में मां दुर्गा की आराधना पारंपरिक तरीके से की जाती है। यहां सप्तमी से लेकर विसर्जन तक 12 अखंड दीप जलाए जाते हैं। इन्हीं दीपों की रोशनी में मां दुर्गा की पूजा पारंपरिक विधि-विधान से होती है।
इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सादगी है। आधुनिक रोशनी और सजावट से अलग यहां दीपों की लौ को ही मां के दरबार की रोशनी का प्रमुख माध्यम बनाया गया है। यह परंपरा बताती है कि धार्मिक आस्था की पहचान केवल भव्य सजावट नहीं, बल्कि विश्वास और परंपराओं के निरंतर निर्वाह से भी होती है।
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बंगाली कायस्थ परिवार से जुड़ी है परंपरा
भवानंदपुर में दुर्गा पूजा का इतिहास एक बंगाली कायस्थ परिवार से जुड़ा बताया जाता है। इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण यहां मां दुर्गा की पूजा बंगाली पद्धति से की जाती है। समय के साथ गांव में सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव आए, लेकिन पूजा की मूल परंपरा आज भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
यह आयोजन धार्मिक मान्यताओं और पारिवारिक परंपराओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है। पारंपरिक पूजा-विधान, निर्धारित अनुष्ठान और अखंड दीपों की लौ इस सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
जिउतिया के बाद शुरू होती है पूजा की तैयारी
भवानंदपुर में दुर्गा पूजा की तैयारियां जिउतिया पर्व के बाद शुरू होती हैं। इसके बाद कलश स्थापना और छागर बलि की परंपरा निभाई जाती है। फिर बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार मां दुर्गा की आराधना की जाती है। शारदीय नवरात्र के दौरान गांव में भक्तिमय माहौल रहता है और श्रद्धालु पारंपरिक विधि-विधान से मां के दर्शन और पूजा-अर्चना करते हैं। सप्तमी से विसर्जन तक 12 अखंड दीपों का जलना इस आयोजन की प्रमुख विशेषता है। इन दीपों से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और पारिवारिक परंपराएं इसे महज वार्षिक उत्सव तक सीमित नहीं रहने देतीं, बल्कि गांव की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनाती हैं।
आधुनिकता के बीच परंपरा को सहेजने की मिसाल
भवानंदपुर की दुर्गा पूजा उस सांस्कृतिक विरासत की मिसाल है, जो बदलते समय के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है। यहां न चमकदार रोशनी की प्रतिस्पर्धा है और न ही आधुनिक सजावट का प्रदर्शन। मां दुर्गा की आराधना, पारंपरिक पूजा-पद्धति और दीपों की पवित्र लौ ही इस आयोजन का केंद्र हैं।
करीब साढ़े तीन सौ साल पुरानी बताई जाने वाली यह परंपरा बिहार की धार्मिक विविधता और लोक-संस्कृति की समृद्धि को सामने लाती है। भवानंदपुर का यह अनूठा दुर्गा दरबार याद दिलाता है कि विरासत केवल ऐतिहासिक इमारतों और दस्तावेजों में ही नहीं, बल्कि उन परंपराओं में भी जीवित रहती है, जिन्हें लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी श्रद्धा के साथ निभाते हैं। यहां जलने वाले 12 अखंड दीप केवल रोशनी का माध्यम नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था, सांस्कृतिक निरंतरता और परंपरा के प्रति समर्पण के प्रतीक हैं।