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25 सालों तक जातीय हिंसा में जलता रहा बिहार

Thu, 10 Oct 2013 03:40 PM IST
Updated Thu, 10 Oct 2013 03:40 PM IST
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massacre_laxmanpur_bathe

बिहार में जातीय हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। उच्च न्यायलय के ताजा फैसले के बाद चर्चा में आए लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार से पहले और बाद में भी राज्य में जातीय हिंसा का एक लंबा इतिहास रहा है।

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साल 1976 में भोजपुर जिले के अकोडी गांव से शुरू हुई हिंसा करीब 25 सालों तक चलती रही। इस हिंसा में सैकडों लोग मारे जा चुके हैं। पढिए ऐसी ही प्रमुख घटनाओं के बारे में।।।
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मियांपुर जनसंहार
औरंगाबाद ज़िले के मियांपुर में 16 जून 2000 को 35 दलित लोगों की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में जुलाई 2013 में उच्च न्यायलय ने साक्ष्य के अभाव में 10 अभियुक्तों में से नौ को बरी कर दिया था। निचली अदालत ने इन सभी अभियुक्तों को आजीवन कारावास का सजा सुनाई थी।
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सेनारी हत्याकांड
साल 1999 में बिहार में जातीय हिंसा की कई घटनाएं घटीं। सबसे बडी घटना जहानाबाद जिले के सेनारी की थी जहां पर अगडी जाति के 35 लोगों की हत्या कर दी गई। इससे पहले इसी साल इसी जिले के शंकरबिघा गांव में 23 और नारायणपुर में 11 दलितों की हत्या की गई।

लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार
एक दिसम्बर 1997 को बिहार के जहानाबाद जिले के लक्ष्मणपुर बाथे गांव में कुख्यात रणवीर सेना ने 61 लोगों की हत्या कर दी। मारे गए लोगों में कई बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल थीं। इस मामले के सभी 26 अभियुक्तों को बुधवार को उच्च न्यायलय ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।

बथानी टोला
साल 1996 में भोजपुर जिले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछडी जाति के 22 लोगों की हत्या कर दी गई। माना गया कि बारा गांव नरसंहार का बदला लेने के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया। साल 2012 में उच्च न्यायलय ने इस मामले के 23 अभियुक्तों को भी बरी कर दिया था।

बारा गांव
गया ज़िले के बारा गांव में माओवादियों ने 12 फरवरी 1992 को भूमिहार जाति के 35 लोगों की हत्या कर दी थी। माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के सशस्त्र दस्ते ने एक नहर किनारे ले जाकर उनके हाथ-पैर बांधकर उनकी गला रेतकर हत्या कर दी थी।

तिस्खोरा
साल 1991 में बिहार में दो बडे नरसंहार हुए। पटना जिले के तिस्खोरा में 15 और भोजपुर जिले के देव-सहियारा में 15 दलितों की हत्या कर दी गई।

नोंही-नागवान
साल 1989 में जहनाबाद जिले के नोंही-नागवान जिले में 18 पिछडी जाति के लोगों और दलितों की हत्या कर दी गई।

देलेलचक-भगौरा
बिहार में उस वक्त तक के सबसे बडे जातीय नरसंहार में 52 लोगों की मौत हुई थी। औरंगाबाद जिले के देलेलचक-भगौरा गांव में 1987 में पिछडी जाति के दबंगों ने कमजोर तबके के 52 लोगों की हत्या कर दी थी।

दंवार बिहटा
भोजपुर जिले के दंवार बिहटा गांव में अगडी जाति के लोगों ने 22 दलितों की हत्या कर दी थी।

पीपरा

पटना जिले के इस गांव में 1980 में पिछडी जाति के दबंगों ने 14 दलितों की हत्या कर दी थी।

बेल्ची
साल 1977 देश की राजनीति के लिए एक अहम वर्ष था। इसी साल आपातकाल खत्म होने के बाद केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनी थी। इसी साल राजधानी पटना के पास बेल्ची गांव में कुर्मी समुदाय के लोगों ने 14 दलितों की हत्या कर दी थी।


यह घटना उस वक्त सत्ता से बेदखल हो चुकीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के राजनीतिक करियर के लिए वरदान साबित हुई। इंदिरा ने हाथी की पीठ पर बैठ कर बाढ से घिरे इस गांव का दौरा किया था।

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