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अधिकारी जिसने झुकाया गृहमंत्री, प्रधानमंत्री को

Tue, 24 Sep 2013 12:31 PM IST
रेहान फ़ज़ल
रेहान फ़ज़ल Updated Tue, 24 Sep 2013 12:31 PM IST
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man who oppose even home minister and prime minister

नौकरशाही की दुनिया में लोक नायक बहुत मुश्किल से मिलते हैं। बिहार काडर के 1951 बैच के पीएस अप्पू उनमें से एक थे।

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उनको कई तरह के विशेषणों से पुकारा जाता है मसलन "विकास अर्थशास्त्री"। ऐसा इंसान जिसे नेताओं से अपनी बात साफ़ साफ़ कहने में कोई गुरेज़ नहीं था, "ऐसा शख़्स जिसे दस्तूर की कोई फ़िक्र नहीं थी"। वगैरह वगैरह।

आईएएस में उनके 30 साल के कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण क्षण उस समय आया जब वो मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अकादमी के निदेशक बने।

साल 1981 में हिमालय में ट्रैकिंग के दौरान एक आईएएस प्रोबेशनर ने ज़रूरत से ज़्यादा शराब पी ली थी। उसने शराब के नशे में एक लोडेड रिवॉल्वर निकाल कर दो महिला प्रोबेशनर्स के सिर पर तान दिया। इससे पहले, ये शख़्स अनुशासनहीनता के आरोप में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी से भी निकाला जा चुका था।
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पूरी जांच के बाद अप्पू इस नतीजे पर पहुँचे कि इस व्यक्ति का अकादमी में रहना ख़तरनाक होगा। इसलिए उन्होंने सिफ़ारिश की कि उसको अकादमी से निकाल दिया जाए। लेकिन उस व्यक्ति की तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी ज़ैल सिंह के साथ नज़दीकी के कारण सिर्फ़ चेतावनी दे कर छोड़ दिया गया।
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निदेशक पद से इस्तीफ़ा
अप्पू ने विरोध में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को पत्र लिखा, "सरकार के इस फ़ैसले से ये प्रोबेशनर सिर्फ़ यही निष्कर्ष निकालेगा कि सही जगह पर प्रभाव का इस्तेमाल कर बिना रोक टोक बड़े से बड़ा अपराध को अंजाम दिया जा सकता है।"

इस पर संसद में काफ़ी बवाल हुआ और उनके फ़ैसले को अंतत: सरकार ने माना और उस प्रोबेशनर को अकादमी से निष्कासित कर दिया गया। लेकिन इसके बावजूद अप्पू ने अपना इस्तीफ़ा वापस नहीं लिया और 30 साल की अपनी आईएएस की नौकरी को लात मार दी।

1981 बैच की रत्ना प्रभा कहती हैं, "मैं नहीं समझती कि आज के युग में सिर्फ़ सिद्धांत के लिए कोई इंसान ऐसा कुछ कर सकता है।"

उनके इस्तीफ़े के बाद संयुक्त निदेशक एस सी वैश्य ने अकादमी के न्यूज़ लैटर में लिखा, "अप्पू के लिए पेशेवर सूझ-बूझ, राजनीतिक निष्पक्षता, सत्यनिष्ठता और गरीबों की सेवा सर्वोपरि थी। उन्होंने इन मूल्यों के समर्थन में हमेशा साफ़गोई से बात की। वो बहुत दुखी हो कर गए, जब उनको यह अहसास हुआ कि इन मूल्यों की कद्र नहीं की जा रही है।"

मुख्य सचिव पद का मोह नहीं
साल 1981 में तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह के नजदीकी को आईएएस प्रोबेशनर से निकालने पर अड़ गए थे पीएस अप्पू।

कहा जाता है कि जब उन्हें बिहार का मुख्य सचिव बनाने की पेशकश की गई तो उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा कि उन्हें अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

इस पर भी वो नहीं माने तो उन्होंने कहा कि मैं इस शर्त पर ये पद स्वीकार कर सकता हूँ कि मुझे अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आज़ादी हो और मेरे काम में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप न किया जाए। कुछ महीनों बाद जब उन्हें लगा कि मुख्यमंत्री अपना वादा नहीं निभा रहे तो उन्होंने कहा कि वो इस पद से हटना पसंद करेंगे।

जब उन्होंने मुख्य सचिव का पद छोड़ा तो उन्होंने लिखा, "वो राजनीतिक व्यवस्था में आई सड़न को रोकने में सरकार की असफलता, बढ़ते अपराधीकरण और नौकरशाही में कम होती नैतिकता के कारण अपने पद पर बने नहीं रहना चाहते।"

जब उन्हें भूमि सुधार समिति का अध्यक्ष बनाकर योजना आयोग भेजा गया तो उन्होंने ये कह कर खलबली मचा दी कि भारत में भूमि सुधारों के असफल होने का मुख्य कारण राजनीतिक इच्छा शक्ति का न होना है।

साल 2002 में गुजरात के सांप्रदायिक दंगों के बाद उन्होंने राष्ट्रपति कलाम को पत्र लिख कर उनसे इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करने को कहा था। दो साल पहले उन्होंने बिहार आईएएस ऑफ़ीसर्स पत्रिका में लिखा था कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लागू करने के लिए ऊंचे दर्जे के आईएएस अधिकारियों, आईआईटी और नेशनल लॉ स्कूल के स्नातकों को ब्लॉक डेवेलपमेंट अधिकारी के तौर पर नियुक्त करना चाहिए।

नौकरशाहों का वर्गीकरण
अप्पू के अनुसार आईएएस अधिकारियों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी में काबिल और आत्मविश्वासी अधिकारी आते हैं जो निर्णय लेने में कोई चूक नहीं करते। पचास के दशक में 35 फ़ीसदी अधिकारी इस श्रेणी में आते थे जिनकी संख्या अब घट कर अब सिर्फ़ 10 फ़ीसदी रह गई है।

दूसरी श्रेणी में वो अधिकारी आते हैं जो नियमों के अनुसार चलते हैं, फ़ैसलों को टालते हैं और ग़लती करने के डर से फ़ैसले ही नहीं लेते। 50 के दशक में आईएएस में 60 फ़ीसदी लोग इसी तरह के होते थे। अब इनकी संख्या 40 फ़ीसदी रह गई है।

तीसरी श्रेणी में वो लोग हैं जो विवेकहीन हैं, मनमाने ढ़ंग और निजी लाभ के लिए सत्ता का दुरुपयोग करते हैं। 50 के दशक में ऐसे लोग पाँच फ़ीसदी होते थे, जिनकी संख्या बढ़ कर अब 50 फ़ीसदी हो गई है।

अंतरात्मा की आवाज़ सबसे अहम

अप्पू को बेईमानी से चिढ़ थी। आईएएस छोड़ चुके हर्ष मंदर याद करते हैं, "जब वो हमारे निदेशक होते थे तो एक बार मैं उनके दफ़्तर में इस बात का विरोध करने घुस गया कि एक लेक्चरर प्रजातांत्रिक विरोध के ख़िलाफ़ फ़ायरिंग को सही ठहरा रहे थे। मैंने उनसे ये भी शिकायत की कि हमें सिखाया जा रहा है कि भुखमरी से होने वाली मौतों को किस तरह से छिपाया जाए। उन्होंने न सिर्फ़ मेरी बातें ध्यान से सुनी बल्कि मेरी सारी शंकाओं का उन्मूलन भी किया।"


हर्ष कहते हैं कि उन्होंने मुझे सबसे बड़ी चीज़ ये सिखाई कि सरकार को कोई भी आदमी आपको अपनी अंतरात्मा के ख़िलाफ़ काम करने के लिए नहीं मजबूर कर सकता। हाँ अपनी अंतरात्मा के अनुसार काम करने की कीमत ज़रूर चुकानी पड़ती है और आपको इसे चुकाने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

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