महागठबंधन की रैलियों का चुनावी गणित
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बिहार में विभिन्न सामाजिक समूहों को लुभाने की कोशिश में लगे महागठबंधन के नेताओं का अलग-अलग प्रचार करने का फैसला उनके अपने मतभेदों की वजह से नहीं बल्कि एक बड़ी रणनीति के तहत है।
कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, जनता दल-यूनाइटेड(जेडी-यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 30 अगस्त को पटना में स्वाभिमान रैली को संबोधित किया था। इसलिए इस समय ऐसे किसी कार्यक्रम को फिर आयोजित करने की जरूरत नहीं है।
उन्नीस सितंबर को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पश्चिमी चंपारण जिले के रामनगर में बाबासाहेब भीम राव अंबेडकर की 125वीं वर्षगांठ पर एक रैली को संबोधित किया।
नीतीश और लालू दोनों टिकट बंटवारे पर चर्चा के बहाने से रैली से नदारद रहे। यह इसके बावजूद हुआ कि राहुल की रैली में शामिल होने का निमंत्रण उन्हें बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी प्रमुख अशोक चौधरी ने व्यक्तिगत रूप से दिया था। लेकिन लालू ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी और नीतीश ने पार्टी के नेता और महासचिव केसी त्यागी को रामनगर भेजा।
कहा जा सकता है कि लालू ने राहुल के साथ दो साल पुराना हिसाब बराबर कर लिया। राहुल ने सितंबर 2013 में कहा था कि दोषी नेताओं पर लाए जा रहे अध्यादेश के टुकड़े कर उसे कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान मंच साझा करने के फैसले को उस घटना से जोड़ना सही नहीं है क्योंकि अब सिर्फ लालू और कांग्रेस के बड़े नेता ही मंच साझा नहीं कर रहे बल्कि आरजेडी प्रमुख और नीतीश कुमार और गांधी परिवार भी एक साथ रैली को संबोधित नहीं कर रहे।
रणनीति सीधी है। चूंकि महागठबंधन ने टिकट का बंटवारा बहुत गणित लगाकर किया है और वह अलग-अलग वोटबैंक पर दांव लगा रहे हैं, इसलिए एक साथ रैली को संबोधित करना बेकार की कसरत होगी।
जाति का गणित
आरजेडी ने 95 फीसदी टिकट पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों को दिए हैं तो लालू उनके प्रभावक्षेत्र वाली विधानसभाओं में अलग ढंग से ध्यान लगाना चाहेंगे। वह मंडल-2 को लेकर मोहन भागवत पर हमलावर हो सकते हैं।
आरजेडी के दो तिहाई प्रत्याशी यादव और मुसलमान हैं, जिनमें यादव ज्यादा हैं। जिन 101 सीटों पर पार्टी चुनाव लड़ रही है उनमें 48 यादव हैं, जो स्वाभाविक रूप से यादव-बहुल विधानसभाओं में हैं। सोनिया, राहुल और नीतीश उन्हें संबोधित करने से बच सकते हैं। दूसरी तरफ जेडी-यू ने कोइरी, कुर्मी, अति पिछड़ा वर्ग और दलितों पर जोर दिया है। नीतीश अति पिछड़ा वर्ग और महादलित के सशक्तिकरण की बात ज्यादा कर रहे हैं।
खासकर अति पिछड़ों को शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकाय में 20% आरक्षण दिए जाने के निर्णय के बाद। उनके प्रत्याशियों में ऊंची जाति के प्रत्याशियों की संख्या यकीनन आरजेडी के मुक़ाबले ज्यादा है।
नीतीश विकास की, सुशासन और पिछले एक दशक में अपनी सरकार की उपलब्धियों की बात करते हैं। लालू ऐसे विधानसभा क्षेत्रों में फिट नहीं होंगे जहां ऊंची जाति, अति पिछड़े अच्छी संख्या में हैं क्योंकि यादवों और इन दो जाति समूहों में सामाजिक खींचतान है। कांग्रेस ने शहरी सीटों पर दांव लगाया है और अच्छी खासी संख्या में ऊंची जाति के उम्मीदवार खड़े किए हैं।
इसलिए राहुल और सोनिया मोदी सरकार की आर्थिक और विदेशी नीति के नाकाम होने की बातें कर रहे हैं।लालू और कुछ हद तक नीतीश के विपरीत कांग्रेस दिग्गज अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए जाति और धर्म के मुद्दे नहीं उठा रहे।
रणनीति
जनता दल-यूनाइटेड और कांग्रेस दोनों के नेता अति पिछड़ों और ऊंची जाति के वोटरों को यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि नीतीश के हाथ में नियंत्रण होने के चलते उन्हें यादवों से डरने की जरूरत नहीं है।
यह एक सोची-समझी योजना का हिस्सा है। 2010 या उससे पहले भी जब जेडी-यू और भाजपा का गठबंधन था तब दोनों पार्टियों के प्रमुख नेता अलग-अलग प्रचार करते थे।
भाजपा और जेडी-यू के दिग्गज एक या दो संकेतात्मक रैलियां एक साथ करते थे जैसे कि महागठबंधन ने 30 सितंबर को पटना में की थी- लेकिन प्रचार अलग-अलग करते थे।
महागठबंधन को इस रणनीति का अच्छा फ़ायदा मिलता दिख रहा है और इससे महागठबंधन का समय और ऊर्जा बच रहा है इसलिए वह संयुक्त रैली करने पर ध्यान नहीं दे रहे।