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बिहार चुनाव में बड़ी भूमिका निभा सकता है मधेसी आंदोलन

Wed, 07 Oct 2015 12:51 PM IST
Updated Wed, 07 Oct 2015 12:51 PM IST
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Madhesi movement may efact Bihar elections

बिहार विधानसभा चुनाव में बेशक नेपाल में चल रहे मधेसी आंदोलन का जिक्र नेताओं के भाषण में नहीं सुनाई दे रहा है, लेकिन नेपाल से आने वाली हवा बिहार के सीमावर्ती इलाकों में भाजपा के लिए निर्णायक रुख तय कर सकती है।

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मधेस आंदोलन से बिहार का एक बड़ा इलाका सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। बिहार और मधेस के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता रहा है। मधेश में मुख्य रूप में दो जातियों का दबदबा है, एक यादव और दूसरा ब्राह्मण। बाकी जातियां वहां बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं हैं। मामला विदेश से जुड़ा होने की वजह से कांग्रेस समेत सभी दल इस मसले पर बोलने से परहेज कर रहे हैं।
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वो जानते हैं कि नेपाल से आने वाली कोई भी सूचना भाजपा के पक्ष या विपक्ष में माहौल तैयार करेगी। इन इलाकों में पीएम नरेंद्र मोदी को लेकर लोगों में उम्मीद कायम हैं, लेकिन भारतीय कूटनीतिक विफलता को लेकर जमीनी स्तर पर लोगों में बहुत गुस्सा है।
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इस उम्मीद को सीमा के दोनों तरफ के लोगों में कायम रखने का प्रयास भाजपा के लोग कर रहे हैं। उन्हें विश्वास दिलाया जा रहा हैं कि भारत सरकार मधेसियों के हक के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।

लेकिन सवाल यह है कि इन इलाकों में मतदान की तारीख तक अगर भारतीय कूटनीतिक प्रयास से नेपाल सरकार मधेसियों के हित में कोई फैसला लेती है, तो भाजपा को इसका सीधा लाभ मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं होने की दशा में मधेसियों का गुस्सा सीधा नरेंद्र मोदी पर आ जाएगा। इसका असर कम से कम 55 से 65 सीटों पर दिख सकता है। यही कारण है कि भाजपा इस मुद्दे को खामोशी से आगे बढ़ा रही हैं।

सीमावर्ती चुनावी इलाकों पर पड़ सकता है असर

Madhesi movement may efact Bihar elections

पिछले दिनों रक्सौल में मधेस के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें शहर के सभी प्रबुद्ध नागरिक, व्यापारी, समाजसेवी, जनप्रतिनिधि, युवा वर्ग ने खुलकर नेपाल में चल रहे मधेस आंदोलन का समर्थन किया।

सभा के अंत में मंच के महासचिव मनीष दुबे ने साफ तौर पर कहा कि मधेस संकट को सुलझाने में भारत सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। नेपाल मामले के जानकार भैरव लाल दास का कहना है कि भारत ने नेपाल संकट को नजरअंदाज किया है। भारत को यह समझना होगा कि नेपाल उसका आम पड़ोसी नहीं है।

जब वहां आधी आबादी के साथ भेदभाव हो रहा हो और उनको दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की तैयारी हो रही हो, उस वक्त भारत कोई पहल नहीं कर रहा है। नेपाल को लेकर भारत सरकार का जो भी आकलन था, वह गलत साबित हुआ है।

विदेश सचिव स्तर पर कार्रवाई उस वक्त शुरू हुई, जब मधेस विरोधी प्रावधानों के साथ नया संविधान पास हो गया और लागू हो भी गया। दास कहते हैं कि अगर भारत जल्द नेपाल को वार्ता की मेज तक नहीं लाता है और मधेसियों को हक दिलाने का विश्वास नहीं दिला पाता है, तो इसका असर बिहार के चुनाव में दिखना तय है।

मधेस में यादव और ब्राह्मण जाति के लोगों का है खासा दबदबा

Madhesi movement may efact Bihar elections

मधेसी आंदोलन से जुड़े रामजतन यादव का कहना है कि लोकतंत्र में वार्ता के जरिए सभी तरह के विवादों का समाधान निकाला जा सकता है, लेकिन जब जिस देश की आधी आबादी के साथ भेदभाव और उनको दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की तैयारी हो रही हो तो उसके साथ वार्ता कौन करेगा।

भारत की भूमिका अब तक संतोषजनक नहीं रही है, वैसे हमें नरेंद्र मोदी से उम्मीद है। उम्मीद के पीछे कारण भी है, पिछले दो सप्ताह से भारतीय कूटनीतिक प्रयास तेज हुए हैं। भारत से जाने वाली रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति लगभग ठप हो चुकी है। मधेसियों से वार्ता करने का भारत नेपाल पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है।

इसी का असर है कि सोमवार को नेपाल सरकार ने मधेसियों से वार्ता करने की पहल की। राजनीतिक समाधान की दिशा में यह बड़ी कामयाबी कही जा सकती है।

सरकार ने मधेसी पार्टियों के मुख्य आंदोलनकारी समूह के साथ मंगलवार को पहली बार बातचीत की। इसे तनाव कम करने तथा हिमालयी राष्ट्र में जरूरी सामानों की किल्लत की स्थिति में सुधार की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसका सीधा फायदा बिहार चुनाव में भाजपा को मिलना तय है।

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