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Navratri: सदियों पुराना इतिहास है मधेपुरा की बड़ी दुर्गा मंदिर का, सप्तमी पर होती है विशेष पूजा; जानें महत्व
Thu, 10 Oct 2024 12:01 PM IST
शबाहत हुसैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मधेपुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मधेपुरा
Published by: शबाहत हुसैन
Updated Thu, 10 Oct 2024 12:01 PM IST
सार
Navratri Special: जिला मुख्यालय के मुख्य बाजार स्थित बड़ी दुर्गा स्थान की महिमा अपरंपार है। यहां भव्य दो मंजिला मंदिर मधेपुरा के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में सप्तमी के दिन विशेष पूजा होती है और भक्त बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
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बड़ी दुर्गा मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मधेपुरा जिला मुख्यालय स्थित सार्वजनिक बड़ी दुर्गा मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। यहां 1853 ईसवीं से दुर्गा पूजा होती है। शुरू में झोपड़ी में मूर्ति स्थापित कर मां दुर्गा की पूजा की जाती थी। कुछ वर्ष बाद स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर का विकास किया गया।
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वर्ष 2005 में यहां भव्य मंदिर का निर्माण शुरू किया गया। अब यहां भव्य दो मंजिला मंदिर है। यह मंदिर मधेपुरा के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। कमेटी के अध्यक्ष हरिश्चंद्र साह ने बताया कि बड़ी दुर्गा मंदिर में मिथिला परंपरा के अनुसार नवरात्रि की पूजा होती है। यहां के प्रतिमा की विशेषता यह है कि सप्तमी की रात में पत्रिका प्रवेश जन्म पूजा होने के बाद मां के रूप में अपने आप परिवर्तन हो जाता है। मूर्तिकार के दिए रूप से उस दिन मां की प्रतिमा अलग दिखती है। इस मंदिर में कलश स्थापना से लेकर महानवमी तक नियमित रूप से आरती होती है। खासकर शाम में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है।
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मुंगेर के मूर्तिकार बनाते हैं प्रतिमा
कमेटी के सदस्यों ने बताया कि यहां प्रतिवर्ष मुंगेर के मूर्तिकार के द्वारा मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा का निर्माण किया जाता है। यह परंपरा शुरू से ही चलती आ रही है। दुर्गा पूजा में 10 दिनों तक रानीपट्टी के पुजारी सुंदरकांत झा पूजा पाठ करते हैं। हालांकि मंदिर के नियमित पुजारी अनिल पाठक हैं। उन्होंने बताया कि सालों भर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। इस मंदिर के नाम पर एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय भी चलता है।
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मंदिर के अध्यक्ष हरिश्चंद्र साह ने बताया कि प्रतिवर्ष से सैकड़ों लोगों की मुरादें पूरी होती है। यहां मधेपुरा, सहरसा, सुपौल के अलावा नेपाल तक के श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने पर पूजा के लिए आते हैं। बड़ी दुर्गा मंदिर में अंतिम के तीन दिन के पूजा का विशेष महत्व है। इस मंदिर में सबसे अधिक भीड़ अष्ठमी के दिन गोईछा भरने वाली महिलाओं की होती है। मेन रोड से सटे होने के कारण यहां जगह काम है, जिसके कारण भव्य पंडाल बनाने में परेशानी होती है। हालांकि यहां लाइटिंग का बेहतर संयोजन किया जाता है। इस बार मंदिर के दोनों तरफ रोड पर 100 मीटर तक लाइटिंग की व्यवस्था की गई है।
जिला मुख्यालय में चार स्थानों पर होती है दुर्गा पूजा
मधेपुरा शहर में सार्वजनिक बड़ी दुर्गा मंदिर के अलावा बंगाली दुर्गा मंदिर, रेलवे दुर्गा मंदिर और गौशाला दुर्गा मंदिर में भव्य रूप से मेले का आयोजन किया जाता है। रेलवे स्टेशन परिसर स्थित दुर्गा मंदिर में दसवीं के दिन रावण दहन किया जाता है। कमेटी के द्वारा बताया गया कि यहां 1986 से रावण दहन की परंपरा चली आ रही है। रावण का पुतला यहां के स्थानीय कलाकारों के द्वारा बनाया जाता है। रावण दहन को देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जुटती है।