जानिए, लालू ने तेजस्वी को ही क्यों बनवाया डिप्टी सीएम
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जिस दिन बर्लिन की दीवार गिराई जा रही थी ठीक उसी दिन 9 नवंबर 1989 को लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी प्रसाद यादव का जन्म हुआ। अनुमान लगाया जा रहा है कि बिहार के चौथे उपमुख्यमंत्री के रूप में वो अपने बड़े भाई तेज प्रताप के साथ मिलकर बिहार की राजनीति के बड़े भाई लालू प्रसाद यादव और छोटे भाई नीतीश के बीच पुल का काम करेंगे।
10 मार्च 1990 को जब लालू प्रसाद यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे, उस समय तेजस्वी यादव अपनी मां राबड़ी देवी की गोद में थे। अब पच्चीस साल के बाद दोनों भाई अपने पिता की मदद करेंगे, जिनके हाथ में बिहार के सत्ता की कुंजी है।
तेजस्वी यादव ने दिल्ली के आरके पुरम के डीपीएस स्कूल से नौवीं कक्षा पास की है, अच्छा प्रदर्शन नहीं करने की वजह से उन्हें क्रिकेट टीम में नहीं रखा गया। हालांकि तेजस्वी को दिल्ली डेयरडेविल्स क्रिकेट टीम में 2008, 2009, 2011, 2012 में आईपीएल के लिए चुना गया था।
लालू ने छोटे बेटे में ही देखे नेतृत्व के गुण
गौरतलब है 2009 से 2015 के बीच का समय उनके पिता लालू प्रसाद यादव के 43 साल के राजनीतिक जीवन का सबसे बुरा समय रहा। 2005 में बिहार की सत्ता से बाहर होने के बाद 2009 के लोकसभा चुनावों में आरजेडी को महज़ चार सीटें मिली थीं।
यहां तक कि उस समय लालू प्रसाद यादव खुद दो सीटों पर चुनाव लड़े जिसमें एक सीट पर उनकी हार हो गई। उसके बाद 2010 में आरजेडी ने बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे केवल 22 सीटों पर जीत मिली।
लालू की पत्नी राबड़ी देवी को राघोपुर और सोनपुर दोनों ही सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा। सितंबर 2013 में सीबीआई की एक अदालत ने लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में दोषी क़रार दिया और उन्हें अपनी लोकसभा सदस्यता भी खोनी पड़ गई।
इसी दौरान लालू ने तय किया कि वो बड़े बेटे तेज प्रताप की जगह अपने छोटे बेटे तेजस्वी को आगे बढ़ाएंगे। तेज प्रताप यादव बिहार के औरंगाबाद में दुपहिया वाहनों का एक शो-रूम भी चलाते हैं और राजनीति में उनकी दिलचस्पी कम ही लगती है।
तेजस्वी को रैलियों में साथ ले जाने लगे लालू यादव
लालू ने अपने छोटे बेटे में नेतृत्व के कुछ गुण देखे। फिर राजनीति के दांव सिखाने के लिए लालू उन्हें अपने साथ बिहार के अलग-अलग इलाकों में ले जाने लगे।
15 मई 2013 को पटना में आरजेडी की परिवर्तन रैली में तेजस्वी यादव की भूमिका उनका आरजेडी का उत्तराधिकारी बनने की दिशा में एक संकेत था।
लालू प्रसाद यादव को 2015 के लोकसभा चुनावों में पाटलिपुत्र सीट से अपनी बेटी मीसा भारती को खड़ा करना पड़ा था क्योंकि तेजस्वी उस समय 25 साल के नहीं हुए थे। लालू प्रसाद यादव चाहते थे कि राघोपुर विधानसभा सीट से उनका बेटा तेजस्वी चुनाव लड़े, हालांकि सूत्र बताते हैं कि पारिवारिक वजहों से उन्हें अपने बड़े बेटे तेज प्रताप को भी वैशाली ज़िले की ही एक और सीट महुआ से चुनाव लड़वाना पड़ा।
लालू प्रसाद यादव ने तेजस्वी के लिए बड़े स्तर पर चुनाव प्रचार किया और उनके लिए कम-से-कम चार बड़ी चुनावी बैठकें की थीं। पहले इसी सीट से लालू और उनकी पत्नी रावड़ी देवी भी चुनाव जीत चुके थे।
कम पढ़े होने के बाद भी ज्यादा सक्रिय हैं तेजस्वी
हालांकि अपनी मां राबड़ी देवी के उलट हाई स्कूल पास नहीं कर पाने के बाद भी तेजस्वी यादव अंग्रेज़ी, हिन्दी और भोजपुरी बोल लेते हैं, वो आई-टी में भी दिलचस्पी रखते हैं, विश्वास से भरे हैं, स्पष्ट बोलने वाले हैं, सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और हमेशा नई चीजों पर भी नज़र रखते हैं।
जब लालू यादव 1997 में चारा घोटाला मामले में आत्मसमर्पण करने वाले थे और राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया जा रहा था तो इसकी काफ़ी आलोचना हुई थी।
ठीक उसी तरह इस बार 26 साल यानी सबसे कम उम्र का विधायक होने पर तेजस्वी यादव को भी आलोचना सहनी पड़ी। लेकिन वो अनुभव नहीं होने के हर आरोप को ठुकराते रहे और यही कहते रहे कि अरविंद केजरीवाल भी बिना राजनीतिक अनुभव के दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं।
लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस्वी यादव और तेज प्रताप के लिए लालू प्रसाद यादव ही अप्रत्यक्ष रूप से काम करेंगे। उपमुख्यमंत्री होने के साथ ही तेजस्वी यादव के पास पथ निर्माण, पिछड़ा और अति पिछड़ा कल्याण मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं, जबकि तेज प्रताप को स्वास्थ्य, सिंचाई और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय दिया गया है।
लालू के अनुसार चाचा भतीजों की रहेगी सरकार
अब सवाल यह है कि लालू प्रसाद यादव एक पिता की भूमिका निभाएंगे या फिर नीतीश के बड़े भाई की? हालांकि लालू किसी भी बैठक में भाग नहीं लेने वाले हैं, जैसा कि उन्होंने राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री होते हुए किया था।
साल 2000 में सचिव स्तर के एक अधिकारी अनूप मिश्रा ने ऐसी एक मीटिंग में भाग लेने से इनकार कर दिया था। उन्होंने उस समय से मुख्य सचिव, मुकुंद प्रसाद को लिखा था कि "मैं इस तरह की किसी मीटिंग में हिस्सा नहीं ले सकता जिसका अध्यक्ष संविधान से बाहर का कोई व्यक्ति हो"।
खैर नीतीश को उस मुख्यमंत्री के रूप में याद किया जाएगा जो अपने बेटे को नहीं बल्कि बड़े भाई लालू प्रसाद के दो बेटों को सत्ता के क़रीब रखेंगे, वही लालू प्रसाद यादव जिनके साथ नीतीश का दो दशकों से राजनीतिक झगड़ा चल रहा था।