फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   It is helplessness of NDA to show solidarity in Bihar

बिहार में एकजुटता दिखाना क्या एनडीए की मजबूरी है

Sat, 09 Jun 2018 04:10 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Sat, 09 Jun 2018 04:10 PM IST
विज्ञापन
It is helplessness of NDA to show solidarity in Bihar

बिहार में सत्तासीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) इन दिनों अंतर्कलह से गुजर तो रहा है, लेकिन एकजुटता दिखाते रहना भी उसकी मजबूरी है। गुरुवार रात पटना में एनडीए के सहभोज और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की मेजबानी का मकसद ही था कि 'परदे में रहने दो'। लेकिन सियासत इतनी स्वार्थपरक हो चुकी है कि भेद खुल ही जाता है।

विज्ञापन


जैसा कि इस 'सहभोज' में एक घटक, यानी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के मुखिया उपेन्द्र कुशवाहा की गैर-मौजूदगी से भेद खुला। हालांकि उपेन्द्र कुशवाहा ने शुक्रवार शाम को ये भी कहा कि एनडीए एकजुट है और आगे भी रहेगा। साथ ही पार्टी में मौजूद न होने के उन्होंने कुछ व्यक्तिगत कारण भी बताए।
विज्ञापन


जबकि ये किसी से छिपा नहीं है कि जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) के अध्यक्ष नीतीश कुमार और उपेन्द्र कुशवाहा के बीच का सियासी रिश्ता लंबे समय से बिगड़ा हुआ है। दोनों एक-दूसरे को बिलकुल नहीं सुहाते। जबकि पहले ये दोनों बेहद करीबी रह चुके हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस बार भोज से कुछ ही देर पहले रालोसपा के एक प्रमुख नेता का नीतीश कुमार के खिलाफ सख्त बयान आ गया। कहा गया कि भाजपा ने नीतीश को बिहार में एनडीए का 'चेहरा' कैसे घोषित कर दिया, जबकि एनडीए की किसी बैठक में ऐसा तय नहीं हुआ है!

कुछ तल्खी भरे बयान

It is helplessness of NDA to show solidarity in Bihar

याद रहे कि उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी सहित कुछ अन्य भाजपा नेताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी को और बिहार में नीतीश कुमार को एनडीए का 'चेहरा' कहा है। जाहिर है कि भाजपा ने ऐसा तब कहा जब केंद्र सरकार के प्रति जेडीयू के कुछ तल्खी भरे सवालिया बयान आने लगे।

जेडीयू चाहता है कि बिहार की सत्ता में और अगले चुनावों के लिए टिकट आवंटन में भाजपा उसका वर्चस्व माने। 'चेहरा' वाली बात मान कर भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव (2020) में नीतीश को एनडीए की तरफ से मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी कबूल कर लिया है।
यही बात उपेन्द्र कुशवाहा को भी चुभी है। बिहार में कुशवाहा यानी कोयरी समाज की जनसंख्या नीतीश के स्वजातीय कुर्मी समाज से बहुत ज्यादा है।

इसलिए रालोसपा खुद को जेडीयू से बड़ा जनाधार वाला मान कर नीतीश की दावेदारी पर सवाल उठा रहा है। इसमें कुछ प्रेक्षक भाजपा की कूटनीति का भी अंदेशा जाहिर करने लगे हैं। उनको लगता है कहीं उपेन्द्र कुशवाहा को उकसा कर नीतीश कुमार को साधने या उन्हें औकात बताने जैसा कोई खेल तो नहीं हो रहा!

भाजपा की मनमानी चलेगी?

It is helplessness of NDA to show solidarity in Bihar

हालांकि इस तरह के कयास को इस तर्क से काटा जा सकता है कि तब कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से सटने की कोशिश में भी क्यों दिख रही है। जो भी हो, इतना तो स्पष्ट है कि अब न तो जेडीयू के बिना भाजपा की, और न ही भाजपा के बिना जेडीयू की चुनावी नैया पार लगेगी। आरजेडी, कांग्रेस और अन्य विपक्षियों के संभावित गठबंधन की प्रबल चुनौती सामने दिखने लगी है।

ऐसे में, जेडीयू और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को किसी जिद में खो देने की गलती भाजपा क्यों करेगी? यही वजह है कि घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे में भाजपा की मनमानी नहीं चलने देने का दबाव जेडीयू और एलजेपी ने अभी से बनाना शुरू कर दिया है। इन्हें लगता है कि चोट करने का यही उपयुक्त समय है क्योंकि लोहा अभी गरम है।

गोटी लाल करने वाली चालें

पिछले कई उपचुनावों के नतीजे और केंद्र सरकार के प्रति बढ़ते जनाक्रोश जैसे झटकों ने भाजपा को नरम कर दिया है। मोदी सरकार के प्रति आकर्षण का गिरता हुआ ग्राफ उसके सहयोगी दलों का भी मनोबल बढ़ा चुका है। अब गठबंधनी राजनीति के ही अच्छे दिन आने की झलक मिलने लगी है।

इसलिए भाजपा और कांग्रेस ही नहीं, क्षेत्रीय दल भी गंठजोड़ के बूते अपनी गोटी लाल करने वाली चालें चलेंगे। ऐसी सूरत में लगता नहीं है कि नीतीश कुमार फिर से भाजपा को ठुकराने जैसी राजनीतिक हाराकिरी करेंगे। लेकिन हां, अगर राष्ट्रीय स्तर के किसी सर्वमान्य विपक्षी मोर्चे का गठन हो जाये और नीतीश को उस मोर्चे का लाभकारी आमंत्रण मिल जाये, तब उसे लपकने से चूकेंगे भी नहीं।

'माया मिली न राम'

It is helplessness of NDA to show solidarity in Bihar

वैसे, इस तरह की संभावना वाली दिल्ली इतनी दूर है कि इस बीच हड़बड़ी करेंगे तो 'माया मिली न राम' जैसी स्थिति हो जाएगी। कहीं ऐसा न हो कि बिहार की चालीस लोकसभा-सीटों में से पच्चीस पर दावेदारी का आसमानी जुमला जमीन पर गिर कर इतने छोटे टुकड़ों में बंट जाये कि उसे उठाने में भी शरम लगे।

केंद्र सरकार में जेडीयू को हिस्सेदारी न देना और राष्ट्रीय स्तर पर किसी नीति निर्धारण में इस सहयोगी पार्टी को अलग-थलग रखना उचित नहीं माना जाएगा। इसकी वजह भी लोग जानते ही हैं। भाजपा और नरेंद्र मोदी को नीतीश ने पिन चुभो-चुभो कर जितनी पीड़ा दी थी, उतनी पीड़ा लौटाने का मौका भी तो भाजपा को नीतीश ने ही दिया।

प्रथम गठबंधन वाला रौब-दाब अगर समर्पण वाले दूसरे गठबंधन के समय चलाना चाहेंगे, तो निराशा ही हाथ लगेगी। जेडीयू शुक्र मनाए कि सियासत के मौजूदा बाहुबलियों की बढ़ती जा रही बुलंदी वाला ग्राफ अब नीचे उतरता जा रहा है। इसलिए विपक्षियों के ही नहीं, सहयोगियों के भी मंद पड़े हुए हौसलों में थोड़ी गति आ गयी है। एनडीए की सबसे बड़ी हिस्सेदार भाजपा के सामने मुंह खोल कर हक मांगने का यह मौका सहयोगी दलों को मुश्किल से मिला है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed