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बिहारः बच्चों की आबादी से अधिक नामांकन
Updated Thu, 17 Jul 2014 03:19 PM IST
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भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (सीएजी) की मंगलवार को जारी रिपोर्ट में बिहार में सर्व शिक्षा अभियान से संबंधित कई गड़बड़ियाँ सामने आई हैं। ये रिपोर्ट साल 2012-13 की है।
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कुछ प्रमुख गड़बड़ियाँ-
1.आबादी से अधिक नामांकन
सीतामढ़ी, खगड़िया, किशनगंज और गया ज़िले में स्कूल जाने वाले बच्चों की आबादी से अधिक बच्चों का नामांकन स्कूलों में पाया गया। इन चार ज़िलों में स्कूल जाने योग्य बच्चों की कुल संख्या 22,18,089 है लेकिन इन ज़िलों में कुल 23,02,758 बच्चों का नामांकन स्कूलों में दिखाया गया। यानि कुल बच्चों की आबादी से 84 हज़ार अधिक बच्चे स्कूल जा रहे हैं!
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2. वित्तीय प्रबंधन ठीक नहीं
सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में सर्व शिक्षा अभियान के ख़राब वित्तीय प्रबंधन के कारण राज्य 19 हज़ार करोड़ से अधिक रुपये का लाभ नहीं उठा सका।
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3. संदेहास्पद आंकड़े
रिपोर्ट में बिहार शिक्षा परियोजना परिषद के आंकड़ों में की गई हेरा-फेरी की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा गया है कि राज्य में 2012-13 के दौरान परिषद ने स्कूल से बाहर बच्चों की संख्या केवल 2,82,669 बताई थी जबकि राज्य में 9,49,900 बच्चे स्कूलों से बाहर थे।
4. शिक्षकों की भारी कमी
रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 43 प्रतिशत शिक्षक के पद ख़ाली हैं। छह ज़िलों के 27 हज़ार से अधिक स्कूलों में से 996 स्कूलों की जांच में यह पाया गया कि 77 प्राथमिक स्कूलों में केवल एक शिक्षक थे, 305 प्राथमिक उच्च विद्यालयों में गणित और विज्ञान के शिक्षक नहीं थे।
5. अप्रशिक्षित शिक्षक
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सूबे के 1.60 लाख शिक्षकों के पास शिक्षक बनने के लिए ज़रुरी योग्यता नहीं है।
6. विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात बढ़ा
राज्य में विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 2012-13 में मानक 40:1 होने की जगह 2008-09 के 53:1 से बढ़कर 2012-13 में 59:1 हो गया।
7. बिना किताब पढ़ाई
सीएजी ने पाया कि 2008-13 के दौरान 65.72 लाख बच्चे (18 फ़ीसदी) मुफ़्त पाठ्य-पुस्तकों से वंचित रहे। साथ ही लगभग एक हज़ार स्कूलों की जाँच में यह भी सामने आया कि इस दौरान 110 स्कूलों में किताबें कभी पहुंची ही नहीं।
8. सुविधाहीन स्कूल
नौ से 68 प्रतिशत विद्यालयों में शौचालय, पेयजल, बिजली, चारदीवारी और खेल का मैदान जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
9. भवनहीन स्कूल
राज्य के 13 प्रतिशत स्कूलों को अपना भवन नहीं था। राशि उपलब्ध होने के बावजूद राज्य में आठ सालों के दौरान नए स्कूल भवन निर्माण का 56 फ़ीसदी, अतिरिक्त क्लास रुम का 60 फ़ीसदी और प्रधानाध्यापक कक्ष का 26 फ़ीसदी निर्माण कार्य ही पूरा हो पाया।