वो पति-पत्नी, जो अलग-अलग झंडे के तले लड़ रहे चुनाव
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कहते हैं कि सियासत में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन। ये बात बिहार विधानसभा चुनाव पर फिट बैठती है जहां कई ऐसे मामले है जिनमें पत्नी और पत्नी अलग-अलग पार्टियों के झंडे तले खड़े दिख रहे हैं। मिसाल के तौर पर दिनेश सिंह जनता दल (यूनाइटेड) के विधान परिषद सदस्य हैं लेकिन उनकी पत्नी वीणा देवी लगातार दूसरी बार गयाघाट से भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार हैं।
वो 2010 में भी इसी सीट से जीती थीं, लेकिन तब जदयू और भाजपा के बीच गंठबंधन था। दिनेश सिंह अपने और अपनी पत्नी के अलग-अलग सिद्धांत और निष्ठा का हवाला देते हैं। उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, “अगर हमारी पत्नी भाजपा से चुनाव लड़ रही हैं तो क्या गुनाह है। हर किसी का अपना-अपना सिद्धांत है और अपनी विचारधारा। इसलिए वे किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए आजाद है। घर में हम पति पत्नी होते हैं वहाँ कोई राजनीति नहीं होती है।”
गठबंधन से राहत
जदयू के ही एक और विधान परिषद सदस्य हैं मंजर आलम, जिनकी पत्नी जेबा खातून जीतन राम माँझी की पार्टी ‘हम’ से जोकीहाट विधानसभा से चुनाव लड़ रही हैं। मंजर आलम बिल्कुल साफ-साफ कहते हैं, “मैं तो चुनाव प्रचार में हर तरह से अपनी पत्नी की सहायता करुंगा, जेबा खातून पहली बार चुनाव लड़ रही हैं। ऐसे में मुझे इन पर ज्यादा ध्यान देना होगा।”
इसी तरह, कौशल यादव जदयू से हैं तो उनकी पत्नी पूर्णिमा यादव कांग्रेस से, लेकिन दोनों पार्टियों के महागठबंधन में होने से टकराव की स्थिति नहीं है। ठीक यही मामला जदयू विधान परिषद सदस्य राजेंद्र राय और उनकी पुत्रवधू इजिया यादव का है, जो मोहिउद्दीननगर से राजद से चुनाव लड़ने जा रही हैं। छातापुर विधानसभा से चुनाव लड़ने जा रहे भाजपा के नीरज सिंह बबलू की पत्नी को लोक जनशक्ति पार्टी से टिकट मिला है।
इन दोनों को भी, दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की वजह से कोई खास परेशानी नहीं है। इस तरह की राजनीतिक वचनबद्धताओं को लेकर नेता भले ही जो तर्क दें, लेकिन जनता को ये बातें कम ही गले उतरती हैं। फेरी लगाने वाले लुट्टन यादव कहते हैं, “नेता सब आपस में नहीं लड़ता है, सिर्फ जनता लड़ता है। नेता सब चुनाव के बाद एक हो जाता है।”