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बिहार पुलिस के नए डीजीपी केएस द्विवेदी को कितना जानते हैं आप

Wed, 28 Feb 2018 05:52 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Wed, 28 Feb 2018 05:52 PM IST
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How much you know about the new DGP of Bihar Police, KS Dwivedi 5 facts
K S Dwivedi
आईपीएस अधिकारी कृष्ण स्वरूप द्विवेदी को बिहार का अगला पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी बनाए जाने पर विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। नीतीश सरकार ने फैसला किया है कि कृष्ण स्वरूप द्विवेदी आज सेवानिवृत हो रहे पुलिस महानिदेशक पीके ठाकुर का स्थान लेंगे।
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केएस द्विवेदी के कार्यकाल के दौरान 1989 के अक्टूबर में भागलपुर में सांप्रदायिक दंगे भड़के थे। भागलपुर के एसपी के रूप में उनका कार्यकाल विवादित रहा था।1984 बैच के बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी द्विवेदी मूल रूप से उत्तर प्रदेश से हैं। उनका गृह जिला जालौन है।
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वे अभी बिहार में डीजी (ट्रेनिंग) के पद पर तैनात हैं। द्विवेदी अगले साल 31 जनवरी को रिटायर होंगे।


'संघ मुख्यालय की इच्छा पर नियुक्ति'

उनकी नियुक्ति पर अपनी प्रतिक्रिया में राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने बीबीसी से कहा, "केएस द्विवेदी का डीजीपी नियुक्त होना अपने आप में इस बात की दोबारा पुष्टि करता है कि सरकार के महत्वपूर्ण नीतिगत और प्रशासनिक निर्णयों में नीतीश कुमार या जदयू की अब कोई भूमिका नहीं रही है।"
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"उन्हें अब वो ही करना पड़ रहा है जो नागपुर के संघ मुख्यालय की इच्छा होगी। तत्कालीन एसपी के रूप में 1989 के बर्बर भागलपुर दंगों के दौरान इनकी भूमिका किसी से छिपी नहीं है। उस समय के समाचार पत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स देखें तो स्पष्ट होता है कि क्यों तात्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने इन्हें वहां से हटाने का निर्णय किया था।"

"संघ की दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा से इनकी निकटता इनकी कार्यशैली में तब से लेकर अब तक साफ है। इस महत्वपूर्ण पद पर इनकी नियुक्ति हाशिए के लोगों और अल्पसंख्यक समाज में एक डर और ख़ौफ की भावना को जन्म देगी।"

विपक्ष के आरोपों के जवाब में जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता नीरज कुमार विपक्ष से यह सवाल करते हैं, "अगर ऐसी कोई बात थी तो राष्ट्रीय जनता दल की सरकारों ने उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की।"

"उनकी नियुक्ति वरीयता के आधार पर हुई है। इसे दंगों से जोड़कर देखना महज एक राजनीतिक बयान है और कुछ नहीं। नीतीश कुमार की सरकार ने सांप्रदायिक उन्माद और क़ानून के राज के सवाल पर न कभी राजनीतिक समझौता किया है और न करेगी।"

आयोग ने माना जिम्मेदार

सन 1989 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा के कार्यकाल में यह दंगा हुआ था। इस घटना के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद भी छोड़ना पड़ना। इसके बाद कांग्रेस ने डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र को राज्य की बागडोर सौंपी। उन्होंने भागलपुर दंगे की जांच के लिए जस्टिस रामानंद प्रसाद कमीशन का गठन किया। कुछ ही महीनों बाद सरकार बदल गई। लालू प्रसाद की सरकार ने इस आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया।

जस्टिस शम्सुल हसन और आरसीपी सिन्हा भी आयोग के सदस्य बनाए गए। साल 1995 में अध्यक्ष और सदस्यों द्वारा अलग-अलग रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। इसी साल मॉनसून सत्र में तत्कालीन लालू सरकार ने इसे विधान परिषद में पेश भी किया।

जिस दिन यह रिपोर्ट विधान परिषद में पेश की गई उस दिन वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद वहां मौजूद थे। वह बताते हैं, "सरकार ने केवल सदस्यों वाली रिपोर्ट ही स्वीकार की थी। जस्टिस शम्सुल हसन और आरसीपी सिन्हा की रिपोर्ट में भागलपुर के तत्कालीन एसपी को भी दंगों के लिए जिम्मेदार माना गया था।"


 

समर्थन में निकला था जुलूस

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Nitish Kumar
भागलपुर दंगा भारत के सबसे बड़े और चर्चित दंगों में से एक है। इस दंगे में सरकारी आंकड़ों के अनुसार भागलपुर शहर और तत्कालीन भागलपुर जिले के 18 प्रखंडों के 194 गांवों के ग्यारह सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे।

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक जहां दो महीने से अधिक समय तक यह दंगा चला था वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं और दंगा पीड़ितों के मुताबिक लगभग छह महीने तक दंगे होते रहे थे।

केंद्रीय शांति सद्भावना समिति भागलपुर दंगों से लेकर अब तक दंगा पीड़ितों के न्याय, पुनर्वास के साथ-साथ सामाजिक सदभाव के लिए काम कर रही है। इससे जुड़े भागलपुर के डॉक्टर फारुख़ अली बताते हैं, "दंगे शुरू होने के ठीक बाद सरकार ने द्विवेदी को बदलने का फैसला कर लिया था। इसी बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी भागलपुर पहुंचे। तब इनके तबादले की ख़बर के विरोध में कर्फ्यू के बावजूद जुलूस निकाला गया था और तबादला रोकना पड़ा था।"

पूरे लालू-राबड़ी शासन काल के दौरान केएस द्विवेदी को कोई अहम जिम्मेदारी नहीं दी गई। साल 1999 में केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो उसी साल फरवरी-मार्च में क़रीब एक महीने के लिए बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था।

इस दौरान केएस द्विवेदी को मुजफ्फरपुर जिले के एसपी की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई थी। जानकार इसे भारतीय जनता पार्टी से केएस द्विवेदी की नजदीकी के रूप में देखते हैं।


एक अन्य आयोग ने नहीं माना दोषी

साल 2005 में जब नीतीश सरकार बनी तो उसने भागलपुर दंगों की दोबारा जांच के लिए 26 फरवरी 2006 को जस्टिस एनएन सिंह आयोग का गठन किया। आयोग ने 28 अगस्त 2007 को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी। इसी आधार पर बंद किए गए करीब तीन दर्जन मामलों को फिर से खोला गया।

साथ ही अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर ही दंगे में मारे गए लोगों के आश्रितों के लिए बिहार सरकार द्वारा पेंशन योजना शुरू की गई थी। साथ ही क्षति-पूर्ति मुआवजा भी दिया गया था। यह मुआवजा उसी तर्ज पर दिया गया जिस आधार पर केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा सिख दंगों के पीड़ितों के लिए मुआवजे की घोषणा की थी। 2015 के मॉनसून सत्र के आखिरी दिन 7 अगस्त को नीतीश सरकार ने इस एक सदस्यीय भागलपुर सांप्रदायिक दंगा न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट को सदन में रखा था।

रिपोर्ट में 22 मामलों की जांच करते हुए पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है। इनमें भारतीय पुलिस सेवा के कई अधिकारी शामिल हैं। आयोग ने जिन आईपीएस अधिकारियों को दोषी पाया, उनमें भागलपुर जिले के तत्कालीन आला पुलिस अधिकारी वी नारायणन, आरके मिश्रा और शीलवर्द्धन सिंह शामिल हैं। लेकिन इस रिपोर्ट की सूची में केएस द्विवेदी का नाम नहीं था।


अभी केएस द्विवेदी की छवि पुलिस महकमे के एक ईमानदार, कर्मठ और कड़क अफसर की है। अभी उनके पास केंद्रीय चयन परिषद (सिपाही भर्ती) के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी है। पुलिस महकमे पर क़रीबी नजर रखने वाले बताते हैं कि इनके कार्यकाल में पुलिस बहाली प्रक्रिया को पहले के मुकाबले बहुत ही पारदर्शी और प्रभावी ढंग से अंजाम दिया गया है।साथ ही इनके करियर में एक अहम कामयाबी तब दर्ज हुई थी जब 2011 में ये पुलिस महानिरीक्षक (ऑपरेशन) के पद पर थे।

जब बिहार पुलिस ने सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया था। ये तीन नक्सली नेता थे- पालेंदु शेखर मुखर्जी, विजय कुमार आर्य और वाराणसी सुब्रमण्यम।
 
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