बिहार: राजा दशरथ का पिंडदान और माता सीता की कथा... गयाजी में हजारों साल पुरानी परंपरा आज भी जिंदा
गयाजी में पितृपक्ष मेले के 10वें दिन और श्राद्ध कर्म के 9वें दिन मातृ नवमी पर राम गया और सीताकुंड में विशेष पिंडदान किया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सीता ने फल्गु नदी की रेत से राजा दशरथ का पिंडदान किया था, जिसके बाद सीताकुंड में बालू से पिंडदान की परंपरा शुरू हुई।
विस्तार
पितृपक्ष के दौरान गयाजी में आज का दिन सिर्फ श्राद्ध कर्म का एक और पड़ाव नहीं, बल्कि रामायण काल से जुड़ी उस पौराणिक कथा की याद भी दिलाता है, जिसमें माता सीता ने फल्गु नदी की रेत से राजा दशरथ का पिंडदान किया था। आश्विन कृष्ण नवमी यानी मातृ नवमी के मौके पर आज राम गया और सीताकुंड में विशेष पिंडदान किया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि इन वेदियों पर विधि-विधान से श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। गयाजी में चल रहे पितृपक्ष मेले का आज 10वां दिन और श्राद्ध कर्म का 9वां दिन है। मातृ नवमी पर खास तौर पर मातृ पक्ष और सुहागिन अवस्था में दिवंगत हुई महिलाओं के लिए श्राद्ध और पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है। इसी दिन राम गया और सीताकुंड में पिंडदान करने की परंपरा है।
राम गया और सीताकुंड में पहुंचेंगे पिंडदानी
मातृ नवमी के अवसर पर बड़ी संख्या में पिंडदानी राम गया और सीताकुंड पहुंचेंगे। यहां श्रद्धालु अपने पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करेंगे। इन दोनों वेदियों को गयाजी के प्रमुख पिंडदान स्थलों में माना जाता है। राम गया और सीताकुंड की धार्मिक महत्ता केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है। दोनों स्थानों को रामायण काल की एक पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है, जिसके कारण यहां होने वाले पिंडदान को विशेष महत्व दिया जाता है।
जब सीता ने फल्गु की रेत से किया था पिंडदान
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान राम अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध करने गयाजी पहुंचे थे। उनके साथ लक्ष्मण और माता सीता भी थीं। मान्यता है कि एक समय भगवान राम और लक्ष्मण पिंडदान की सामग्री जुटाने के लिए चले गए और माता सीता फल्गु नदी के किनारे अकेली रह गईं। इसी दौरान शुभ मुहूर्त निकलने लगा। कथा के अनुसार राजा दशरथ की आकाशवाणी हुई और उन्होंने सीता से पिंडदान करने के लिए कहा। सीता ने बताया कि राम और लक्ष्मण सामग्री लेने गए हैं, लेकिन समय निकलता देख उन्होंने फल्गु नदी की रेत से ही पिंड बनाकर राजा दशरथ का पिंडदान कर दिया। पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा दशरथ ने पिंड स्वीकार करने के लिए अपना हाथ प्रकट किया। इसी घटना को सीताकुंड में बालू से पिंडदान की परंपरा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है।
आज भी फल्गु की रेत से बनाए जाते हैं पिंड
सीताकुंड की खास परंपराओं में फल्गु नदी की रेत से पिंड बनाकर पितरों का श्राद्ध करना शामिल है। श्रद्धालु रेत को पिंड का स्वरूप देकर अपने पूर्वजों के निमित्त कर्मकांड करते हैं। गयापाल पंडाओं के अनुसार, इस परंपरा का संबंध माता सीता द्वारा किए गए पिंडदान की पौराणिक कथा से है। इसी वजह से मातृ नवमी के दिन सीताकुंड में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
सुहागिन अवस्था में दिवंगत महिलाओं के लिए खास दिन
मातृ नवमी को उन महिलाओं के निमित्त श्राद्ध करने के लिए भी विशेष माना जाता है, जिनकी मृत्यु सुहागिन अवस्था में हुई हो। इस दिन श्रद्धालु अपनी माताओं, दादियों, नानियों और परिवार की अन्य दिवंगत महिलाओं के लिए पिंडदान और तर्पण करते हैं। गयाजी की पिंड वेदियों पर होने वाला यह पारंपरिक कर्मकांड श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था के साथ भावनात्मक जुड़ाव का भी अवसर होता है।
अब तक 25 लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे
जिला प्रशासन के मुताबिक 25 सितंबर से शुरू हुए पितृपक्ष मेले में अब तक 25 लाख 10 हजार 200 से अधिक श्रद्धालु गयाजी पहुंच चुके हैं। पितृपक्ष के अंतिम दिनों में तीर्थयात्रियों की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में मातृ नवमी पर राम गया और सीताकुंड में होने वाला पिंडदान गयाजी की उस पुरानी धार्मिक परंपरा को एक बार फिर सामने लाएगा, जिसे रामायण काल की पौराणिक कथा से जोड़कर देखा जाता है।