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बांग्लादेश की जेल में 11 साल से कैद शख्स लौटा, घर की दहलीज पर बेटे को खड़ा देख छलक पड़े आंसू
Sun, 15 Sep 2019 06:43 AM IST
योगेश साहू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: योगेश साहू
Updated Sun, 15 Sep 2019 06:43 AM IST
सार
- बिहार के दरभंगा जिले के तुलसीडीह मनोरथा गांव का रहने वाला है सतीश चौधरी
- मानसिक रूप से बीमार सतीश 15 सितंबर 2008 में अपने घर से चला गया था
- चार साल बाद बांग्लादेश रेड क्रास सोसायटी ने दी थी सतीश के ढाका जेल में होने की जानकारी
- मानवाधिकार कार्यकर्ता विशाल रंजन दफ्तुआर की मदद से छोटे भाई ने किए थे रिहाई के प्रयास
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सतीश चौधरी
- फोटो : Social Media
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विस्तार
बिहार के दरभंगा जिले के एक गरीब परिवार का मानसिक रूप से बीमार बेटा बांग्लादेश में पिछले 11 साल से कैद था। लेकिन शनिवार को वह सकुशल घर पहुंच गया। इस शख्स का नाम है सतीश चौधरी। आखिर सतीश किन हालातों में जेल तक पहुंच गया, इसकी ठीक—ठीक जानकारी उसे भी नहीं है।
जानकारी के अनुसार, बिहार के पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले के दर्शना गेदे बॉर्डर से सतीश को 12 सितंबर को बांग्लादेश ने भारतीय सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया। सतीश के छोटे भाई मुकेश ने बताया कि उसके भाई की रिहाई में मानवाधिकार कार्यकर्ता विशाल रंजन दफ्तुआर ने अहम भूमिका निभाई।
रिहाई के बाद मुकेश अपने भाई को ट्रेन से लेकर दरभंगा जिले के अशोक पेपर मिल थाना अंतर्गत तुलसीडीह मनोरथा गांव पहुंचा तो परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दरअसल तुलसीडीह मनोरथा गांव निवासी पिता रामविलास चौधरी अपने पुत्र सतीश और अन्य सदस्यों के साथ 12 अप्रैल 2008 को काम की तलाश में पटना आए हुए थे। जब वे 15 अप्रैल को वापस घर लौटे तो उनका बेटा सतीश गायब था। काफी तलाशने के बाद जब सतीश नहीं मिला तो उन्होंने 8 मई को थाने में शिकायत लिखा दी।
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परिजनों के अनुसार सतीश के गायब होने के चार साल बाद 2012 में उन्हें बांग्लादेश रेड क्रास सोसायटी से सतीश के ढाका जेल में होने की जानकारी मिली। मुकेश ने बताया कि गत 28 जुलाई को बांग्लादेश स्थित भारतीय दूतावास से सतीश की तस्वीर वाट्सएप के जरिए भेजी गई थी और फोन पर हमसे उनके बारे में पूछताछ की गई।
मुकेश ने साथ ही आरोप लगाया कि इसके बाद कोई संपर्क नहीं किया गया। मुकेश ने कहा कि इसके बाद उन्होंने मानवाधिकार कार्यकता विशाल रंजन दफ्तुआर से संपर्क साधा और उनके जरिए ही सतीश की रिहाई के प्रयास हो सके।
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जानकारी के अनुसार, बिहार के पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले के दर्शना गेदे बॉर्डर से सतीश को 12 सितंबर को बांग्लादेश ने भारतीय सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया। सतीश के छोटे भाई मुकेश ने बताया कि उसके भाई की रिहाई में मानवाधिकार कार्यकर्ता विशाल रंजन दफ्तुआर ने अहम भूमिका निभाई।
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रिहाई के बाद मुकेश अपने भाई को ट्रेन से लेकर दरभंगा जिले के अशोक पेपर मिल थाना अंतर्गत तुलसीडीह मनोरथा गांव पहुंचा तो परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दरअसल तुलसीडीह मनोरथा गांव निवासी पिता रामविलास चौधरी अपने पुत्र सतीश और अन्य सदस्यों के साथ 12 अप्रैल 2008 को काम की तलाश में पटना आए हुए थे। जब वे 15 अप्रैल को वापस घर लौटे तो उनका बेटा सतीश गायब था। काफी तलाशने के बाद जब सतीश नहीं मिला तो उन्होंने 8 मई को थाने में शिकायत लिखा दी।
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परिजनों के अनुसार सतीश के गायब होने के चार साल बाद 2012 में उन्हें बांग्लादेश रेड क्रास सोसायटी से सतीश के ढाका जेल में होने की जानकारी मिली। मुकेश ने बताया कि गत 28 जुलाई को बांग्लादेश स्थित भारतीय दूतावास से सतीश की तस्वीर वाट्सएप के जरिए भेजी गई थी और फोन पर हमसे उनके बारे में पूछताछ की गई।
मुकेश ने साथ ही आरोप लगाया कि इसके बाद कोई संपर्क नहीं किया गया। मुकेश ने कहा कि इसके बाद उन्होंने मानवाधिकार कार्यकता विशाल रंजन दफ्तुआर से संपर्क साधा और उनके जरिए ही सतीश की रिहाई के प्रयास हो सके।