सुशील मोदी का 'वो पुराना बयान' बन गया उनके गले की फांस?
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राज्यसभा की रिक्त सीटों पर होने वाले चुनावों के लिए भाजपा ने जब अपनी सारी सूची जारी कर दी हैं तब एक सवाल हर किसी के जेहन में कौंध रहा है। आखिर सुशील मोदी जैसे बड़े और जमीनी नेता की बजाय चुनाव हारने का रिकार्ड बना चुके गोपाल नारायण सिंह को बिहार की इकलौती राज्यसभा सीट पर तरजीह क्यों दी गई?
भाजपा के आला नेतृत्व को गोपाल नारायण सिंह में ऐसा क्या दिखा कि उनके अपराधिक रिकार्ड को भी आंखे मूंदकर नजरअंदाज कर दिया गया। सुशील मोदी से जुड़े नेता बताते हैं कि पार्टी नेतृत्व की ओर से पूर्व उप मुख्यमंत्री को राज्यसभा जाने के संकेत दे दिए गए थे। संभावना इस बात की भी थी कि उनके कद को देखते हुए केंद्र में बड़ा मंत्रालय भी दिया जा सकता है, लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि एक गैर प्रभावी से चेहरे के लिए पार्टी ने अपने इतने बड़े नेता को दांव पर लगा दिया।
खैर, इस पर चर्चा आगे करेंगे लेकिन पहले यह जान लिया जाए जिन गोपाल नारायण सिंह को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा है वो सुशील मोदी के मुकाबले कहां ठहरते हैं। राजनीति में गोपाल नारायण की एकमात्र उपलब्धि ये है कि वो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं, जबकि चुनावी अनुभव की बात करें तो विधानसभा का एकमात्र चुनाव जीतने वाले गोपाल नारायण दो दशक में आठ चुनाव हार चुके हैं।
छवि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके खिलाफ दो दर्जन से ज्यादा आपराधिक मुकदमे बताए जा रहे हैं जिनमें से ज्यादातर अवैध खनन के हैं। इसी को लेकर जदयू ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पिछले एक दशक से वह पूरी तरह पार्टी में साइडलाइन चल रहे थे, बीते विधानसभा चुनावों में भी शायद ही उनके नाम का जिक्र किसी ने सुना हो।
दूसरी ओर सुशील मोदी लगातार दस साल तक राज्य के उप मुख्यमंत्री रहे हैं तो उनका प्रशासनिक रिकार्ड भी शानदार रहा है। बिहार में अगर कैलाशपति मिश्र के साथ किसी ने भाजपा को खड़ा किया है तो वो सुशील मोदी ही थे। इस दौरान उनकी छवि पर आज तक कोई दाग नहीं लगा। उनके कट्टर से कट्टर विरोधी भी उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा पाए। राज्य में उनकी गिनती लालू यादव और नीतीश कुमार के बाद तीसरे बड़े नेता के तौर पर होती है।
बिहार में मोदी के प्रचार करने के नीतीश के विरोध का किया था समर्थन
अब चर्चा करते हैं उन कारणों की जिनकी वजह से तमाम योग्यताओं के बाद भी सुशील मोदी दरकिनार कर दिए गए। राजनीति के इस भंवर में जितने सवाल हैं उतने ही जवाब भी। सुशील मोदी के विरोधी इसे अपनी जीत तो मानते हैं लेकिन यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि लालू यादव और नीतीश कुमार जैसे बड़े नेताओं के मुकाबले के लिए उनका बिहार में रहना ही जरूरी है। लेकिन राजनीतिक पंडितों की मानें तो इसके पीछे कुछ ऐसे खास कारण भी हैं जिनकी टीस सुशील मोदी को आने वाले समय भी सालती रहेगी।
साल 2010 में जब बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले थे तब भाजपा प्रबंधन की मंशा गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रचार में उतारने की थी। लेकिन ऐन मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसमें अड़ंगा मार दिया।
गुजरात दंगों के मुद्दे पर नरेन्द्र मोदी का विरोध करते हुए नीतीश ने किसी सूरत में भी मोदी को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। नीतीश का तर्क था कि नरेन्द्र मोदी के आने से राज्य के मुस्लिम वोटरों पर फर्क पड़ेगा और वो गठबंधन से दूरी बना सकते हैं। कहा जाता है कि नीतीश की इस मुहिम में तब उप मुख्यमंत्री रहे सुशील मोदी ने भी सुर मिलाया था।
अंदरखाने से निकली खबरों में कहा गया था कि सुशील मोदी ने भरोसा दिलाया था कि बिना नरेन्द्र मोदी के भी भाजपा को कोई दिक्कत नहीं होगी। इस विरोध के बाद भाजपा आलाकमान ने नरेन्द्र मोदी को बिहार के चुनावी रण में उतारने का फैसला वापस ले लिया।
कहते हैं कि अपमान की वह चोट नरेन्द्र मोदी के दिल में गहरे तक लगी थी, लेकिन वह चुपचाप इसका घूठ पी गए। इससे नरेन्द्र मोदी की उस महत्वाकांक्षा को भी धक्का लगा था जिसमें वह गुजरात से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में आने की तैयारी कर रहे थे।
2012 में जब कांग्रेस के मुकाबले के लिए भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में प्रधानमंत्री पद के चेहरे पर चर्चा चल रही थी तब सुशील मोदी ने नीतीश कुमार को 'पीएम मैटेरियल' बताकर उनका नाम आगे करने का भी प्रयास किया था। लेकिन अरुण जेटली और राजनाथ सिंह जैसे नेताओं के अड़ने के कारण मुहिम ठंडी पड़ गई।
दो मौकों पर सुशील मोदी को नजरअंदाज कर चुकी है पार्टी
इन दो मौकों पर सुशील मोदी की नीतीश के प्रति वफादारी ही उनके गले की फांस बन गई। जानकारों की मानें तो दिल्ली की राजनीति में नरेन्द्र मोदी के उभार के बाद से ही सुशील मोदी का राजनीतिक कद घटता चला गया।
इसका पहला नजारा उस समय देखने को मिला जब 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनी तो राजनाथ सिंह की जगह नए अध्यक्ष की तलाश शुरू हुई। इसी दौरान बिहार में एनडीए को शानदार जीत दिलाने वाले सुशील मोदी का नाम इसके लिए चला। लेकिन अचानक अमित शाह को उन पर तरजीह देते हुए भाजपा की कमान सौंप दी गई।
इस फैसले के पीछे कौन रहा होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। नीतीश कुमार कहते भी हैं कि प्रधानमंत्री मोदी पिछली बातें नहीं भूलते।
एक उदाहरण और देखिए, बिहार में पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में जब लालू और नीतीश कुमार लगातार भाजपा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की चुनौती दे रहे थे तब भाजपा ने चुप्पी साधे रखी। जबकि पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्य में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा होने के कारण सुशील मोदी इसके स्वभाविक दावेदार थे, लेकिन भाजपा की दलील थी कि चुनाव नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। मुख्यमंत्री की घोषणा पार्टी की जीत के बाद होगी।
संभव है यह भाजपा की रणनीति का ही हिस्सा हो लेकिन इसका खामियाजा यह हुआ कि राज्य में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार पैदा हो गए। गया के विधायक प्रेम कुमार, केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूड़ी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कई अन्य नेताओं का नाम भी इस पद के लिए उछला। नतीजतन चुनावों से पहले ही पार्टी में गुटबाजी हावी हो गई।
भाजपा चुनाव हारी तो इसका ठीकरा केंद्रीय नेतृत्व की बजाय स्थानीय नेताओं खासकर सुशील मोदी पर ही फोड़ा गया। इसके बाद अचानक बिहार में ही सुशील मोदी साइडलाइन कर दिए गए। विपक्ष के नेता का पद गया के विधायक प्रेम कुमार को दिया गया तो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी सुशील मोदी की अनदेखी करते हुए मंगल पांडेय को बैठा दिया गया। नतीजतन सुशील मोदी विधान परिषद तक ही सिमट कर रह गए।
और अब जब ये माना जा रहा था कि पार्टी सुशील मोदी के कद और उनके अनुभव को देखते हुए राज्यसभा में लाकर उन्हें केंद्रीय मंत्रीमंडल में जगह देगी तब अचानक उन्हें दरकिनार कर अंजान से चेहरे को आगे कर दिया गया। यहां सवाल इसलिए भी खड़ा हो जाता है कि जब उनसे जूनियर गिरीराज सिंह, राजीव प्रताप रूड़ी, राधा मोहन सिंह और राजद से आए रामकृपाल यादव को मंत्री बनाया जा सकता है तो उन्हें क्यों नहीं?