फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   Bihar: What muslim believe

बिहारः ओवैसी या महागठबंधन, मुसलमानों का भरोसा किस पर?

Thu, 05 Nov 2015 04:04 PM IST
Updated Thu, 05 Nov 2015 04:04 PM IST
विज्ञापन
Bihar: What muslim believe

बिहार की राजनीति में जाति की चल रही बयार के बीच मुसलमान वोटों को लेकर दोनों प्रमुख गठबंधनों में कम ही चिंता देखी जा रही है। भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को पता है कि इस बार वे लोकसभा की तुलना में कम ही वोट पाएंगे, तो दूसरी ओर महागठबंधन पूरी तरह आश्वस्त है कि मुसलमान वोट कहीं नहीं जाएगा।

विज्ञापन


इसकी संभावना भी ज़्यादा दिखती है, क्योंकि चुनाव प्रचार के क्रम में जिस तरह गोमांस, सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण का मुद्दा उठाया गया और पाकिस्तान में पटाख़े फूटने जैसे बयान दिए गए, उससे यही लगता है कि बीजेपी को मुसलमान वोटों की फ़िक्र ही नहीं।
विज्ञापन


चुनाव प्रचार के आख़िरी दौर तक आते-आते भाजपा ने हिंदू-मुसलमान वोटों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश भी की है। इन सबके बीच कहीं मुसलमान एक बार फिर इस्तेमाल तो नहीं हो रहा?
विज्ञापन
विज्ञापन


सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक अरशद अजमल कहते हैं, "राजनीतिक पार्टियाँ तो अपनी राजनीति करती हैं। इसमें यूज एंड थ्रो भी करती हैं। लेकिन ये जुमला इसकी गहराई को नहीं बता सकता है"।

लेकिन राजनीतिक पार्टियों की जुमलेबाज़ी के बीच कई जानकार ये भी मानते हैं कि अब पहले वाली स्थिति नहीं रही। मुसलमान ये अच्छी तरह समझता है कि कौन पार्टियां उनके हक़ के लिए आवाज़ उठा सकती हैं। इदारे शरिया के महासचिव हाजी सैयद मोहम्मद सनाउल्लाह कहते हैं कि कोई भी राजनेता मुसलमानों का इस्तेमाल नहीं कर सकता है।

मुसलमानों की समस्या किसी की प्राथमिकता में नहीं

Bihar: What muslim believe

वे कहते हैं, "कोई भी राजनेता मुसलमानों का इस्तेमाल नहीं कर सकता। मुसलमान देश के लिए वफ़ादार होता है, देश के प्रति श्रद्धा रखता है। वो कभी भी किसी राजनेता के बहकावे में नहीं आता।" इस सवाल पर लोगों के अलग-अलग दावे हैं कि मुसलमान कितना इस्तेमाल होता है या नहीं।

मुसलमान वोट बैंक है या नहीं। लेकिन एक सवाल ये भी है कि क्या चुनाव में वोटों के ध्रुवीकरण पर चल रही बयानबाज़ी के बीच मुसलमानों के मुद्दे पीछे छूट रहे हैं।

जमाते इस्लामी के पटना शहर के अमीर और सलाहकार समिति शूरा के सदस्य रिज़वान अहमद कहते हैं, "हमको ऐसा नहीं लगा कि किसी ने मुसलमानों की समस्या को गंभीरता से उठाया है। यहां तक कि जो अपने को मुसलमानों के नेता कहते हैं, वे भी ऐसा नहीं कर रहे हैं।"
 
लेकिन इस बार के चुनाव की ख़ासियत ये भी है कि मुस्लिम वोटों के लिए कोई अपील नहीं जारी हुई है। किसी पार्टी ने भी अपील नहीं की, वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद इस बात से ज़्यादा इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते कि मुसलमान एक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होता है।

वे कहते हैं, "इस बार के चुनाव में एक बात सामने आ रही है कि मुसलमान मुख्यधारा में आकर आम लोगों की तरह वोट कर रहा है। ऐसा नहीं हुआ कि किसी ने अपील की और न ही किसी पार्टी ने इसके लिए कहा।"

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में मुसलमान करे तो क्या करे, ये भी एक सवाल है। मुसलमान समझदार तो है, लेकिन वो अल्पसंख्यक भी है और उसे अपनी सुरक्षा की ज़्यादा चिंता भी होती है। यही कारण है कि कई बार सरकार से नाराज़ रहने के बाद भी वे विकास के मुद्दे को छोड़कर सुरक्षा के नाम पर वोट करते हैं और कई बार इसे वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना कह दिया जाता है।

हर बार वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होता है मुसलमान

Bihar: What muslim believe

लेकिन क्या मुसलमान कथित सेक्यूलर पार्टियों को वोट देने के लिए मजबूर है, क्योंकि कोई दूसरा विकल्प नहीं। क्या बीजेपी विरोध की राजनीति पर ही मुसलमानों का वोट केंद्रित है और इसी कारण बिहार में महागठबंधन उनके वोट को लेकर बेफ़िक्र है।

बीजेपी विरोध पर मुस्लिम संगठन के नेता खुल कर नहीं बोलते। वे इससे इनकार करते हैं, वे कहते हैं कि जो भी सेक्यूलर लोग हैं, उन्हें हिंदू भी पसंद करते हैं और मुसलमान भी।

बिहार चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह दादरी कांड की बातें हुईं, बीफ़ पर बयानबाज़ी हुई और धर्म के आधार पर आरक्षण पर विवाद हुए, उसने मुसलमान युवकों को प्रभावित किया है। वे बीफ़ मुद्दे, अमित शाह के पाकिस्तान वाले बयान और डीएनए वाली टिप्पणी पर अपना नाराज़गी व्यक्त करते हैं।

हाल ही में भाजपा में शामिल हुए साबिर अली मानते हैं कि बीजेपी को इन बयानबाज़ियों से नुक़सान हुआ है। साबिर अली कहते हैं, "ये सही है कि बयानबाज़ी से एक समाज आहत हुआ है, लेकिन विपक्षी पार्टियां इसे तूल दे देती हैं।"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब सत्ता संभाली थी, तो सबका साथ सबका विकास का नारा दिया गया था। एक हाथ में क़ुरान और दूसरे हाथ में कंप्यूटर की बात कही गई थी, फिर एकाएक क्या हो गया कि मुसलमानों का भरोसा उन्होंने गंवा दिया। सैयद मोहम्मद सनाउल्लाह कहते हैं, "मोदी सरकार को मुसलमानों ने भी वोट दिया था।

लालू के मुकाबले नीतीश बने बड़े मुस्लिम नेता

Bihar: What muslim believe

क़ुरान और कंप्यूटर वाला नारा बहुत अच्छा है, लेकिन वे मुसलमानों के प्रति श्रद्धा नहीं रखेंगे, तो कोई मुसलमान साथ नहीं देगा।"  दूसरी ओर ऐसे बयानों पर चिढ़ा मुसलमान बीजेपी के विकास के दावों को ख़ारिज कर महागठबंधन की ओर खुलकर खड़ा हो गया है।

बिहार की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, वो है लालू यादव के मुक़ाबले मुसलमानों में नीतीश कुमार की बढ़ती पैठ की। युवा हो, बुर्जुग हो या फिर मुस्लिम संगठनों से जुड़ शख़्स, सभी एक सुर से नीतीश पर भरोसा कर रहे हैं।

क्या लालू प्रसाद से मुसलमानों का भरोसा कम हुआ है या भाजपा से अपनी राह अलग करके नीतीश बिहार में मुसलमानों के सबसे बड़े नेता बनकर सामने आए हैं। अरशद अजमल कहते हैं, "आप जिस ऐतिहासिक क्षण में होते हैं, उस क्षण में आपको चुनना पड़ता है कि मोदी या नीतीश।

"बीच में बड़े ज़ोर-शोर से बिहार में अपने को लांच करने आए असदुद्दीन ओवैसी सीमांचल के कुछ हिस्सों में स्थानीय नेताओं के प्रभाव को छोड़कर कम ही नज़र आते हैं। क्या ओवैसी ने बिहार की राजनीति को गलत भांप लिया था।

जमाते इस्लामी के रिज़वान अहमद कहते हैं, "ओवैसी साहब बिहार के लिए अजनबी हैं। हम तो उनक काम से वाकिफ नहीं हैं। सिर्फ़ राजनीतिक फायदा उठाने के लिए अगर कोई आता है, तो ये बात दुरुस्त नहीं।"

इतना तो तय है कि बिहार चुनाव में मुसलमानों का रुझान महागठबंधन की ओर साफ़ दिखता है और नीतीश कुमार मुसलमानों के बड़े नेता के रूप में उभर कर सामने आ रहे हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed