नीतीश लालू के सामने खड़ी हुई ये पांच चुनौतियां
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बिहार चुनावों में तीसरी बार सत्ता में वापसी की उम्मीद में लगे नीतीश कुमार और उनके नए जोड़ीदार लालू प्रसाद यादव के लिए आगामी चुनाव इतने आसान नहीं रह गए हैं।
एक एक कर उनके अपने साथ छोड़ रहे हैं तो विरोधियों ने उनकी नाक में दम कर रखा है। मोदी बिहार में विशेष रुचि ले रहे हैं तो उनके सिपहसलार अमित शाह ने चुनावों के लिए जान झोंक दी है।
वहीं ओवैशी की एंट्री ने जातीय समीकरणों की प्रयोगशाला रही बिहार की राजनीति को लालू नीतीश के लिए और पेचिदा बना दी है। पिछले कुछ समय में ही बिहार के राजनीतिक समीकरण लगातार बदले हैं। तो जानिए उन पांच कारणों के बारे में जिन्होंने पटना की जंग नीतीश और लालू की जोड़ी के लिए मुश्किल भरी कर दी है।
अपनों की बगावत
बिहार चुनाव में नीतीश-लालू की जोड़ी को विरोधियों के साथ-साथ अपनों की बगावत से भी जूझना पड़ रहा है। बुधवार को ही नीतीश के चार विधायकों ने उन पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए भाजपा का दामन थाम लिया।
इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी दलितों के अपमान का आरोप हुए 20 विधायकों के साथ जेडीयू को अलविदा कहकर अब उनके सामने ही ताल ठोंक रहे हैं। इससे पहले भी राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग के कारण जेडीयू को अपने कई विधायकों की सदस्यता समाप्त करवानी पड़ी थी।
कभी पार्टी का मुस्लिम चेहरा रहे साबिर अली भी अब भाजपा के खेमे में हैं। कुछ ऐसी ही दिक्कत लालू यादव के सामने भी है। कभी उनके दाहिने हाथ रहे सांसद पप्पू यादव ने भी उनका साथ छोड़ अलग राह चुन ली है।
लोकसभा चुनावों से पूर्व लालू के हनुमान कहे जाने वाले राम कृपाल यादव भी उन्हें छोड़ मोदी की शरण में चले गए थे आज वो केन्द्र में मंत्री हैं। वहीं जैसे जैसे चुनाव और नजदीक आएंगे लालू नीतीश के लिए ये खतरा और बढ़ता जाएगा। इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनके और साथी भी भाजपा का दामन न थाम लें।
ओवैशी की एंट्री
बिहार चुनावों में एक नई एंट्री ने हर किसी को चौकन्ना कर दिया है। एआईएमआईएम के नेता असद्दुदीन ओवैशी ने बिहार चुनावों में ताल ठोंकने की तैयारी कर ली है। रविवार को किशनगंज में हुई उनकी रैली ने बिहार के जमे जमाए नेताओं के होश उड़ा दिए हैं।
अपने भड़काऊ भाषणों के चलते मुस्लिमों में खासे लोकप्रिय हो रहे ओवैशी की आहट को कोई भी दल हल्के में लेने को तैयार नहीं हैं। खासकर वो जो मुस्लिम वोटों पर दावेदारी करते हों वो तो बिल्कुल भी नहीं।
बिहार में आमतौर पर लालू यादव ही मुस्लिम वोटों के सबसे बड़े तलबगार रहे हैं। हालांकि उनके नए जोड़ीदार नीतीश कुमार भी अपनी उदार और सेक्यूलर छवि के चलते मुस्लिमों में अच्छी पैंठ रखते हैं। लेकिन ओवैशी के आने से इन दोनों ही नेताओं का खेल बिगड़ सकता है।
ओवैशी बेशक ज्यादा सीटें जीतने में सफल न हो पाएं लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि वो लालू नीतीश के अच्छे खासे वोट काट सकते हैं। वहीं जिस तरह के भाषण ओवैशी देते रहे हैं उससे वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता और अगर ऐसा हुआ तो इसका सीधे सीधे फायदा भाजपा को मिलेगा।
मोदी का मास्टर स्ट्रोक
विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक चला है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने। जिन्होंने बिहार के विधानसभा चुनावों को अपनी नाक का प्रश्न बना लिया है। बिहार के विकास के लिए सवा लाख करोड़ के पैकेज की मोदी की घोषणा को राजनीतिक विश्लेषक बड़ा कदम बता रहे हैं।
मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक ने नीतीश के तरकश से एक वो तीर भी निकाल दिया है जिसमें स्पेशल पैकेज के नाम पर नीतीश अभी तक केन्द्र सरकार पर निशाना साधते रहे हैं। लगभग हर केन्द्र सरकार को नीतीश स्पेशल पैकेज के नाम पर कटघरे में खड़ा करते रहे हैं।
केन्द्र सरकार के इस सवा लाख करोड़ के पैकेज से मोदी बिहार के आम आदमी तक यह बात पहुंचाने में जरूर कामयाब हो गए हैं कि वो राज्य के विकास के लिए गंभीर हैं। पैकेज के अलावा भी मोदी ने हजारों करोड़ की कई परियोजनाओं का शिलान्यास कर इस बात का संकेत दे दिया है कि विकास का यह सिलसिला लंबे समय तक चलेगा।
सत्ता विरोधी रुझान
नीतीश की एक बड़ी दिक्कत ये भी है कि उन्हें अपने दुश्मनों के साथ-साथ सत्ता विरोधी रुझानों से भी जूझना पड़ सकता है। लगातार सत्ता में रहने के कारण आम जनता को सरकारों से कई शिकायतें हो जाती हैं।
नीतीश कुमार लगातार दस सालों से बिहार की सत्ता पर काबिज हैं ऐसे में सत्ता विरोधी रुझानों का नुकसान उन्हें भी उठाना पड़ सकता है। लेकिन भाजपा और उनके अन्य विपक्षी इन मुद्दों को हवा देने में पीछे नहीं रहेंगे।
वे जानबूझ कर उन मुद्दों को उछाल सकते हैं जिन्हें नीतीश वादा करने के बावजूद पूरा नहीं कर पाए। हालांकि राजनीति के मंझे खिलाड़ी नीतीश कुमार भी इस बात को समझ रहे हैं यही कारण है कि वो जल्द से जल्द अपने उन वादों को पूरा करने में लगे हैं जिन्हें वो अभी तक निभा नहीं पाए थे।
हाल ही में प्राइमरी शिक्षकों की वेतन वृद्िध की सालों से अटकी पड़ी मांगों को मानना कुछ ऐेस ही कदम हैं।
जंगलराज 2 का डर
मुख्यमंत्री नीतीश के साथ एक दिक्कत ये भी है वो आगामी चुनावों में जिस गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं उसकी स्थिति आज भी बिहार में अच्छी नहीं मानी जाती।
लगातार 15 साल तक बिहार की सत्ता के शिखर पर रहे लालू यादव और उनकी पार्टी राजद के शासन को बिहार में जंगलराज की संज्ञा दी गई थी। लालू के राज को जंगलराज बताकर ही कभी नीतीश भाजपा के साथ गठबंधन कर बिहार की सत्ता में आए थे। उनके आने के बाद कानून व्यवस्था में काफी सुधार भी हुआ ऐसे में दोबारा उन्हीं लालू के साथ उन्हें नुकसान भी पहुंचा सकता है।
भाजपा भी लालू के साथ उनके गठबंधन को जंगलराज 2 की वापसी कहकर आम लोगों में डर बैठाने का प्रयास कर रही है। हाल ही में गया में हुई रैली में तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बकायदा आरजेडी को रोज जंगल राज का डर कहकर संबोधित किया था। भाजपा अगर इसे मुद्दा बनाने में सफल रही तो नीतीश लालू की जोड़ी को इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।