बिहार में इस बार सत्ता की चाबी ईबीसी के हाथ
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अलग-अलग जाति समूहों के ध्रुवीकरण से सियासी बाजी जीतने वाले बिहार के राजनीतिक दलों की निगाहें इस बार अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) पर हैं। दरअसल इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में सत्ता की चाबी ईबीसी के पास है। सूबे में करीब 29 फीसदी ईबीसी मतदाता हैं।
चूंकि यही वर्ग इस बार सूबे के राज तिलक की पटकथा लिखने वाला है, इसलिए राजग और जदयू-राजद गठबंधन इन्हें साधने के लिए अभी से सियासी बिसात बिछाने लगे हैं। भाजपा-जदयू गठबंधन को राजद को डेढ़ दशक बाद सत्ता से बेदखल करने का मौका तभी मिला जब राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के मजबूत माय (यादव और मुस्लिम) वोट बैंक के खिलाफ ईबीसी मतदाता गोलबंद हुए थे।
इस दौरान अगड़ी जातियां भाजपा के साथ खड़ी हुईं थी तो ईबीसी मतदाता जदयू के नीतीश कुमार के पक्ष में गोलबंद हुए थे। सूबे में सियासी दलों के नए गठबंधनों के सामने आने से फिलहाल ईबीसी मतदाता अनिर्णय की स्थिति में हैं।
दोनों ही गठबंधन बिछा रहे हैं सियासी बिसात
दरअसल ईबीसी मतदाता भाजपा के परंपरागत मतदाता नहीं रहे हैं। यह वर्ग नीतीश के कारण राजग के साथ लालू के विरोध में एकजुट हुआ था। अब जबकि लालू और नीतीश साथ-साथ हैं और भाजपा तब लालू के साथ खड़ी लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा के साथ है, तब इस नई सियासी परिस्थितियों ने ईबीसी जातियों को ऊहापोह में डाल दिया है।
चुनाव से पहले राजग और जदयू-राजद गठबंधन ईबीसी को एक दूसरे के प्रति सचेत कर रहा है। भाजपा ईबीसी मतदाताओं को यह संदेश देना चाह रही है कि नीतीश और लालू के एक साथ आने के बाद उसका असली मंच राजग ही है। जहां उसके साथ महादलित और दलित नेता के रूप में जीतनराम मांझी और रामविलास पासवान हैं तो ईबीसी से जुड़े रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा। इसके अलावा भाजपा अपने ईबीसी नेताओं को भी सामने रख रही है।
वैसे भी लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ईबीसी वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगाई थी। भाजपा का मानना है कि चूंकि इस बार लालू पार्टी विरोधी गठबंधन का नेतृत्व नहीं कर रहे, इसलिए उनके माय समीकरण में भी सेंध लगेगी। इस समीकरण में सेंध लगाने के लिए भाजपा अपने यादव नेताओं हुकुम देव नारायण यादव, रामकृपाल यादव, नंदकिशोर यादव जैसे नेताओं के नाम भुनाएगी।
उधर जदयू नेताओं का तर्क है कि मोदी लहर में ईबीसी मतदाताओं का लोकसभा चुनाव में वोट हासिल करने में सफल रही भाजपा का मंसूबा विधानसभा चुनाव में पूरा नहीं होगा। भले ही नीतीश और लालू ने हाथ मिला लिया हो, मगर ईबीसी मतदाताओं को पता है कि अभी भी गठबंधन के नेता और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नीतीश ही हैं।