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Bihar Assembly Election 2020: लालू यादव की लालटेन फोड़ने के लिए पर्दे के पीछे चल रहे हैं राजनीतिक दांव-पेंच

Wed, 30 Sep 2020 03:06 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 30 Sep 2020 03:06 PM IST
सार

जीतनराम मांझी के बिहार का मुख्यमंत्री बनने और नई पार्टी बना लेने के बाद से वे राज्य में महादलितों का चेहरा हैं। बताते हैं मांझी पर समय रहते नीतीश कुमार की नजर पड़ गई थी। इसका एक बड़ा कारण लोकसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान की नखरेबाजी थी...

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Election in Bihar 2020 News in Hindi: Jdu-bjp Are Planning To Defeat Lalu Yadav Rashtriya Janta Dal
Rahul Gandhi, Tejaswi yadav, Upendra Kushwaha, Jitan ram manjhi - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

Election in Bihar 2020: तेजस्वी यादव के पास भले ही पिता लालू यादव जैसा कद, कौशल, भाषा शैली न हो लेकिन राजद के मुख्यमंत्री पद का चेहरा वही हैं। लालू प्रसाद यादव के पास अपना उत्तराधिकारी देने के लिए तेजस्वी से तेज कोई दूसरा चेहरा भी नहीं है। वहीं तेजस्वी और तेज प्रताप का समीकरण भी निराला है। इस समीकरण में बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी भी काफी फिट बैठती हैं। ऐसे में लालू यादव की लालटेन फोड़ने के लिए बिहार विधानसभा चुनाव से एन पहले पर्दे के पीछे से जमकर राजनीति के तीर चल रहे हैं।

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तेजस्वी भी कम जिम्मेदार नहीं

मोतिहारी के पंकज ने उपेन्द्र कुशवाहा के साथ तेजस्वी की केमिस्ट्री और बिगाड़ दोनों देखा है। वह बताते हैं कि 2019 में उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी बिहार के कोइरी, कुशवाहा का वोट ट्रांसफर नहीं करा पाई। इसके बाद से तेजस्वी का उपेन्द्र के प्रति व्यवहार थोड़ा सहयोगात्मक नहीं था। हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी को भी तेजस्वी के नेतृत्व में महागठबंधन में कोई धार नहीं दिखी। प्रशांत किशोर की टीम में विधानसभा चुनाव 2015 में कड़ी मशक्कत कर चुके सूत्र के अनुसार पिछले दो साल के भीतर वैसे भी तेजस्वी ने अपनी छवि को काफी खराब किया है।

इसके लिए खुद तेजस्वी ही जिम्मेदार हैं। सूत्र का कहना है कि तेज प्रताप की छवि पहले से बिगड़ी थी। दोनों भाइयों के तौर तरीकों से पार्टी में लालू युग के कई नेता काफी नाराज हो गए। बताते हैं इसी उधेड़बुन में राष्ट्रीय जनता दल अपनी धार खोता गया और महागठबंधन में फूट बढ़ती चली गई। दिल्ली की एक बड़ी सर्वे एजेंसी के सूत्र की मानें तो 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद राजद ने महागठबंधन में एकता बनाए रखने का कोई प्रयास नहीं किया। लिहाजा भाजपा और जद (यू) को विपक्ष से कोई खतरा नहीं महसूस नहीं हुआ।

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पहले माझी टूटे, फिर उपेन्द्र ने पकड़ी अलग राह

जीतनराम मांझी के बिहार का मुख्यमंत्री बनने और नई पार्टी बना लेने के बाद से वे राज्य में महादलितों का चेहरा हैं। बताते हैं मांझी पर समय रहते नीतीश कुमार की नजर पड़ गई थी। इसका एक बड़ा कारण लोकसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान की नखरेबाजी थी। लिहाजा टीम नीतीश ने पहले जीतन राम मांझी से संपर्क बढ़ाया। सुशील कुमार मोदी की टीम भाजपा ने रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा को करीब लाने की कोशिश शुरू की। सबका लक्ष्य एक था। राष्ट्रीय जनता दल के राजनीतिक इकबाल को कमजोर करके महागठबंधन की नींव हिलाना। राजनीति के जादूगर ने जीतनराम मांझी को अपने साथ मिलाकर पहला लक्ष्य आसानी से तय कर लिया। बताते हैं इसी खेल में उपेन्द्र कुशवाहा और तेजस्वी यादव ने भी अलग रास्ता चुन लिया।

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असल का खेल तो तीसरा मोर्चा है

उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा ने बसपा के साथ हाथ मिलाकर विधानसभा चुनाव में उतरने का फैसला किया है। कारण साफ है कि तेजस्वी यादव ने 10-12 सीटों से अधिक रालोसपा को देने से मना कर दिया था। नीतीश कुमार और उपेन्द्र कुशवाहा के पहले से तल्ख समीकरण के कारण भाजपा की इच्छा के बाद भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में उपेन्द्र कुशवाहा की एंट्री नहीं हो पाई, लेकिन बिहार की राजनीति में लगभग हर सीट पर राष्ट्रीय जनता दल और महागठबंधन को नुकसान पहुंचाने की रणनीति तैयार हो गई। रालोसपा और बसपा ने बिहार के दूसरे छोटे दलों के लिए साथ आने का मंच दे दिया। सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की आदी मायावती ने भी पर्दे के पीछे की राजनीति से अपना उद्देश्य जोड़ते हुए बसपा के नेताओं को हरी झंडी दे दी।

अब कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल ही महागठबंधन है

बिहार विधानसभा चुनाव का शतरंज मतदान से एक महीने पहले बिछ चुका है। राजनीति के पंडित 220 सदस्यीय विधानसभा में जद(यू) और भाजपा की बड़ी आसान सी जीत मानकर चल रहे हैं। मांझी की हम के आ जाने के बाद अब भाजपा और जद(यू) ने मिलकर लोजपा के चिराग पासवान की हेकड़ी निकालने की तैयारी कर ली है। चिराग कम से कम 40 सीट चाहते हैं और किसी भी कीमत पर 25 सीट से ऊपर देना जद(यू) नेता सही नहीं मानते। यह भी दिलचस्प है कि चिराग पासवान और तेजस्वी यादव बहुत अच्छे दोस्त हैं। दोनों में अच्छा संवाद है। पर्दे की राजनीति ने ऐसा गुल  खिलाया है कि महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल के बाद दूसरा सबसे बड़ा दल या सात फीसदी से अधिक वोट पाने वाली पार्टी कांग्रेस ही बची है। कांग्रेस के नेता भी इस बार 70 से अधिक विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ने का सपना देख रहे हैं। इसकी भी रणनीति तारिक अनवर, शकील अहमद की देख-रेख में तैयार हो रही है।

शरद यादव की आशंका सही साबित हुई

जबलपुर के शरद यादव को राष्ट्रीय नेता की पहचान बिहार की राजनीति से ही मिली। शरद यादव के बारे में कहा जाता है कि  बिहार की राजनीति को वह तरीके से समझते हैं। शरद यादव ने चुनाव से पहले भी तीसरे मोर्चे की संभावना पर आशंका जताई थी। स्वास्थ्य लाभ ले रहे शरद यादव का मानना है कि बिहार विधानसभा चुनाव में आसान जीत पाने के लिए भाजपा और जद(यू) की रुचि भी कोई तीसरा मोर्चा खड़ा होने के पक्ष में रहेगी। ताकि महागठबंधन को और कमजोर किया जा सके। यानी कुछ ऐसा कि 2009 के विधानसभा चुनाव की तरह कांग्रेस सभी सीटों पर चुनाव लड़ गई थी और राष्ट्रीय जनता दल को पूरे बिहार में इसका खामियाजा भुगतना पड़ा था। वैसे भी अभी असदुद्दीन ओवैसी का पत्ता खोलना बाकी है।

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